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धर्म का अर्थ, परिभाषा एवं विशेषताएँ

Meaning, definition and characteristics of religion

मनुष्य सृष्टि का सबसे जिज्ञासु प्राणी है। वह जीवन, प्रकृति और ब्रह्मांड से जुड़े रहस्यों को समझने का निरंतर प्रयास करता आया है। किंतु जब उसे कुछ ऐसी शक्तियों और घटनाओं का अनुभव होता है जिन पर उसका नियंत्रण नहीं होता — जैसे मृत्यु, आपदा, रोग या प्राकृतिक परिवर्तन - तब उसके मन में एक ऐसी अदृश्य शक्ति के अस्तित्व का बोध होता है जो मानव शक्ति से कहीं अधिक प्रबल है।
इस अदृश्य, सर्वशक्तिमान सत्ता के प्रति श्रद्धा, भय और भक्ति की भावना जब संगठित रूप में अभिव्यक्त होती है, तो उसी को “धर्म” कहा जाता है।

धर्म का अर्थ (Meaning of Religion)

“धर्म” शब्द संस्कृत धातु ‘धृ’ से बना है, जिसका अर्थ है - धारण करना, संभालना या स्थिर रखना।
इस दृष्टि से धर्म वह शक्ति है जो व्यक्ति और समाज के जीवन को स्थिरता, संतुलन और दिशा प्रदान करती है।
धर्म केवल पूजा या आस्था का नाम नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक आचरण की वह प्रणाली है जो उसे सत्य, अहिंसा, प्रेम, दया और करुणा जैसे मूल्यों से जोड़ती है।

धर्म का मूल स्वरूप (Nature of Religion)

  1. धर्म का आधार किसी अलौकिक शक्ति या ईश्वर पर विश्वास है।
  2. यह विश्वास केवल मानसिक नहीं, बल्कि भावनात्मक अनुभव पर आधारित है।
  3. धर्म में भय, भक्ति, श्रद्धा, और पवित्रता जैसे भाव निहित रहते हैं।
  4. इसकी अभिव्यक्ति पूजा, प्रार्थना, यज्ञ, उपासना, या आराधना के रूप में होती है।
  5. धर्म मनुष्य को नैतिक नियंत्रण प्रदान करता है और सामाजिक एकता को सुदृढ़ करता है।

धर्म की प्रमुख परिभाषाएँ (Definitions of Religion)

1. एडवर्ड टायलर (Edward Tylor) :-
“धर्म आध्यात्मिक शक्तियों पर विश्वास है।”
व्याख्या :
टायलर की यह परिभाषा धर्म के सबसे सरल और मौलिक स्वरूप को व्यक्त करती है। उनके अनुसार धर्म का मूल तत्व किसी ऐसी अदृश्य आत्मिक शक्ति में विश्वास है जो मानव जीवन को प्रभावित करती है।

2. सर जेम्स फ्रेजर (James Frazer) :-
“धर्म उन शक्तियों की संतुष्टि या आराधना है जो मनुष्य से श्रेष्ठ मानी जाती हैं और जो प्रकृति तथा मानव जीवन को नियंत्रित करती हैं।”
विश्लेषण :-
फ्रेजर ने धर्म के तीन प्रमुख तत्व बताए -
  • धर्म का संबंध मानव से श्रेष्ठ शक्ति से है।
  • यह शक्ति प्रकृति और जीवन को नियंत्रित करती है।
  • मनुष्य का कर्तव्य है कि वह इस शक्ति को पूजा, आराधना या भक्ति के माध्यम से प्रसन्न रखे।
3. हानिगशीम (Honigsheim) :-
“हर वह मानसिक प्रवृत्ति जो इस विश्वास पर आधारित हो कि अलौकिक शक्तियों का अस्तित्व है और उनसे संबंध स्थापित करना संभव व आवश्यक है, धर्म कहलाती है।”
मुख्य बिंदु :
  • धर्म का मूल विश्वास है।
  • यह विश्वास मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति से जुड़ा है।
  • धर्म का स्थान बाहरी अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतर्मन में है।
  • मनुष्य को यह अनुभव होता है कि अलौकिक शक्ति से संबंध न केवल संभव है, बल्कि अर्थपूर्ण भी है।
4. मालिनोवस्की (Malinowski) :-
“धर्म न केवल विश्वासों की एक व्यवस्था है, बल्कि क्रियाओं का एक तरीका भी है। यह समाजशास्त्रीय घटना के साथ-साथ व्यक्तिगत अनुभव भी है।”
विश्लेषण :
मालिनोवस्की की परिभाषा धर्म को व्यापक सामाजिक और व्यक्तिगत दोनों स्तरों पर समझाती है।
उनके अनुसार -
  • धर्म केवल आस्था नहीं, बल्कि व्यवहार और कर्म से जुड़ा है।
  • यह समाज को एक सांस्कृतिक एकता में बाँधता है।
  • धर्म का अनुभव हर व्यक्ति के लिए निजी होता है, किंतु उसका प्रभाव सामाजिक रूप में दिखाई देता है।

धर्म की विशेषताएँ (Characteristics of Religion)

  • अलौकिक शक्ति में विश्वास - धर्म का मूल आधार किसी अदृश्य सत्ता पर आस्था है।
  • भय और श्रद्धा का मिश्रण - धर्म में दैवी दंड का भय और ईश्वर के प्रति प्रेम, दोनों साथ चलते हैं।
  • पूजा और अनुष्ठान - धर्म अपनी अभिव्यक्ति विविध संस्कारों, प्रार्थनाओं और पूजा विधियों के माध्यम से करता है।
  • सामाजिक एकता - धर्म समूहों को जोड़ता है और सामूहिक पहचान प्रदान करता है।
  • नैतिकता का आधार - धर्म मनुष्य के आचरण को नियंत्रित करता है और उसे सन्मार्ग पर प्रेरित करता है।
  • भावनात्मक अनुभव - यह केवल बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि आंतरिक अनुभूति है जो मनुष्य के हृदय में होती है।

धर्म का मनोवैज्ञानिक एवं समाजशास्त्रीय पक्ष

धर्म का एक पक्ष मनोवैज्ञानिक है - क्योंकि यह व्यक्ति के मन, भावनाओं और अनुभवों से उत्पन्न होता है।
दूसरा पक्ष समाजशास्त्रीय है - क्योंकि धर्म समाज में आचरण, नैतिकता और सामूहिक जीवन का मार्गदर्शन करता है।
इस प्रकार धर्म व्यक्ति के अंतर्मन की शांति और समाज की संगठनात्मक एकता दोनों को बनाए रखता है।

धर्म का सार्वभौमिक स्वरूप (Universality of Religion)

धर्म किसी एक युग, देश या संस्कृति तक सीमित नहीं है।
यह मानव सभ्यता की आरंभिक अवस्था से लेकर आज तक सभी समाजों में पाया गया है -
चाहे वह आदिम जनजाति का टोटमवाद हो या आधुनिक समाज का आध्यात्मिक चिंतन -
हर युग में मनुष्य ने किसी न किसी रूप में ईश्वर या अलौकिक सत्ता की उपासना की है।

अतः यह कहा जा सकता है कि 
    “धर्म वह जीवन-पद्धति है जो मनुष्य को स्वयं से, समाज से और परम शक्ति से जोड़ती है।”

धर्म के तत्व, प्रकार एवं समाज में धर्म की भूमिका

1. धर्म के तत्व (Elements of Religion) :-
हर धर्म में कुछ ऐसे मूलभूत तत्व होते हैं जो उसे अन्य सामाजिक संस्थाओं से अलग बनाते हैं। ये तत्व धर्म की संरचना और कार्यप्रणाली दोनों को स्पष्ट करते हैं।
विश्वास (Belief) -
धर्म का सबसे पहला और मूलभूत तत्व है - विश्वास।
यह विश्वास किसी अलौकिक शक्ति, ईश्वर, आत्मा, या परम सत्ता पर होता है।
इसी विश्वास के कारण मनुष्य पूजा, उपासना और नैतिक आचरण की दिशा में प्रेरित होता है।
विश्वास के बिना धर्म केवल कर्मकांड मात्र रह जाता है।

भावना या भक्ति (Faith or Devotion) -
धर्म का दूसरा तत्व है भावना - जो श्रद्धा, भक्ति, प्रेम और भय का मिश्रण होती है।
मनुष्य जब किसी शक्ति के प्रति भावनात्मक रूप से जुड़ता है, तो उसके मन में भक्ति और समर्पण की भावना उत्पन्न होती है।
यही भक्ति धर्म को आंतरिक अनुभूति बनाती है, मात्र रीति-रिवाज नहीं।

पूजा और अनुष्ठान (Rituals and Worship) -
धर्म का व्यावहारिक पक्ष पूजा-पाठ, आराधना, उपवास, दान, या यज्ञ के रूप में प्रकट होता है।
इन क्रियाओं का उद्देश्य ईश्वर को प्रसन्न करना नहीं, बल्कि मनुष्य के मन को शुद्ध और अनुशासित बनाना है।
प्रत्येक समाज में पूजा की विधियाँ भिन्न हो सकती हैं, परंतु उनका भाव समान रहता है - आत्मा को ईश्वर से जोड़ना।

धार्मिक प्रतीक (Religious Symbols) -
प्रत्येक धर्म के अपने कुछ प्रतीक होते हैं - जैसे दीपक, क्रॉस, चंद्र-तारा, त्रिशूल, या ग्रंथ।
ये प्रतीक केवल चिह्न नहीं हैं, बल्कि आस्था के संवेदनात्मक माध्यम हैं जो व्यक्ति में पवित्रता और एकता की भावना जगाते हैं।

धार्मिक संस्था (Religious Organization) -
धर्म को व्यवस्थित बनाए रखने के लिए समाज में कुछ संस्थाएँ निर्मित होती हैं, जैसे — मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर, गुरुद्वारा आदि।
इन्हीं संस्थाओं के माध्यम से धार्मिक शिक्षा, उपदेश और संस्कार पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते हैं।

नैतिकता (Morality) -
धर्म का सबसे गहन तत्व नैतिकता है।
यह मनुष्य को बताता है कि क्या उचित है और क्या अनुचित।
ईमानदारी, सत्य, करुणा, दया, क्षमा - ये सब धार्मिक जीवन के नैतिक स्तंभ हैं।
 
2. धर्म के प्रकार (Types of Religion) :-
विद्वानों ने धर्म के विभिन्न आधारों पर कई प्रकार बताए हैं। प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं -
एकेश्वरवादी धर्म (Monotheistic Religion) -
इन धर्मों में केवल एक ही ईश्वर को सर्वोच्च माना जाता है।
उदाहरण - इस्लाम, ईसाई धर्म, यहूदी धर्म, सिख धर्म।
इन धर्मों में ईश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और सर्वव्यापक होता है।

अनेक-ईश्वरवादी धर्म (Polytheistic Religion) -
इनमें अनेक देवताओं की उपासना की जाती है, और प्रत्येक देवता किसी विशेष शक्ति या क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है।
उदाहरण - हिंदू धर्म, यूनानी धर्म, रोमन धर्म आदि।

प्रकृति-पूजक धर्म (Naturalistic Religion) -
इन धर्मों में सूर्य, चंद्रमा, जल, वायु, अग्नि आदि प्राकृतिक शक्तियों की पूजा की जाती है।
यह सबसे प्राचीन धार्मिक स्वरूप है।

मानवतावादी धर्म (Humanistic Religion) -
इन धर्मों का केंद्रबिंदु मानवता और नैतिकता है, न कि कोई देवता।
उदाहरण - बौद्ध धर्म, जैन धर्म, कन्फ्यूशियसवाद (Confucianism) आदि।
इनमें मनुष्य के आत्मविकास और नैतिक आचरण पर बल दिया जाता है।

टोटमवाद (Totemism) -
इस प्रकार के धर्म में किसी पशु, पौधे या प्राकृतिक वस्तु को कुल या जनजाति का प्रतीक मानकर पूजा जाता है।
उदाहरण - कुछ आदिवासी समाजों में सर्प, वृक्ष, चील, या पत्थर की पूजा।

सर्वेश्वरवाद (Pantheism) -
इस विचार में ईश्वर और ब्रह्मांड एक ही हैं।
प्रकृति, मनुष्य और समस्त जगत में ईश्वर का वास माना जाता है।
यह विचार उपनिषदों और वेदांत दर्शन में विशेष रूप से मिलता है।

3. समाज में धर्म की भूमिका (Role of Religion in Society) :-
धर्म केवल व्यक्तिगत आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक संगठन की भी आधारशिला है।
इसकी भूमिकाएँ निम्नलिखित हैं -

सामाजिक एकता और संगठन (Social Unity and Organization) -
धर्म समाज के सदस्यों को समान विश्वास और मूल्य प्रणाली से जोड़ता है।
यह सामूहिक प्रार्थना, त्योहारों और अनुष्ठानों के माध्यम से सामाजिक बंधन को सुदृढ़ करता है।
डरखाइम (Durkheim) के अनुसार -
“धर्म समाज का आत्मबोध है; जब व्यक्ति धर्म की पूजा करता है, तो वास्तव में वह समाज की ही पूजा करता है।”

नैतिक मार्गदर्शन (Moral Guidance) -
धर्म व्यक्ति को सदाचार, सत्यनिष्ठा, अहिंसा और परोपकार जैसे गुण सिखाता है।
यह सामाजिक नियंत्रण का एक प्रभावी माध्यम है क्योंकि लोग धार्मिक भय या पुण्य-कर्म के विचार से अनुशासित रहते हैं।

मानसिक संतुलन और शांति (Mental Peace and Stability) -
धर्म मनुष्य को आशा और धैर्य देता है।
कठिनाइयों में जब मनुष्य असहाय महसूस करता है, धर्म उसे सांत्वना और आत्मबल प्रदान करता है।
इस प्रकार यह मानसिक तनाव को कम कर मनोवैज्ञानिक संतुलन बनाए रखता है।

संस्कृति का संरक्षण (Preservation of Culture) -
धर्म संस्कृति का प्रमुख वाहक है।
वह समाज की परंपराओं, भाषा, कला, संगीत और नैतिक मानदंडों को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाता है।

सामाजिक नियंत्रण (Social Control) -
धर्म नियमों, व्रतों और नैतिक उपदेशों के माध्यम से समाज में अनुशासन स्थापित करता है।
अच्छे कार्यों के लिए पुण्य और बुरे कार्यों के लिए पाप की धारणा व्यक्ति को मर्यादित रखती है।

मानव सेवा और सहयोग की प्रेरणा (Inspiration for Service and Cooperation) -
धर्म व्यक्ति को सेवा, दान, करुणा, और समरसता के आदर्शों से जोड़ता है।
इसी के कारण समाज में परस्पर सहायता, परोपकार और सहयोग की भावना विकसित होती है।

सामाजिक परिवर्तन (Social Change) -
यद्यपि धर्म परंपरा को बनाए रखता है, परंतु समय-समय पर धर्म ने समाज में सुधार और परिवर्तन की भूमिका भी निभाई है।
उदाहरण - बुद्ध, नानक, महावीर, कबीर, विवेकानंद जैसे धर्मसुधारकों ने सामाजिक समानता और मानवता का संदेश दिया।

4. धर्म की सीमाएँ (Limitations of Religion) :-
जहाँ धर्म समाज में नैतिकता लाता है, वहीं कभी-कभी अंधविश्वास, रूढ़िवादिता और विभाजन का कारण भी बन जाता है।
अतः आवश्यक है कि धर्म को मानवता और विवेक के साथ जोड़ा जाए, न कि कट्टरता और स्वार्थ के साथ।

धर्म और समाज - परस्पर संबंध एवं आधुनिक युग में धर्म की प्रासंगिकता

1. धर्म और समाज का परस्पर संबंध (Interrelationship between Religion and Society) :-
धर्म और समाज एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।
दोनों का विकास समानांतर रूप से हुआ है - जहाँ समाज ने धर्म को जन्म दिया, वहीं धर्म ने समाज को दिशा दी।

समाजशास्त्रियों का मत है कि धर्म समाज की आत्मा है, और समाज धर्म की अभिव्यक्ति।
एक के बिना दूसरा अधूरा है।
 
समाज में धर्म की उत्पत्ति :-
धर्म की उत्पत्ति समाज की आवश्यकताओं से हुई है।
प्राचीन मानव जब प्राकृतिक शक्तियों से भयभीत था - बिजली, वर्षा, भूकंप आदि को वह अलौकिक मानता था।
इनसे सुरक्षा की भावना ने ही धर्म का रूप लिया।
इस प्रकार धर्म मानव समाज के भय, अनुभव, और आस्था का परिणाम है।

धर्म सामाजिक संरचना का आधार है :-
हर समाज की संरचना - जैसे विवाह, परिवार, नैतिकता, त्योहार, और कर्तव्य - धर्म से प्रभावित रहती है।
धर्म यह निर्धारित करता है कि व्यक्ति का आचरण कैसा हो, उसे किन नियमों का पालन करना चाहिए, और जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या है।

धर्म सामाजिक एकता का माध्यम है :-
धर्म समाज को जोड़ने वाली शक्ति है।
प्रार्थना, उत्सव, तीर्थयात्रा, और धार्मिक अनुष्ठान लोगों को एक समान भाव से जोड़ते हैं।
डरखाइम के शब्दों में -
“धर्म समाज की सामूहिक चेतना का प्रतीक है।”

धर्म सामाजिक नियंत्रण का साधन है :-
धर्म व्यक्ति के व्यवहार को नैतिक सीमाओं में बाँधता है।
“पाप-पुण्य”, “स्वर्ग-नरक”, “कर्म-फल” जैसे विचार लोगों को अनुशासित रखते हैं।
इससे समाज में अपराध, हिंसा और असामाजिक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण संभव होता है।
 
धर्म सामाजिक परिवर्तन का कारक है :-
धर्म केवल परंपरा का रक्षक ही नहीं, सुधार का प्रेरक भी है।
महात्मा बुद्ध, गुरु नानक, महावीर, कबीर और स्वामी विवेकानंद जैसे संतों ने धर्म के माध्यम से समाज में नवजागरण और समानता का संदेश दिया।
 
धर्म और सामाजिक असमानता :-
कभी-कभी धर्म ने समाज में वर्गभेद, जातिवाद, या स्त्री-पुरुष असमानता को भी वैधता दी है।
यही कारण है कि आधुनिक समाज में धर्म का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है - ताकि वह समानता और न्याय का माध्यम बने, न कि भेदभाव का।
 
2. धर्म का समाजशास्त्रीय विश्लेषण (Sociological Perspectives on Religion) :-
विभिन्न समाजशास्त्रियों ने धर्म और समाज के संबंध को अलग-अलग दृष्टिकोणों से समझाया है -
एमिल डरखाइम (Émile Durkheim) -
डरखाइम के अनुसार -
“धर्म एक सामाजिक तथ्य है। यह पवित्र और अपवित्र के बीच अंतर करने वाली मान्यताओं और क्रियाओं की प्रणाली है।”

उनके मत में धर्म समाज की सामूहिक चेतना को बनाए रखता है और लोगों को एक साझा मूल्य प्रणाली से जोड़ता है।
धार्मिक अनुष्ठान समाज में एकता, सहयोग और स्थिरता लाते हैं।

कार्ल मार्क्स (Karl Marx) -
मार्क्स ने धर्म को “जनता का अफीम” कहा।
उनके अनुसार धर्म शोषित वर्ग को झूठी सांत्वना देता है और उन्हें अपने अधिकारों से विमुख रखता है।
धर्म सामाजिक विषमता को बनाए रखने का एक साधन बन जाता है।
हालाँकि आधुनिक विचारक मानते हैं कि धर्म का उपयोग सकारात्मक परिवर्तन हेतु भी किया जा सकता है, यदि वह मानव कल्याण की दिशा में कार्य करे।
 
मैक्स वेबर (Max Weber) -
वेबर ने धर्म को समाज की आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना से जोड़ा।
अपनी प्रसिद्ध कृति “The Protestant Ethic and the Spirit of Capitalism” में उन्होंने कहा कि

“प्रोटेस्टेंट ईसाई धर्म की नैतिकता ने यूरोप में पूँजीवाद के विकास को बढ़ावा दिया।”
अर्थात धर्म आर्थिक व्यवस्था को भी प्रभावित कर सकता है।

मैलिनोवस्की (Malinowski) -
वे धर्म को समाज की मानसिक सुरक्षा प्रणाली मानते हैं।
उनके अनुसार धर्म व्यक्ति को अनिश्चितताओं से निपटने का साहस देता है और मानसिक संतुलन बनाए रखता है।
 
3. आधुनिक युग में धर्म की प्रासंगिकता (Relevance of Religion in the Modern Era) :-
विज्ञान, प्रौद्योगिकी, और वैश्वीकरण के युग में धर्म की भूमिका बदल अवश्य गई है, पर समाप्त नहीं हुई है।
वास्तव में, आधुनिक समाज को धर्म की उतनी ही आवश्यकता है जितनी पहले थी - बस रूप बदल गया है।

आध्यात्मिक आवश्यकता -
भौतिक प्रगति ने मनुष्य को सुख-सुविधाएँ दी हैं, पर आत्मिक शांति छीन ली है।
धर्म आज भी मनुष्य को आत्म-ज्ञान, ध्यान और मानसिक संतुलन की शिक्षा देता है।

नैतिक दिशा -
आधुनिक युग में नैतिक मूल्य क्षीण हो रहे हैं - प्रतिस्पर्धा, उपभोक्तावाद, और स्वार्थ का बोलबाला है।
ऐसे समय में धर्म नैतिकता का दीपक बनकर मनुष्य को सही दिशा दिखाता है।

सामाजिक सेवा का माध्यम -
आज धर्म केवल पूजा नहीं, बल्कि मानव सेवा का माध्यम बन चुका है।
धार्मिक संस्थाएँ शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा सहायता और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में सक्रिय हैं।

सांस्कृतिक पहचान का आधार -
वैश्वीकरण के इस दौर में जहाँ स्थानीय संस्कृतियाँ विलुप्त हो रही हैं, वहाँ धर्म सांस्कृतिक पहचान का रक्षक है।
त्योहार, परंपराएँ, और धार्मिक ग्रंथ समाज को उसकी जड़ों से जोड़े रखते हैं।

सामाजिक सामंजस्य और शांति -
यदि धर्म का सही रूप अपनाया जाए, तो वह अंतरराष्ट्रीय सद्भावना और शांति का माध्यम बन सकता है।
सच्चा धर्म न तो हिंसा सिखाता है, न विभाजन — बल्कि “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना फैलाता है।

4. धर्म के समकालीन चुनौतियाँ (Contemporary Challenges of Religion) :-
आधुनिक युग में धर्म कई चुनौतियों का सामना कर रहा है -
  • कट्टरवाद और आतंकवाद - धार्मिक नाम पर हिंसा बढ़ रही है।
  • राजनीतिक हस्तक्षेप - धर्म को राजनीति का उपकरण बनाया जा रहा है।
  • अंधविश्वास और अज्ञानता - विज्ञान के युग में भी कई जगह धर्म के नाम पर कुरीतियाँ बनी हुई हैं।
  • धर्मनिरपेक्षता की गलत व्याख्या - लोग धर्म को त्यागना आधुनिकता समझने लगे हैं।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए धर्म का मानववादी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।

5. धर्म की भावी दिशा (Future of Religion) :-
आने वाले समय में धर्म का स्वरूप मानव-केन्द्रित होना चाहिए -
जहाँ ईश्वर से अधिक महत्व मानवता, करुणा और सत्य को दिया जाए।
भविष्य का धर्म वह होगा जो -
  • भेदभाव मिटाए,
  • वैश्विक एकता का संदेश दे,
  • और विज्ञान तथा आध्यात्मिकता का संतुलन बनाए रखे।
आधुनिक युग में धर्म का स्वरूप बदल जरूर गया है, पर उसकी प्रासंगिकता अविचल है।
सच्चा धर्म वह है जो मनुष्य को प्रेम, समानता और शांति का संदेश दे।

“धर्म वह नहीं जो बांटता है, बल्कि वह जो जोड़ता है।”
- यही धर्म और समाज का शाश्वत संबंध है।

धर्म, संस्कृति और नैतिकता का परस्पर संबंध

मानव सभ्यता के विकास में धर्म, संस्कृति और नैतिकता तीनों ही ऐसे आधारस्तंभ हैं जिनके बिना समाज की कल्पना अधूरी है।
धर्म मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन का मार्गदर्शक है, संस्कृति उसके सामाजिक जीवन की अभिव्यक्ति है, और नैतिकता उसके व्यक्तिगत आचरण की सीमा रेखा है।

तीनों एक ही वृक्ष की शाखाओं के समान हैं - जहाँ धर्म जड़ है, संस्कृति उसका तना, और नैतिकता उसकी फल-फूल के रूप में अभिव्यक्ति।

1. धर्म और संस्कृति का संबंध (Relation between Religion and Culture) :-
धर्म और संस्कृति एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।
धर्म समाज के आदर्श, मूल्य और विश्वास निर्धारित करता है, जबकि संस्कृति उन्हें व्यवहारिक रूप प्रदान करती है।

धर्म संस्कृति का प्रेरक है -
हर संस्कृति की जड़ में उसका धर्म निहित होता है।
भारतीय संस्कृति के मूल में वैदिक धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, और भक्ति परंपरा का योगदान रहा है।
इनके माध्यम से ही अहिंसा, सत्य, करुणा, और सहिष्णुता जैसे मूल्य संस्कृति में समाहित हुए।

संस्कृति धर्म की बाह्य अभिव्यक्ति है :-
धर्म मनुष्य की आंतरिक चेतना है, जबकि संस्कृति उसकी बाह्य क्रियाओं में प्रकट होती है।
त्योहार, लोककला, संगीत, नृत्य, साहित्य - यह सब धर्म की ही सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ हैं।
उदाहरण के लिए - दीपावली केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की प्रकाश और आशा की परंपरा का प्रतीक है।

धर्म संस्कृति को स्थायित्व देता है :-
धर्म समाज को स्थायी नैतिक आधार प्रदान करता है, जिससे संस्कृति दीर्घकाल तक जीवित रहती है।
इसीलिए भारतीय संस्कृति हजारों वर्षों से अपने मूल्यों को सुरक्षित रख सकी है, भले ही बाहरी प्रभाव आते रहे हों।

2. धर्म और नैतिकता का संबंध (Relation between Religion and Morality) :-
धर्म और नैतिकता दोनों मनुष्य के आचरण को नियंत्रित करते हैं, परंतु दोनों का क्षेत्र भिन्न है।
धर्म “ईश्वर की इच्छा” पर आधारित है, जबकि नैतिकता “मानव कल्याण” पर।
फिर भी दोनों का अंतिम उद्देश्य एक ही है - सदाचार और सत्य का पालन।

धर्म नैतिकता का आधार है -
धर्म यह सिखाता है कि क्या उचित है और क्या अनुचित।
“सत्य बोलो”, “अहिंसा अपनाओ”, “दूसरों का सम्मान करो” - यह सब धार्मिक उपदेश हैं, जो नैतिक नियमों में परिवर्तित हो गए हैं।

नैतिकता धर्म की आत्मा है -
यदि धर्म केवल अनुष्ठान बन जाए और उसमें नैतिकता न रहे, तो वह खोखला रह जाता है।
सच्चा धर्म वही है जो मनुष्य में सद्भाव, दया, और ईमानदारी जैसे गुणों को विकसित करे।
जैसा कि गांधीजी ने कहा था -
“धर्म का कोई मूल्य नहीं यदि वह नैतिकता से रिक्त हो।”

धर्म और नैतिकता में भिन्नता -
धर्म अक्सर समाज-विशिष्ट होता है - हिन्दू धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म आदि,
पर नैतिकता सार्वभौमिक है - सत्य, प्रेम, करुणा हर समाज में समान रूप से मान्य हैं।
अतः नैतिकता धर्म से ऊपर की श्रेणी में आती है।

3. संस्कृति और नैतिकता का संबंध (Relation between Culture and Morality) :-
संस्कृति वह माध्यम है जिससे समाज अपनी नैतिक मान्यताओं को पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित करता है।

नैतिकता संस्कृति का हृदय है -
संस्कृति केवल कला, साहित्य या परंपरा नहीं है - उसमें नैतिक मूल्यों की आत्मा बसती है।
यदि संस्कृति से नैतिकता हट जाए, तो वह केवल बाहरी आडंबर बनकर रह जाएगी।

सांस्कृतिक व्यवहार में नैतिकता की झलक -
परिवार के बुजुर्गों का आदर करना, अतिथि का स्वागत, दान, सेवा - यह सब सांस्कृतिक व्यवहार हैं जो नैतिक मूल्यों को दर्शाते हैं।
अतः संस्कृति नैतिकता का जीवंत रूप है।

नैतिक पतन से संस्कृति का पतन -
जब समाज में नैतिकता घटती है, तब संस्कृति भी क्षीण हो जाती है।
आज उपभोक्तावाद और प्रतिस्पर्धा के युग में संस्कृति के व्यापारिक रूप का बढ़ना इसी का उदाहरण है।
इसलिए नैतिक मूल्यों का पुनर्जीवन आवश्यक है।

5. आधुनिक युग में इनका महत्व (Importance in Modern Context) :-
आज का युग विज्ञान, तर्क और वैश्वीकरण का है।
फिर भी धर्म, संस्कृति और नैतिकता की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है -
  • धर्म हमें आंतरिक स्थिरता और आत्मविश्वास देता है।
  • संस्कृति हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखती है।
  • नैतिकता हमें गलत रास्तों से बचाती है और समाज में विश्वास कायम रखती है।
यदि इन तीनों का संतुलन बिगड़ जाए, तो समाज में अराजकता, हिंसा और विभाजन उत्पन्न होता है।

“धर्म, संस्कृति और नैतिकता - तीनों मिलकर मानवता का संपूर्ण रूप बनाते हैं।”


धर्म का अर्थ एवं धर्म की परिभाषा

मानव संसार की समस्त घटनाओं या सृष्टि के रहस्यों को नहीं समझ पाता है । अपने जीवन के रोज के अनुभवों से वह यह सीखता है कि अनेक ऐसी घटनाएं है जिन पर उसका कोई वश नहीं है । स्वभावतः ही उसमें यह धारणा पनपती है कि कोई एक ऐसी भी शक्ति है जो कि दिखाई नहीं देती, परंतु वह किसी भी मनुष्य से कहीं अधिक शक्तिशाली है । यह शक्ति अलौकिक शक्ति है ; इसे डरा धमका कर या ऐसे अन्य किसी उपाय से अपने वश में नहीं किया जा सकता है । इस शक्ति को अपने पक्ष में लाने का एकमात्र उपाय इस के सम्मुख सिर झुका कर पूजा, प्रार्थना या आराधना करना है । इस अलौकिक शक्ति से संबंधित विश्वासों और क्रियाओं को ही धर्म कहते हैं ।

इसके विपरीत कुछ ऐसी शक्तियां भी है जो कि मनुष्य की अपनी शक्ति से अधिक शक्तिशाली है ; परंतु इन पर कुछ निश्चित तरीकों से अधिकार किया जा सकता है । इसीलिए मानव इस शक्ति के सामने झुकने के बजाय इस पर अपना अधिकार स्थापित करके उससे अपने उद्देश्यों की पूर्ति करवाता है । इसी को जादू कहते हैं । उपरोक्त दो प्रकार की शक्तियों को और अच्छी तरह समझने के लिए हम अब धर्म और जादू की अलग-अलग विस्तार पूर्वक विवेचना करेंगे ।

धर्म :- Religion -
धर्म की परिभाषा : - 

धर्म में किसी न किसी प्रकार की अति मानवीय या अलौकिक या समाजोंपरि शक्ति पर विश्वास है, जिसका आधार भय, श्रद्धा, भक्ति और पवित्रता की धारणा है और जिसकी अभिव्यक्ति प्रार्थना, पूजा या आराधना है । उपरोक्त परिभाषा आदिम और आधुनिक दोनों प्रकार के समाजों में पाए जाने वाले धर्मों की एक सामान्य व्याख्या है । प्रत्येक धर्म का आधार किसी शक्ति पर विश्वास है और यह शक्ति मानव शक्ति से अवश्य ही श्रेष्ठ है । परंतु केवल विश्वास से ही धर्म संपूर्ण नहीं है । इस विश्वास का एक भावनात्मक आधार भी होता है, जैसे उस शक्ति के संबंध में भय या उसके दंड का है । साथ ही, उस शक्ति के प्रति श्रद्धा, भक्ति या प्रेम भाव भी धर्म का आवश्यक अंग है । उसे शक्ति से लाभ उठाने के लिए और उसके कोप से बचने के लिए प्रार्थना, पूजा या आराधना करने की विधियां या संस्कार भी हुआ करते हैं । 
        इन धार्मिक क्रियाओं में अलग-अलग समाज में अलग-अलग तरह की धार्मिक सामग्रियों, धार्मिक प्रतीकों और जादू टोने, पौराणिक कथाओं आदि का समावेश होता है । उस शक्ति का , जिस पर विश्वास किया जाता है, रूप और स्वरूप भी प्रत्येक समाज में अलग-अलग होता है । कहीं तो निराकार शक्ति की आराधना की जाती है और कहीं उस शक्ति का साकार रूप ( मूर्ति या प्रतिमा ) पूजा जाता है । संक्षेप में, इस अलौकिक शक्ति से संबंधित समस्त विश्वासों, भावनाओं और क्रियाओं के सम्मिलित रूप को धर्म कहते हैं ।
 
आधुनिक मानव शास्त्र के प्रवर्तक एडवर्ड टायलर ने ही शायद सर्वप्रथम सबसे कम शब्दों में धर्म की सबसे विस्तृत परिभाषा प्रस्तुत की थी । आपके अनुसार " धर्म आध्यात्मिक शक्ति पर विश्वास है ।"

सर जेम्स फ्रेजर के अनुसार धर्म की प्रकृति और भी निश्चित है । आपने लिखा है, " धर्म से मैं मनुष्य से श्रेष्ठ उन शक्तियों की संतुष्टि या आराधना समझता हूं जिनके संबंध में यह विश्वास किया जाता है कि वे प्रकृति और मानव जीवन को मार्ग दिखलाती और नियंत्रित करती है ।" इस परिभाषा से स्पष्ट है कि श्री फ्रेजर ने धर्म के तीन प्रमुख पहलुओं पर बल दिया है । प्रथम तो यह कि धर्म का संबंध एक ऐसी शक्ति से होता है जो कि मानव शक्ति से श्रेष्ठ है । दूसरी बात यह है कि यह वह शक्ति है जो की प्रकृति तथा मानव जीवन को निर्देशित अथवा नियंत्रित करती है । और तीसरी बात यह है कि यह शक्ति मनुष्य शक्ति से श्रेष्ठ है और क्योंकि वह प्रकृति तथा मानव जीवन को निर्धारित तथा नियंत्रित करने वाली है इस कारण भलाई इसी में है कि उसे खुश रखा जाए चाहे वह खुश रहने का तरीका आराधना हो, या पूजा हो या और कुछ । धर्म के अंतर्गत ये तीनों तत्व सम्मिलित है ।

कुछ विद्वानों ने अपनी परिभाषा में मानसिक या मनोवैज्ञानिक पक्ष पर अधिक बल दिया है । उदाहरणार्थः, हानिगशीम ( Honigsheim ) के अनुसार "प्रत्येक मनोवृति जो कि इस विश्वास पर आधारित या इस विश्वास से संबंधित है कि अलौकिक शक्तियों का अस्तित्व है और उनसे संबंध स्थापित करना संभव व महत्वपूर्ण है, धर्म कहलाती है ।" इस परिभाषा में हानिगशीम ने चार बातों पर बल दिया है ।
     पहली बात तो यह है कि प्रत्येक धर्म का आधार विश्वास है । अविश्वास के क्षेत्र में धर्म का प्रवेश नहीं हो सकता है अर्थात जहां अविश्वास है वहां से धर्म भी दूर है क्योंकि धर्म तो मनुष्य के विश्वास पर ही टिका हुआ है । दूसरी बात यह है कि धर्म इस विश्वास से संबंधित मानव की मनोवृति है । यह दोनों ही मनोवैज्ञानिक तत्व है । धर्म की यह विशेषता संभवतः इस ओर संकेत करती है कि धर्म कोई बाहरी घटना नहीं है, धर्म तो एक आंतरिक अनुभूति है, इसका स्थान तो मनुष्य के हृदय में है । तीसरी बात यह है कि मनुष्यों में इस बात का भी विश्वास होना चाहिए कि अलौकिक शक्तियों का अस्तित्व है और मनुष्यों के लिए यह संभव है कि वे इन शक्तियों से अपना संबंध स्थापित करें । यह धर्म की एक बहुत ही रोचक विशेषता है । धर्म में शक्तियां अलौकिक है, फिर भी वे अपनी ही है और क्योंकि अपनी है इसी कारण उनसे संबंध स्थापित करना संभव है । भक्तों के भगवान अर्थात भगवान भक्तों के ( मतलब जो उन पर विश्वास करता है उनके ) ही आत्मजन होते हैं, इस कथन में धर्म की उपरोक्त तीसरी विशेषता ही झलकती है । और चौथी बात यह है कि अलौकिक शक्ति से केवल संबंध स्थापित ही नहीं हो सकता है बल्कि ये संबंध मनुष्यों के लिए महत्वपूर्ण है ।

मैलिनोवस्की (Malinowaski) :-

धर्म के समाजशास्त्रीय तथा मनोवैज्ञानिक दोनों ही पहलुओं को एक सा महत्वपूर्ण मानते हैं । इसी आधार पर आपके अनुसार " धार्मिक रिया का एक तरीका है और साथ ही विश्वासों की एक व्यवस्था भी ; और धर्म एक समाजशास्त्रीय घटना के साथ-साथ एक व्यक्तिगत अनुभव भी है । इस कथन से धर्म की चार प्रमुख विशेषताएं स्पष्ट है । पहली विशेषता यह है कि धर्म विश्वासों की एक व्यवस्था है । यह विश्वास किसी अलौकिक शक्ति, आत्मा, परमात्मा या और किसी पर हो सकता है । ये विश्वासों की एक व्यवस्था इस अर्थ में है कि उस अलौकिक शक्ति पर कुछ परंपरा स्वीकृति तरीकों से विश्वास करती है या उसके विषय में चिंता करते हैं । उदाहरणार्थः , एक समाज अपने धर्म के अंतर्गत निराकार शक्ति पर विश्वास करता है, तो वह समाज उस निराकार शक्ति के बारे में जो कुछ सोचेगा या जिस ढंग से सोचेगा वह उस समाज के ढंग से भिन्न होगा, जहां साकार शक्ति पर विश्वास किया जाता है । धर्म की दूसरी विशेषता यह है कि प्रत्येक धर्म में विश्वासों से संबंधित कुछ क्रियाएं या कर्म होते हैं । अर्थात धार्मिक विश्वास उस शक्ति के प्रति मनुष्य को निष्क्रिय या उदासीन रहने नहीं देता । उसे काम करना पड़ता है और इस कर्म की अभिव्यक्ति प्रार्थना, पूजा-पाठ या आराधना के रूप में होती है । धर्म की तीसरी विशेषता यह है कि धार्मिक सामाजिक घटना है । एक ही समाज में प्रत्येक व्यक्ति का अलग-अलग धर्म है, ऐसा देखा नहीं गया । धर्म की चौथ की विशेषता यह है कि धर्म को मानना या न मानना स्वयं व्यक्ति के ऊपर निर्भर करता है और यह बात उसके व्यक्तिगत अनुभवों द्वारा प्रभावित होती है । हो सकता है कि एक हिंदू के जीवन में कुछ ऐसे अनुभव हो जिसके कारण वह हिंदू धर्म को त्याग कर इस्लाम को अपना ले । धर्म की यह विशेषता अनुभव द्वारा प्राप्त व्यक्ति की अपनी मानसिक स्थितियों पर बल देती है ।

ऐसे तो धर्म की असंख्य परिभाषाएं विभिन्न विद्वानों ने प्रस्तुत की है फिर भी धर्म का सामान्य स्वरूप उपरोक्त परिभाषाओं व विवेचना से काफी स्पष्ट हो जाता है ।


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