टोटम का अर्थ
अनेक जनजातीय संस्कृतियों में धर्म तथा सामाजिक संगठन के तत्व और विशेषताएं अनोखे ढंग से मिली जुली रहती है और वह इस अर्थ में कि ये जनजातियां किसी भौतिक पदार्थ, पशु या पेड़ पौधों से अपना एक रहस्य में संबंध जोड़कर अलौकिक विश्वासों को पनपाती एवं सामाजिक जीवन को नियमित करती हैं । मानव शास्त्री इन जनजातियों को टोटमवादी ( Totemic ) कहते हैं और जिससे ये लोग एक रहस्यमय संबंध होने का दावा करते हैं, उसे ' टोटम ' ( Totem ) कहते हैं । टोटम शब्द का बोध उत्तरी अमेरिका के इण्डियनो से सर्वप्रथम श्री जे लांग ( J. Long ) ने सन 1791 में किया था , और श्री जे. एफ. मैकलिनन ने एक आदिम सामाजिक संस्था के रूप में टोटमवाद के महत्व को सबसे पहले स्वीकार किया ।वास्तव में जैसा कि हम आगे देखेंगे टोटमवाद (Totemism) जनजातियों के सामाजिक संगठन का एक अत्यधिक महत्वपूर्ण आधार है । इसके आधार पर गोत्र जीवन संगठित तथा विवाह आदि नियंत्रित होते हैं । इस कारण टोटम और टोटमवाद के स्वरूपों को समझना बहुत ही आवश्यक है ।
जनजातीय समूह अपने गोत्र का संबंध केवल मनुष्य तक ही सीमित नहीं रखते हैं, बल्कि किसी भौतिक वस्तु, पशु, पेड़ पौधे तथा अन्य प्राकृतिक चीजों से अपना संबंध होने का दावा करते हैं और केवल संबंध ही नहीं अपितु उसे संबंध के आधार पर अनेक अंधविश्वासों,श्रद्धा, भक्ति और आदर के भाव को जन्म देते हैं । इस प्रकार किसी भौतिक वस्तु या पशु पक्षी या प्रकृति की अन्य कोई चीज जिसके साथ एक गोत्र अपना गूढ़ संबंध मानता है, टोटम कहलाता है और इस टोटम से संबंधित समस्त धारणाओं विश्वासों और संगठन को टोटमवाद कहते हैं । इस प्रकार यह स्पष्ट है कि टोटमवाद धार्मिक तत्वों सामाजिक संगठन का एक अनोखा संयोग है । परंतु इस संबंध में यह स्मरण रखना होगा कि टोटमवाद ना तो धर्म है और ना ही टोटम कोई भगवान या भगवान का प्रतीक ।
परिभाषा : -
टोटम प्रथा ( Totemism ) किसी समाज के उस विश्वास को कहते हैं जिसमें मनुष्यों का किसी,पशु,-पक्षी, पेड़-पौधें या आत्मा से सम्बन्ध माना जाए, टोटम शब्द ओजिब्वे ( Ojibwe ) नामक मूल अमेरिकी आदिवासी कबीले की भाषा के ' ओतोतेमन ' ( Ototeman ) से लिया गया है जिसका अर्थ है " अपना भाई-बहन रिश्तेदार " हैं । इसका मूल शब्द 'ओते ' ( Ote ) हैं, जिसका अर्थ एक ही मां के जन्में भाई- बहन हैं जिनमें खून का रिश्ता है। और जो एक दूसरे से विवाह नहीं कर सकते हैं ।
टोटम की निम्नलिखित परिभाषाएं :-
टोटम को निम्नलिखित विद्वानों ने परिभाषित किया है : -श्री हॉबल के अनुसार, - टोटम एक पदार्थ, प्रायः एक पशु अथवा एक पौधा है जिसके प्रति एक सामाजिक समूह के सदस्य विशेष श्रद्धा भाव रखते हैं और जो यह अनुभव करते हैं कि उनके और टोटम के बीच भावनात्मक समानता का एक विशिष्ट बन्धन है ।
फ्रायड के अनुसार, - वास्तव में टोटल एक पशु है (चाहे भक्ष्य हो तथा हानिरहित भयंकर हो तथा डरावना) और यदा-कदा एक पौधा अथवा एक प्राकृतिक पदार्थ( जैसे वर्षा या जल ) भी हो सकता है जिसका की समग्र गोत्र से घनिष्ठ संबंध हो ।
जेम्स फ्रेजर के अनुसार, - टोटम भौतिक वस्तुओं का एक वर्ग है जिसका एक आदिम जाति, यह विश्वास रखते हुए कि उसके साथ गोत्र के प्रत्येक सदस्य के बीच एक विशिष्ट आंतरिक संबंध विद्यमान है, अंधविश्वासपूर्ण आदर करती है ।
गोल्डनवीजर (Golden weiser) के अनुसार, ने टोटम के अर्थ को और भी विस्तार पूर्वक समझाते हुए लिखा है कि गोत्रों में विभाजित अनेक आदिम जनजातियों में गोत्र नाम एक पशु, पौधा अथवा प्राकृतिक पदार्थ से लिया गया है और गोत्र से सदस्य इन पशुओं अथवा वस्तुओं के प्रति विशिष्ट मनोभाव रखते हैं । इसी को मानव शास्त्री टोटम कहते हैं ।
उपरोक्त परिभाषाओं से टोटम के संबंध में एक स्पष्ट धारणा बन जाती है । अगर उक्त परिभाषाओं का विश्लेषण किया जाए तो हमें टोटल के संबंध में दो तीन बातों का पता चलता है - प्रथम तो यह है कि साधारणतयः टोटम कोई अभौतिक या अमूर्त वस्तु नहीं होती है, यह कोई ना कोई भौतिक चीज, पशु पक्षी या पेड़ पौधा होता है । दूसरी बात यह है कि यह भौतिक चीज, पशु या पौधा एक गोत्र समूह के सदस्यों के दृष्टिकोण से कोई सामान्य या साधारण चीज नहीं होती है । इसलिए अन्य भौतिक चीज, पशु या पौधों से टोटम बिल्कुल ही भिन्न होता है । तीसरी बात यह है कि चूंकि यह टोटल नामधारी भौतिक पदार्थ या पशु या पक्षी या पेड़ या पौधा असाधारण या अलौकिक या विशिष्ट शक्ति संपन्न है, इस कारण इसके प्रति गोत्र समूह के सदस्यों की अंधविश्वासमूलक श्रद्धा, भक्ति व आदर की भावना होती है । अंतिम बात यह है कि श्रद्धा, भक्ति व आदर की भावना के आधार पर यह भी विश्वास किया जाता है कि टोटम तथा गोत्र के प्रत्येक सदस्य के बीच एक विशिष्ट, आंतरिक, रहस्यमय या अलौकिक संबंध विद्यमान है । इन समस्त विशेषताओं से संबंधित भौतिक पदार्थ,पशु, पक्षी, पेड़ व पौधे को ही टोटम कहते हैं ।
टोटमवाद की परिभाषा : -
फ्रायड के अनुसार, - वास्तव में टोटल एक पशु है (चाहे भक्ष्य हो तथा हानिरहित भयंकर हो तथा डरावना) और यदा-कदा एक पौधा अथवा एक प्राकृतिक पदार्थ( जैसे वर्षा या जल ) भी हो सकता है जिसका की समग्र गोत्र से घनिष्ठ संबंध हो ।
जेम्स फ्रेजर के अनुसार, - टोटम भौतिक वस्तुओं का एक वर्ग है जिसका एक आदिम जाति, यह विश्वास रखते हुए कि उसके साथ गोत्र के प्रत्येक सदस्य के बीच एक विशिष्ट आंतरिक संबंध विद्यमान है, अंधविश्वासपूर्ण आदर करती है ।
गोल्डनवीजर (Golden weiser) के अनुसार, ने टोटम के अर्थ को और भी विस्तार पूर्वक समझाते हुए लिखा है कि गोत्रों में विभाजित अनेक आदिम जनजातियों में गोत्र नाम एक पशु, पौधा अथवा प्राकृतिक पदार्थ से लिया गया है और गोत्र से सदस्य इन पशुओं अथवा वस्तुओं के प्रति विशिष्ट मनोभाव रखते हैं । इसी को मानव शास्त्री टोटम कहते हैं ।
उपरोक्त परिभाषाओं से टोटम के संबंध में एक स्पष्ट धारणा बन जाती है । अगर उक्त परिभाषाओं का विश्लेषण किया जाए तो हमें टोटल के संबंध में दो तीन बातों का पता चलता है - प्रथम तो यह है कि साधारणतयः टोटम कोई अभौतिक या अमूर्त वस्तु नहीं होती है, यह कोई ना कोई भौतिक चीज, पशु पक्षी या पेड़ पौधा होता है । दूसरी बात यह है कि यह भौतिक चीज, पशु या पौधा एक गोत्र समूह के सदस्यों के दृष्टिकोण से कोई सामान्य या साधारण चीज नहीं होती है । इसलिए अन्य भौतिक चीज, पशु या पौधों से टोटम बिल्कुल ही भिन्न होता है । तीसरी बात यह है कि चूंकि यह टोटल नामधारी भौतिक पदार्थ या पशु या पक्षी या पेड़ या पौधा असाधारण या अलौकिक या विशिष्ट शक्ति संपन्न है, इस कारण इसके प्रति गोत्र समूह के सदस्यों की अंधविश्वासमूलक श्रद्धा, भक्ति व आदर की भावना होती है । अंतिम बात यह है कि श्रद्धा, भक्ति व आदर की भावना के आधार पर यह भी विश्वास किया जाता है कि टोटम तथा गोत्र के प्रत्येक सदस्य के बीच एक विशिष्ट, आंतरिक, रहस्यमय या अलौकिक संबंध विद्यमान है । इन समस्त विशेषताओं से संबंधित भौतिक पदार्थ,पशु, पक्षी, पेड़ व पौधे को ही टोटम कहते हैं ।
टोटमवाद की परिभाषा : -
जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है किसी भौतिक वस्तु,पशु,पक्षी,पेड़,पौधा या प्रकृति की अन्य कोई चीज जिसके साथ एक गोत्र के सदस्य अपना एक अलौकिक किया गूढ़ संबंध मानते हैं और जिसके प्रति वे विशेष श्रद्धा, भक्ति और आदर का भाव रखते हैं, टोटम कहलाता है और इस टोटम से संबंधित समस्त धारणाओं विश्वासों और संगठन को टोटमवाद कहते हैं । अति संक्षेप में , टोटम की संस्थागत अभिव्यक्ति ही टोटमवाद है । इस संबंध में कुछ विद्वानों द्वारा प्रस्तुत टोटमवाद की परिभाषा निम्नवत है ।श्री मैरेट के अनुसार, - किसी गोत्र के संबंध में टोटमवाद उस पद्धति को कहते हैं, जिसके अनुसार किसी जनजाति का कोई उपभाग किसी विशेष जानवर या वनस्पति से अपना विशिष्ट संबंध समझता है, उसके नाम का प्रयोग करता है और यह दावा करता है कि उसके साथ उसका एक रहस्यमय संबंध है ।
रैडक्लिफ ब्राउन के अनुसार - टोटमवाद प्रथाओं और विश्वासों का वह समूह है जिसके द्वारा समाज तथा पशुओं और पौधों एवं अन्य प्राकृतिक वस्तुओं, जो कि सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण है,के बीच संबंधों की एक विशेष व्यवस्था स्थापित हो जाती है ।
गोल्डनवीजर( Golden weiser) ने टोटमवाद के साथ संस्थात्मक 5:00 पर विशेष बल देते हुए लिखा है कि " गोत्रों, उनके टोटल तथा उनसे संबंधित विश्वासों, प्रथाओं व संस्कारों के योग से बनने वाली संस्था को टोटमवाद कहते है ।
हर्षकॉविट्स ( Herskovits ) के अनुसार - टोटमवाद उस धारणा या विश्वास को कहते हैं जिसके अनुसार किसी मानव समुदाय का किन्हीं वनस्पति,पशु या कभी-कभी अन्य कोई प्राकृतिक वस्तु के साथ अलौकिक संबंध माना जाता है ।
उपरोक्त परिभाषाओं की ऊपरी तौर पर विवेचना करने से ऐसा प्रतीत हो सकता है कि धर्म और टोटमवाद में कोई विशेष अंतर नहीं है । श्री दुर्खीम ने तो टोटमवाद को ही समस्त धर्मों का प्राथमिक स्तर माना है । आपके अनुसार ऐसा टोटमवाद प्रकृति से ही संभव हुआ क्योंकि टोटलवाद नैतिक कर्तव्यों और मौलिक विश्वासों की वह समष्टि हैं जिसके द्वारा समाज अर्थात एक गोत्र के सदस्यों और पशु, पौधों या अन्य प्राकृतिक वस्तुओं के बीच एक पवित्र और अलौकिक संबंध स्थापित हो जाता है । यद्यपि श्री दुर्खीम के विचारों में कुछ सत्यता है, फिर भी आज अधिकतर मानव शास्त्री धर्म और टोटमवाद में एक स्पष्ट भेद मानते हैं। विभिन्न ने जनजातीय समाजों के अध्ययन से इस बात की ही पुष्टि होती है कि आदिवासी समाजों में धर्म और टोटल अपना-अपना पृथक अस्तित्व रखते हैं । टोटमवाद में एक गोत्र के सदस्य टोटम से आपने रहस्यमई संबंध को जोड़ते हैं और उसी के आधार पर एक टोटम समूह के सदस्य आपस में शादी विवाह नहीं करते हैं । ये दोनों ही विशेषताएं टोटमवाद में अनिवार्य है, परंतु धर्म में इन दोनों का ही अभाव होता है । अगर धर्म का आधार टोटमवाद ही होता तो अब तक ये दोनों घुल मिलकर एक हो गए होते । साथ ही टोटल सर्वव्यापी नहीं है और ना ही आवश्यक रूप से यह प्रत्येक गोत्र में पाया जाता है । ऐसे अनेक जनजातीय समाज है जिनमें की टोटमवाद का दर्शन ही नहीं होता । वास्तव में टोटमवाद केवल उन रहस्यमय संबंधों की ओर निर्देश करता है जो कि टोटम तथा गोत्र समूह के सदस्यों के बीच पाए जाते हैं । इन रहस्य में संबंधों के आधार पर ही कुछ विशेष प्रकार के विश्वासों,प्रथाओं एवं संस्कारों का जन्म होता है । इरोक्यूइस इण्डियनो में तो टोटम जैसे रीछ, कछुआ, साँप आदि केवल गोत्रों के नाम को बताने के लिए ही होते हैं । इनको त्रों का अपने टोटम से इसके अतिरिक्त और कोई दूसरा संबंध, जैसा कि भारत तथा अन्य देशों के जनजातीय समाजों में पाया जाता है नहीं है । श्री मुरडॉक का कथन है कि वास्तव में टोटम गोत्र के लिए केवल एक चिन्ह ( sign ) के रूप में कार्य करता है और उस रूप में वह गोत्र की कुछ प्रमुख विशेषताओं को बताता है । परन्तु श्री मुरडॉक का यह कथन सभी स्थानों पर लागू नहीं होता । उदाहरणार्थः , भारत के जनजातीय समाजों में टोटम केवल एक गोत्र चिन्ह ही नहीं, बल्कि उससे कहीं अधिक महत्व का है । यहां के गोत्र सदस्यों के लिए टोटम कुछ अलौकिक शक्ति संपन्न है और इसीलिए उससे संबंधित कितनेे ही विश्वास, प्रथाएं तथा संस्कार विकसित हो गए हैं । गोत्र को केवल एक चिन्ह मानने से इन सब विश्वासों, प्रथाओं और संस्कारों का विकास कदापि संभव ना होता । इसीलिए संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि टोटमवाद टोटम से संबंधित विश्वासों, प्रथओं तथा संस्कारो का वह योग है जो कि एक गोत्र के सदस्यों को एक सूत्र मेंं बांधता हैं और सामाजिक संगठन को एक विशिष्ट रूप प्रदान करता है ।
रैडक्लिफ ब्राउन के अनुसार - टोटमवाद प्रथाओं और विश्वासों का वह समूह है जिसके द्वारा समाज तथा पशुओं और पौधों एवं अन्य प्राकृतिक वस्तुओं, जो कि सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण है,के बीच संबंधों की एक विशेष व्यवस्था स्थापित हो जाती है ।
गोल्डनवीजर( Golden weiser) ने टोटमवाद के साथ संस्थात्मक 5:00 पर विशेष बल देते हुए लिखा है कि " गोत्रों, उनके टोटल तथा उनसे संबंधित विश्वासों, प्रथाओं व संस्कारों के योग से बनने वाली संस्था को टोटमवाद कहते है ।
हर्षकॉविट्स ( Herskovits ) के अनुसार - टोटमवाद उस धारणा या विश्वास को कहते हैं जिसके अनुसार किसी मानव समुदाय का किन्हीं वनस्पति,पशु या कभी-कभी अन्य कोई प्राकृतिक वस्तु के साथ अलौकिक संबंध माना जाता है ।
उपरोक्त परिभाषाओं की ऊपरी तौर पर विवेचना करने से ऐसा प्रतीत हो सकता है कि धर्म और टोटमवाद में कोई विशेष अंतर नहीं है । श्री दुर्खीम ने तो टोटमवाद को ही समस्त धर्मों का प्राथमिक स्तर माना है । आपके अनुसार ऐसा टोटमवाद प्रकृति से ही संभव हुआ क्योंकि टोटलवाद नैतिक कर्तव्यों और मौलिक विश्वासों की वह समष्टि हैं जिसके द्वारा समाज अर्थात एक गोत्र के सदस्यों और पशु, पौधों या अन्य प्राकृतिक वस्तुओं के बीच एक पवित्र और अलौकिक संबंध स्थापित हो जाता है । यद्यपि श्री दुर्खीम के विचारों में कुछ सत्यता है, फिर भी आज अधिकतर मानव शास्त्री धर्म और टोटमवाद में एक स्पष्ट भेद मानते हैं। विभिन्न ने जनजातीय समाजों के अध्ययन से इस बात की ही पुष्टि होती है कि आदिवासी समाजों में धर्म और टोटल अपना-अपना पृथक अस्तित्व रखते हैं । टोटमवाद में एक गोत्र के सदस्य टोटम से आपने रहस्यमई संबंध को जोड़ते हैं और उसी के आधार पर एक टोटम समूह के सदस्य आपस में शादी विवाह नहीं करते हैं । ये दोनों ही विशेषताएं टोटमवाद में अनिवार्य है, परंतु धर्म में इन दोनों का ही अभाव होता है । अगर धर्म का आधार टोटमवाद ही होता तो अब तक ये दोनों घुल मिलकर एक हो गए होते । साथ ही टोटल सर्वव्यापी नहीं है और ना ही आवश्यक रूप से यह प्रत्येक गोत्र में पाया जाता है । ऐसे अनेक जनजातीय समाज है जिनमें की टोटमवाद का दर्शन ही नहीं होता । वास्तव में टोटमवाद केवल उन रहस्यमय संबंधों की ओर निर्देश करता है जो कि टोटम तथा गोत्र समूह के सदस्यों के बीच पाए जाते हैं । इन रहस्य में संबंधों के आधार पर ही कुछ विशेष प्रकार के विश्वासों,प्रथाओं एवं संस्कारों का जन्म होता है । इरोक्यूइस इण्डियनो में तो टोटम जैसे रीछ, कछुआ, साँप आदि केवल गोत्रों के नाम को बताने के लिए ही होते हैं । इनको त्रों का अपने टोटम से इसके अतिरिक्त और कोई दूसरा संबंध, जैसा कि भारत तथा अन्य देशों के जनजातीय समाजों में पाया जाता है नहीं है । श्री मुरडॉक का कथन है कि वास्तव में टोटम गोत्र के लिए केवल एक चिन्ह ( sign ) के रूप में कार्य करता है और उस रूप में वह गोत्र की कुछ प्रमुख विशेषताओं को बताता है । परन्तु श्री मुरडॉक का यह कथन सभी स्थानों पर लागू नहीं होता । उदाहरणार्थः , भारत के जनजातीय समाजों में टोटम केवल एक गोत्र चिन्ह ही नहीं, बल्कि उससे कहीं अधिक महत्व का है । यहां के गोत्र सदस्यों के लिए टोटम कुछ अलौकिक शक्ति संपन्न है और इसीलिए उससे संबंधित कितनेे ही विश्वास, प्रथाएं तथा संस्कार विकसित हो गए हैं । गोत्र को केवल एक चिन्ह मानने से इन सब विश्वासों, प्रथाओं और संस्कारों का विकास कदापि संभव ना होता । इसीलिए संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि टोटमवाद टोटम से संबंधित विश्वासों, प्रथओं तथा संस्कारो का वह योग है जो कि एक गोत्र के सदस्यों को एक सूत्र मेंं बांधता हैं और सामाजिक संगठन को एक विशिष्ट रूप प्रदान करता है ।
टोटम और टोटमवाद की विशेषतायें : -
उपरोक्त विवेचना के आधार पर हम टोटम और टोटमवाद की निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख कर सकते हैं -
1. - टोटम के साथ एक गोत्र के सदस्य अपना कई प्रकार का गूढ़, अलौकिक तथा पवित्र संबंध मानते हैं ।
2. - टोटम के साथ इस अलौकिक तथा पवित्र संबंध के आधार पर ही यह विश्वास किया जाता है की टोटम उस शक्ति का अधिकारी है जो उस समूह के सदस्यों की रक्षा करती है, उन्हें चेतावनी दे दी तथा उनके भविष्य के कार्यों को निर्देशित करने के लिए भविष्यवाणी करती है । उदाहरणार्थः, अगर एक गोत्र का टोटम एक पक्षी है तो उस गोत्र के सदस्यों में यह विश्वास हो सकता है और होता है कि उस टोटम पक्षी का एक विशेष आवास या ढंग से चिल्लाना इस बात की चेतावनी है कि उस गोत्र समूह पर कोई विपदा आने वाली है । उसी प्रकार अगर टोटम पक्षी या पशु एकाएक मर जाता है तो यह विश्वास किया जाता है कि गोत्र समूह पर आने वाली किसी आफत को टोटम ने अपने ऊपर ले कर समूह के सदस्यों की रक्षा की ।
3. - इसी कारण टोटम के प्रति विशेष भय, श्रद्धा, भक्ति और आदर की भावना होती है । टोटम को मारना, खाना या अन्य किसी भी प्रकार से चोट पहुंचाना निषिद्ध होता है और उसकी मृत्यु पर शोक प्रकट किया जाता है । टोटम, उसकी खाल और उससे संबंधित अन्य वस्तुओं को बहुत पवित्र माना जाता है । टोटम की खाल को विशेष विशेष अवसरों पर धारण किया जाता है । टोटम के चित्र बनाकर या बनवाकर रखे जाते हैं और शरीर पर टोटम के चित्र की गुदाई भी प्रायः सभी लोग करवाते हैं । टोटम संबंधी निषेधों का उल्लंघन करने वालों की समाज द्वारा निंदा की जाती है और दूसरी ओर इससे संबंधित कुछ विशिष्ट नैतिक कर्तव्यों को प्रोत्साहित किया जाता है ।
4. - टोटम के साथ जो गूढ़ और अलौकिक संबंध का दावा किया जाता है, उसी के आधार पर यह विश्वास किया जाता है कि उस गोत्र विशेष के सभी सदस्य उसी से संबंधित हैं और परस्पर भाई भाई या भाई बहन है ।
5. - चूँकि एक टोटम के सभी सदस्य अपने को एक सामान्य टोटम से संबंधित मानते हैं, इस कारण वे कभी भी आपस में विवाह आदि नहीं करते । इस अर्थ में प्रत्येक टोटम समूह बहिर्विवाही होता है और अपने टोटम समूह से बाहर विवाह करता है ।
6. - टोटम के प्रति भय, भक्ति और आदर की जो भावना होती है, वह इस बात पर निर्भर नहीं होती कि कौन-सी वस्तु टोटम है या वह कैसी हैं , क्योंकि टोटम तो प्रायः अहानिकारक पशु या पौधा होता हैं । यदि टोटम कोई हिंसक पशु जैसे शेर, चीता आदि या कोई विषैला जंतु जैसे सांप आदि भी है, तो भी गोत्र के सदस्यों का यह दृढ़ विश्वास होता है कि उससे उन्हें कोई हानि नहीं पहुंचेगी ।
7. - जैसे कि पहले ही कहा जा चुका है, यदि किसी गोत्र का टोटम कोई पशु या पक्षी है तो उसे मारना अथवा उसका मांस खाना वर्जित माना जाता है, परंतु कुछ अपवाद भी हो सकते हैं । उदाहरणार्थः, रेब्बिट गोत्र में, जहां की पशु भोजन का महत्वपूर्ण साधन है, इस प्रकार का कोई भी निषेध नहीं है । उसी प्रकार खाद्य संकट के समय भी उसके मांस का उपयोग किया जा सकता है , इस प्रकार की छूट भी कुछ जनजातीय समाजों में पाई जाती है । परंतु ऐसी स्थिति में टोटम गोत्र के सदस्य कई प्रकार की प्रार्थनाएं तथा धार्मिक व सामाजिक संस्कार करते हुए, अर्थात एक विशेष प्रकार की विधि द्वारा टोटम पशु को मारते हैं । श्री फ्रायड का कथन है कि कभी-कभी पूर्वज - भोज जोकि गोत्र के पूर्वज की पुण्य स्मृति में किया जाता है, के अवसर पर भी टोटम पशु को मारने की और उसके मांस को खाने की छूट होती है । गोत्र का प्रत्येक सदस्य इस भोज को पवित्र मानकर उसमें भाग लेता है ।
सामान्य तौर पर, जैसा कि सर्वश्री मजूमदार और मदान का कथन है टोटमवाद के सबसे आधारभूत लक्षण तीन है -
क. - एक पशु या वनस्पति के प्रत्येक विशिष्ट मनोभाव, ।
ख. - एक गोत्र संगठन,और ।
ग. - गोत्र बहिर्विवाह ।
1. - टोटम के साथ एक गोत्र के सदस्य अपना कई प्रकार का गूढ़, अलौकिक तथा पवित्र संबंध मानते हैं ।
2. - टोटम के साथ इस अलौकिक तथा पवित्र संबंध के आधार पर ही यह विश्वास किया जाता है की टोटम उस शक्ति का अधिकारी है जो उस समूह के सदस्यों की रक्षा करती है, उन्हें चेतावनी दे दी तथा उनके भविष्य के कार्यों को निर्देशित करने के लिए भविष्यवाणी करती है । उदाहरणार्थः, अगर एक गोत्र का टोटम एक पक्षी है तो उस गोत्र के सदस्यों में यह विश्वास हो सकता है और होता है कि उस टोटम पक्षी का एक विशेष आवास या ढंग से चिल्लाना इस बात की चेतावनी है कि उस गोत्र समूह पर कोई विपदा आने वाली है । उसी प्रकार अगर टोटम पक्षी या पशु एकाएक मर जाता है तो यह विश्वास किया जाता है कि गोत्र समूह पर आने वाली किसी आफत को टोटम ने अपने ऊपर ले कर समूह के सदस्यों की रक्षा की ।
3. - इसी कारण टोटम के प्रति विशेष भय, श्रद्धा, भक्ति और आदर की भावना होती है । टोटम को मारना, खाना या अन्य किसी भी प्रकार से चोट पहुंचाना निषिद्ध होता है और उसकी मृत्यु पर शोक प्रकट किया जाता है । टोटम, उसकी खाल और उससे संबंधित अन्य वस्तुओं को बहुत पवित्र माना जाता है । टोटम की खाल को विशेष विशेष अवसरों पर धारण किया जाता है । टोटम के चित्र बनाकर या बनवाकर रखे जाते हैं और शरीर पर टोटम के चित्र की गुदाई भी प्रायः सभी लोग करवाते हैं । टोटम संबंधी निषेधों का उल्लंघन करने वालों की समाज द्वारा निंदा की जाती है और दूसरी ओर इससे संबंधित कुछ विशिष्ट नैतिक कर्तव्यों को प्रोत्साहित किया जाता है ।
4. - टोटम के साथ जो गूढ़ और अलौकिक संबंध का दावा किया जाता है, उसी के आधार पर यह विश्वास किया जाता है कि उस गोत्र विशेष के सभी सदस्य उसी से संबंधित हैं और परस्पर भाई भाई या भाई बहन है ।
5. - चूँकि एक टोटम के सभी सदस्य अपने को एक सामान्य टोटम से संबंधित मानते हैं, इस कारण वे कभी भी आपस में विवाह आदि नहीं करते । इस अर्थ में प्रत्येक टोटम समूह बहिर्विवाही होता है और अपने टोटम समूह से बाहर विवाह करता है ।
6. - टोटम के प्रति भय, भक्ति और आदर की जो भावना होती है, वह इस बात पर निर्भर नहीं होती कि कौन-सी वस्तु टोटम है या वह कैसी हैं , क्योंकि टोटम तो प्रायः अहानिकारक पशु या पौधा होता हैं । यदि टोटम कोई हिंसक पशु जैसे शेर, चीता आदि या कोई विषैला जंतु जैसे सांप आदि भी है, तो भी गोत्र के सदस्यों का यह दृढ़ विश्वास होता है कि उससे उन्हें कोई हानि नहीं पहुंचेगी ।
7. - जैसे कि पहले ही कहा जा चुका है, यदि किसी गोत्र का टोटम कोई पशु या पक्षी है तो उसे मारना अथवा उसका मांस खाना वर्जित माना जाता है, परंतु कुछ अपवाद भी हो सकते हैं । उदाहरणार्थः, रेब्बिट गोत्र में, जहां की पशु भोजन का महत्वपूर्ण साधन है, इस प्रकार का कोई भी निषेध नहीं है । उसी प्रकार खाद्य संकट के समय भी उसके मांस का उपयोग किया जा सकता है , इस प्रकार की छूट भी कुछ जनजातीय समाजों में पाई जाती है । परंतु ऐसी स्थिति में टोटम गोत्र के सदस्य कई प्रकार की प्रार्थनाएं तथा धार्मिक व सामाजिक संस्कार करते हुए, अर्थात एक विशेष प्रकार की विधि द्वारा टोटम पशु को मारते हैं । श्री फ्रायड का कथन है कि कभी-कभी पूर्वज - भोज जोकि गोत्र के पूर्वज की पुण्य स्मृति में किया जाता है, के अवसर पर भी टोटम पशु को मारने की और उसके मांस को खाने की छूट होती है । गोत्र का प्रत्येक सदस्य इस भोज को पवित्र मानकर उसमें भाग लेता है ।
सामान्य तौर पर, जैसा कि सर्वश्री मजूमदार और मदान का कथन है टोटमवाद के सबसे आधारभूत लक्षण तीन है -
क. - एक पशु या वनस्पति के प्रत्येक विशिष्ट मनोभाव, ।
ख. - एक गोत्र संगठन,और ।
ग. - गोत्र बहिर्विवाह ।
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