Emotionally Disturbed Children: Meaning, Definition, Characteristics and Causes
इनकी भावनात्मक अस्थिरता के कारण इनका व्यवहार समाज की अपेक्षाओं से अलग दिखाई देता है। शिक्षा-संस्थान या घर-परिवार में इन्हें प्रायः “समस्या बालक” के रूप में देखा जाता है, जबकि वास्तविकता में ये बच्चे अंतरात्मा के तनाव और असुरक्षा की भावना से ग्रस्त होते हैं।
ऐसे बालकों को प्रेम, स्नेह, सुरक्षा, सहयोग और स्वीकार्यता की अधिक आवश्यकता होती है। यदि परिवार और समाज इनकी भावनात्मक आवश्यकताओं की अनदेखी करें, तो उनमें भीतरी तनाव, अविश्वास और अलगाव की प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है।
संवेगात्मक विक्षिप्त बालक वे होते हैं जिनमें किसी शारीरिक या बौद्धिक हानि के बिना ही संवेगात्मक असंतुलन पाया जाता है। वे सामान्य परिस्थितियों में उचित प्रतिक्रिया नहीं दे पाते और उनके व्यवहार में असामान्यता दिखाई देती है।
2. फिलिप्स (Phillips, 1967) के अनुसार –
“विक्षिप्त बालक वह होता है जिसका व्यवहार सामान्य बालकों से इतना अलग होता है कि वह समाज के स्थापित नियमों और मान्यताओं का पालन नहीं कर पाता।”
3. सामान्य परिभाषा :-
संवेगात्मक विक्षिप्त बालक वह होता है जो अपनी भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर पाता और इस कारण उसका व्यवहार अस्थिर, अनुचित या समाजविरोधी प्रतीत होता है, यद्यपि उसकी बुद्धि और शरीर सामान्य रूप से स्वस्थ रहते हैं।
शिक्षण कठिनाई (Learning Difficulty) :-
ये बालक सीखने में रुचि नहीं लेते, ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते और विद्यालयीन कार्यों में पीछे रह जाते हैं।
पारस्परिक संबंधों में कठिनाई (Poor Social Adjustment) :-
ऐसे बच्चे साथियों और शिक्षकों के साथ सामंजस्य नहीं बना पाते। इनमें सहयोग भावना कम होती है और संघर्ष या झगड़े की प्रवृत्ति अधिक होती है।
असामान्य व्यवहार (Abnormal Conduct) :-
सामान्य परिस्थितियों में भी इनका व्यवहार अनुचित या असंतुलित रहता है — कभी अत्यधिक चंचल, तो कभी अत्यधिक उदास।
तनावपूर्ण भावनाएँ (Emotional Instability) :-
ये बच्चे हमेशा किसी न किसी तनाव, चिंता या भय में रहते हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास कम हो जाता है।
शारीरिक लक्षण (Physical Signs) :-
अक्सर इनकी नींद, भूख, या स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। कुछ बच्चों में कंपकंपी, भयभीत दृष्टि या बेचैनी देखी जा सकती है।
गंभीरता के स्तर (Severity Level) :-
जब तक इनकी विक्षिप्तता हल्की रहती है, तब तक व्यवहार सामान्य रहता है; परंतु गंभीर होने पर वे सामाजिक और शैक्षिक दोनों क्षेत्रों में असामंजस्य दिखाने लगते हैं।
इनका IQ सामान्य (लगभग 90) के आस-पास होता है, परंतु शिक्षा-संबंधी उपलब्धियाँ औसत से कम रहती हैं। अक्सर यह विद्यालय से अनुपस्थित रहते हैं या गणित जैसी विषयों से बचते हैं।
सामाजिक एवं संवेगात्मक पक्ष (Social and Emotional Aspect) :-
इनमें गुस्सा, झगड़ालूपन, और दूसरों से दूरी बनाए रखने की प्रवृत्ति रहती है। ये अच्छे मित्र नहीं बना पाते और समाज से स्वयं को अलग अनुभव करते हैं।
व्यवहारिक पक्ष (Behavioral Aspect) :-
ऐसे बालक गृहकार्य अधूरा छोड़ देते हैं, कक्षा में शोर मचाते हैं, शिक्षकों के प्रश्नों का असंगत उत्तर देते हैं और कभी-कभी अनुशासनहीन व्यवहार प्रदर्शित करते हैं।
जैव-भौतिक कारण (Bio-Physical Factors) :-
शरीर में रासायनिक या हार्मोनल असंतुलन के कारण भावनाओं का नियंत्रण बिगड़ जाता है। नींद, भूख या हार्मोनल परिवर्तन भी अस्थिरता बढ़ाते हैं।
सामाजिक कारण (Social Factors) :-
पारिवारिक कलह, माता-पिता में झगड़े, आर्थिक असुरक्षा, या उपेक्षा जैसी परिस्थितियाँ बालक के मन में असुरक्षा और क्रोध उत्पन्न करती हैं।
व्यवहारात्मक कारण (Behavioral Factors) :-
अनुचित व्यवहार की आदतें – जैसे झूठ बोलना, चोरी करना, या हिंसा करना – धीरे-धीरे स्थायी हो जाती हैं और बालक के भावनात्मक जीवन को असंतुलित करती हैं।
मनोवैज्ञानिक कारण (Psychological Factors) :-
जब बच्चे की आवश्यकताएँ (जैसे स्नेह, मान्यता, सुरक्षा) पूरी नहीं होतीं, तो वह आंतरिक तनाव अनुभव करता है। यह तनाव अचेतन मस्तिष्क में दबा रहकर बाद में असामान्य व्यवहार के रूप में प्रकट होता है।
पारिस्थितिक कारण (Ecological Factors) :-
स्वाय और सहयोगियों (Schwair and Associates) के अनुसार, संवेगात्मक विक्षिप्तता का मूल कारण बालक और उसके वातावरण के बीच अनुकूलता का अभाव है। जब वातावरण बालक की अपेक्षाओं से मेल नहीं खाता, तब उसमें भावनात्मक अस्थिरता विकसित होती है।
संवेगात्मक विक्षिप्त बालक मूलतः बीमार या अक्षम नहीं होते, बल्कि उन्हें उचित भावनात्मक सहयोग, समझदारी और अनुकूल वातावरण की आवश्यकता होती है।
शिक्षकों, अभिभावकों और परामर्शदाताओं को चाहिए कि वे ऐसे बच्चों के साथ सहानुभूति, धैर्य और सकारात्मक दृष्टिकोण रखें।
समुचित मार्गदर्शन, परामर्श, और प्रेमपूर्ण व्यवहार से इनमें न केवल सुधार लाया जा सकता है, बल्कि इन्हें एक सामान्य, आत्मविश्वासी और सामाजिक रूप से स्वीकार्य व्यक्तित्व में रूपांतरित किया जा सकता है।
अर्थ (Meaning)
संवेगात्मक विक्षिप्त बालक वे होते हैं जिनके भावनात्मक या संवेगात्मक पक्ष में असंतुलन पाया जाता है। ऐसे बालक सामान्य रूप से बुद्धि एवं शारीरिक रूप से स्वस्थ होते हैं, परंतु उनके संवेग, जैसे – प्रेम, भय, क्रोध, घृणा, ईर्ष्या, या चिंता – असामान्य रूप से प्रकट होते हैं।इनकी भावनात्मक अस्थिरता के कारण इनका व्यवहार समाज की अपेक्षाओं से अलग दिखाई देता है। शिक्षा-संस्थान या घर-परिवार में इन्हें प्रायः “समस्या बालक” के रूप में देखा जाता है, जबकि वास्तविकता में ये बच्चे अंतरात्मा के तनाव और असुरक्षा की भावना से ग्रस्त होते हैं।
ऐसे बालकों को प्रेम, स्नेह, सुरक्षा, सहयोग और स्वीकार्यता की अधिक आवश्यकता होती है। यदि परिवार और समाज इनकी भावनात्मक आवश्यकताओं की अनदेखी करें, तो उनमें भीतरी तनाव, अविश्वास और अलगाव की प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है।
परिभाषाएँ (Definitions)
1. अमेरिकी मनोवैज्ञानिकों के अनुसार :-संवेगात्मक विक्षिप्त बालक वे होते हैं जिनमें किसी शारीरिक या बौद्धिक हानि के बिना ही संवेगात्मक असंतुलन पाया जाता है। वे सामान्य परिस्थितियों में उचित प्रतिक्रिया नहीं दे पाते और उनके व्यवहार में असामान्यता दिखाई देती है।
2. फिलिप्स (Phillips, 1967) के अनुसार –
“विक्षिप्त बालक वह होता है जिसका व्यवहार सामान्य बालकों से इतना अलग होता है कि वह समाज के स्थापित नियमों और मान्यताओं का पालन नहीं कर पाता।”
3. सामान्य परिभाषा :-
संवेगात्मक विक्षिप्त बालक वह होता है जो अपनी भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर पाता और इस कारण उसका व्यवहार अस्थिर, अनुचित या समाजविरोधी प्रतीत होता है, यद्यपि उसकी बुद्धि और शरीर सामान्य रूप से स्वस्थ रहते हैं।
विशेषताएँ (Characteristics)
ब्रूवर (Brewer, 1969) ने ऐसे बालकों की विशेषताओं को निम्न बिंदुओं में बताया, जिनका प्रभाव उनके शैक्षिक प्रदर्शन, सामाजिक व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल रूप से पड़ता है :-शिक्षण कठिनाई (Learning Difficulty) :-
ये बालक सीखने में रुचि नहीं लेते, ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते और विद्यालयीन कार्यों में पीछे रह जाते हैं।
पारस्परिक संबंधों में कठिनाई (Poor Social Adjustment) :-
ऐसे बच्चे साथियों और शिक्षकों के साथ सामंजस्य नहीं बना पाते। इनमें सहयोग भावना कम होती है और संघर्ष या झगड़े की प्रवृत्ति अधिक होती है।
असामान्य व्यवहार (Abnormal Conduct) :-
सामान्य परिस्थितियों में भी इनका व्यवहार अनुचित या असंतुलित रहता है — कभी अत्यधिक चंचल, तो कभी अत्यधिक उदास।
तनावपूर्ण भावनाएँ (Emotional Instability) :-
ये बच्चे हमेशा किसी न किसी तनाव, चिंता या भय में रहते हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास कम हो जाता है।
शारीरिक लक्षण (Physical Signs) :-
अक्सर इनकी नींद, भूख, या स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। कुछ बच्चों में कंपकंपी, भयभीत दृष्टि या बेचैनी देखी जा सकती है।
गंभीरता के स्तर (Severity Level) :-
जब तक इनकी विक्षिप्तता हल्की रहती है, तब तक व्यवहार सामान्य रहता है; परंतु गंभीर होने पर वे सामाजिक और शैक्षिक दोनों क्षेत्रों में असामंजस्य दिखाने लगते हैं।
इन विशेषताओं को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है :
बौद्धिक-शैक्षिक पक्ष (Intellectual and Educational Aspect) :-इनका IQ सामान्य (लगभग 90) के आस-पास होता है, परंतु शिक्षा-संबंधी उपलब्धियाँ औसत से कम रहती हैं। अक्सर यह विद्यालय से अनुपस्थित रहते हैं या गणित जैसी विषयों से बचते हैं।
सामाजिक एवं संवेगात्मक पक्ष (Social and Emotional Aspect) :-
इनमें गुस्सा, झगड़ालूपन, और दूसरों से दूरी बनाए रखने की प्रवृत्ति रहती है। ये अच्छे मित्र नहीं बना पाते और समाज से स्वयं को अलग अनुभव करते हैं।
व्यवहारिक पक्ष (Behavioral Aspect) :-
ऐसे बालक गृहकार्य अधूरा छोड़ देते हैं, कक्षा में शोर मचाते हैं, शिक्षकों के प्रश्नों का असंगत उत्तर देते हैं और कभी-कभी अनुशासनहीन व्यवहार प्रदर्शित करते हैं।
संवेगात्मक विक्षिप्तता के कारण (Causes of Emotional Disturbance)
मनोवैज्ञानिकों ने इस विक्षिप्तता के विभिन्न कारण बताए हैं, जिन्हें निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है :-जैव-भौतिक कारण (Bio-Physical Factors) :-
शरीर में रासायनिक या हार्मोनल असंतुलन के कारण भावनाओं का नियंत्रण बिगड़ जाता है। नींद, भूख या हार्मोनल परिवर्तन भी अस्थिरता बढ़ाते हैं।
सामाजिक कारण (Social Factors) :-
पारिवारिक कलह, माता-पिता में झगड़े, आर्थिक असुरक्षा, या उपेक्षा जैसी परिस्थितियाँ बालक के मन में असुरक्षा और क्रोध उत्पन्न करती हैं।
व्यवहारात्मक कारण (Behavioral Factors) :-
अनुचित व्यवहार की आदतें – जैसे झूठ बोलना, चोरी करना, या हिंसा करना – धीरे-धीरे स्थायी हो जाती हैं और बालक के भावनात्मक जीवन को असंतुलित करती हैं।
मनोवैज्ञानिक कारण (Psychological Factors) :-
जब बच्चे की आवश्यकताएँ (जैसे स्नेह, मान्यता, सुरक्षा) पूरी नहीं होतीं, तो वह आंतरिक तनाव अनुभव करता है। यह तनाव अचेतन मस्तिष्क में दबा रहकर बाद में असामान्य व्यवहार के रूप में प्रकट होता है।
पारिस्थितिक कारण (Ecological Factors) :-
स्वाय और सहयोगियों (Schwair and Associates) के अनुसार, संवेगात्मक विक्षिप्तता का मूल कारण बालक और उसके वातावरण के बीच अनुकूलता का अभाव है। जब वातावरण बालक की अपेक्षाओं से मेल नहीं खाता, तब उसमें भावनात्मक अस्थिरता विकसित होती है।
संवेगात्मक विक्षिप्त बालकों के कारणों की विवेचना Causes of emotional disturbed children
संवेगात्मक विक्षिप्त के मनोवैज्ञानिकों ने भिन्न-भिन्न कारण बताए हैं। कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार से हैं-- संवेगात्मक विक्षिप्तता का एक कारण जैव भौतिक है। शरीर में कुछ रासायनिक परिवर्तन होने के कारण संवेगात्मक अस्थिरता उत्पन्न होती है। खंडित मानसिकता का भी एक कारण जैव भौतिक होता है जब शरीर में कुछ रासायनिक परिवर्तन होते हैं।
- संवेगात्मक अस्थिरता का एक कारण सामाजिकता भी है। प्रहारित बालक सामाजिक दोष से ही उत्पीड़ित रहता है।
- एक कारण व्यवहार आत्मकता है, व्यवहार संबंधी दोषों को संवेगात्मक अस्थिरता के कारणों में रखा जाता है।
- मनोवैज्ञानिक कारण बालकों की आवश्यकताओं और इच्छाओं की पूर्ति ना होने पर यह तक जाती है और इसके अचेतन मस्तिष्क में चली जाती है। इसके कारण यह विक्षिप्त हो जाता है। यदि इन बालकों को प्रक्षेपित परीक्षण दिया जाए तो सही कारण पता चल जाएगा। यह कारण अधिक विश्वसनीय तथा सार्थक होगा।
- कुछ मनोवैज्ञानिक संवेगात्मक अस्थिरता या बाधिता का कारण बालक और उसके वातावरण में अंतर्क्रिया को बताते हैं। इसे पारिस्थितिकी प्रतिमान माना जाता है।
संवेगात्मक विक्षिप्त बालक मूलतः बीमार या अक्षम नहीं होते, बल्कि उन्हें उचित भावनात्मक सहयोग, समझदारी और अनुकूल वातावरण की आवश्यकता होती है।
शिक्षकों, अभिभावकों और परामर्शदाताओं को चाहिए कि वे ऐसे बच्चों के साथ सहानुभूति, धैर्य और सकारात्मक दृष्टिकोण रखें।
समुचित मार्गदर्शन, परामर्श, और प्रेमपूर्ण व्यवहार से इनमें न केवल सुधार लाया जा सकता है, बल्कि इन्हें एक सामान्य, आत्मविश्वासी और सामाजिक रूप से स्वीकार्य व्यक्तित्व में रूपांतरित किया जा सकता है।
Suggested References
- Phillips, L. (1967). Emotional Disturbances in Children.
- Brewer, J. (1969). Educational Psychology and Abnormal Behavior.
- NCERT (2020). Inclusive Education for Children with Special Needs.
- IGNOU (2021). Psychology of Learning and Development (ES-211).
- Sharma, R. A. (2018). Educational Psychology. Meerut: Loyal Book Depot.
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