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समावेशी शिक्षा संबंधी पाठ्यक्रम

Curriculum in inclusive education

प्रायः हर तरह का शिक्षण अधिगम पाठ्यक्रम पर आधारित होता है तथा दूसरे उद्देश्य की सफलता अथवा सफलता भी इसी से सुनिश्चित होती है। यह बालकों की शिक्षण अधिगम से संबंधित मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला होना चाहिए। यह उस ज्ञान एवं कौशल का वर्णन करता है जिन्हें बालक प्राप्त कर सकें। पाठ्यक्रम बालक के इन्हीं विभिन्न कौशलों को निखार कर सामने लाने में मददगार होता है। ऐसे में यह भी जरूरी हो जाता है कि पाठ्यक्रम सभी प्रकार के बालकों की आवश्यकताओं को पूर्ण करने वाला हो।

समावेशी शिक्षा संबंधित पाठ्यक्रम यह सुनिश्चित करता है कि जिन बालक ओके तहत पाठ्यक्रम तैयार किया गया है वह मानक विस्तृत तथा व्यापक हो जो कि बालको की अधिगम शिक्षण से संबंधित समस्त जरूरतें पूर्ण कर सके। यह सभी मानकों पर आधारित लक्ष्य एवं उद्देश्यों के ढांचे को प्रोत्साहित करें। इसमें समावेशी अनुदेशन आत्मक उपागम एवं सामग्री समृत होनी चाहिए जो विभिन्न प्रकार की आवश्यकता वाले बालकों हेतु उपलब्ध हो। यह मूल रूप से शारीरिक तौर पर अशक्त बच्चों के स्तर को ऊंचा उठाने में उपयोगी होता है। इससे उसके विभिन्न प्रकार के कौशलों का विकास होता है।

पाठ्यक्रम की विशेषताएं  Characteristics of curriculum

  1. पाठ्यक्रम के अंतर्गत सैद्धांतिक रूप से व्यावहारिक रूप एवं अन्य पाठ्य सहगामी क्रियाओं के क्रियान्वयन को जोड़ा जाना चाहिए।
  2. पाठ्यक्रम की रचना का आधार समावेश होना चाहिए।
  3. पाठ्यक्रम केवल सामान्य बालकों को ध्यान में रखकर ही नहीं विशिष्ट बालकों की आवश्यकताओं को पूरा करने वाला भी होना चाहिए।
  4. पाठ्यक्रम शिक्षक द्वारा समय अवधि में दोनों ही प्रकार के सामान्य एवं विशिष्ट बालकों पर क्रियान्वित करने के लिए उपयोग होना चाहिए।
  5. पाठ्यक्रम इस सीमा तक विस्तृत हो जिससे समावेशी शिक्षा को विद्यालय एवं कक्षागत परिस्थितियों में आसानी से प्रोत्साहित किया जा सके।
  6. पाठ्यक्रम शिक्षकों के अंदर सामान्य एवं विशिष्ट बालकों की समावेशी शिक्षा को प्रदान करने के लिए लचीला होना चाहिए।
  7. पाठ्यक्रम व्यवहारिक एवं कक्षा गत परिस्थितियों में सामान्य एवं विशिष्ट बालकों को एक साथ लेकर चलने वाला होना चाहिए।
  8. पाठ्यक्रम के अंतर्गत स्लेबस को पूरा करने के लिए ऐसे अध्याय होने चाहिए जो कि अध्ययन के दौरान बालकों के साथ समायोजन को बढ़ावा दें।
  9. पाठ्यक्रम की रचना इस प्रकार की होनी चाहिए कि प्रतिदिन के शिक्षण के दौरान कुछ समय शिक्षकों को सामान एवं विशिष्ट बालकों के मध्य अंतः क्रिया पर जोर दें जिससे वह एक दूसरे को समझें।
  10. करिकुलम डिजाइन प्रथकीकरण को एकीकरण में बदल देने वाला होना चाहिए।

समावेशी बालकों की विशेषताएं  Characteristics of inclusive children

  1. समावेशी बालक शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा भावनात्मक रूप से पूर्णतः एक दूसरे से भिन्न होते हैं।
  2. समावेशी बालक को के गुण तथा स्वरूप सामान्य बालकों से भिन्न होते हैं।
  3. समावेशी बालकों का विकास सामान्य बालकों की अपेक्षा तीव्र गति से होता है।
  4. समावेशी बालकों की समझने की शक्ति अन्य बालकों से भिन्न होती है।
  5. एक समावेशी बालक की अधिकतम सामर्थ के विकास के लिए उसे विद्यालय की कार्यप्रणाली तथा उसके साथ किए जाने वाले व्यवहार में परिवर्तन की आवश्यकता होती है।

सामान्य तथा समावेशी बालक में अंतर  Difference between normal and inclusive children

सभी बालक शारीरिक रूप से एक-दूसरे से भिन्न होते हैं कुछ छोटे, कुछ बड़े, कुछ कमजोर तथा कुछ बलवान होते हैं। कुछ बालकों में सीखने की क्षमता अधिक होती है। कुछ पालक जल्दी सीखते हैं जबकि कुछ ऐसे बालक होते हैं जिन्हें बार-बार अभ्यास करा कर सिखाया जाता है। कुछ बालकों को जो भी पढ़ाया तथा सिखाया जाता है उसे याद करने में उन्हें कठिनाई का अनुभव होता है। जहां बालकों में आपस में अंतर कम होता है तो शारीरिक रूप से लगभग समान होते हैं। मानसिक रूप से भी वह लगभग औसत वर्ग के होते हैं। उनका सामाजिक व्यवहार भी सामाजिक व्यवस्थाओं तथा मान्यताओं की ही परिधि में होता है। इनमें संप्रेषण करने की क्षमता भी सामान्य मात्रा में होती है। वह सामान्य शिक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत शिक्षा ग्रहण करने की स्थिति में हो तो ऐसे बालक को को सामान्य बालकों की श्रेणी में रखा जाता है, लेकिन जब तक वह बच्चे जो अपने किसी भी शारीरिक अक्षमता, सीखने की अयोग्यता, भावनात्मक एवं व्यवहारिक विकारों, बोलने संबंधी विकारों, बौद्धिक प्रखरता एवं सृजनात्मकता की अत्यधिक प्रवृत्ति के कारण सामान्य शिक्षा कार्यक्रम के लिए उपयुक्त नहीं होता है, उन्हें समावेशी बालकों की श्रेणी में रखा जाता है। इन बच्चों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अलग-अलग प्रकार के विशिष्ट शिक्षा कार्यक्रमों की व्यवस्था की जाती है। समावेशी बालक की श्रेणी में व्यवहारिक समस्या वाले, सीखने की निर्योग्यता वाले, विभिन्न प्रकार की शारीरिक विकृति वाले, आदि प्रकार के बच्चे आते हैं।

समावेशी बालकों हेतु आवश्यक  Opportunities for inclusive children

समावेशी बालकों की शिक्षा हेतु वर्तमान समय में संपूर्ण विश्व में विभिन्न कार्यक्रम लागू किए गए हैं जिनका विवरण इस प्रकार से है
  1. समावेशी बालक को की शिक्षा हेतु वर्तमान समय में योग्यता को और अधिक जागृत करने के लिए निशुल्क एवं उपयुक्त शिक्षा की व्यवस्था की जाए।
  2. बाधित बालकों तथा सामान्य बालकों की शिक्षा का स्वरूप एक समान रखा जाए।
  3. दृष्टिबाधित, वाणी बाधित तथा श्रवण बाधित बालकों को जहां तक संभव हो सामान्य बालकों के साथ ही शिक्षा दी जाए।
  4. अपंग बालकों को भी सामान बालकों के साथ ही शिक्षा प्रदान की जाए।
  5. भावनात्मक रूप से विकृत तथा प्रतिभाशाली सृजनात्मक बालकों को भी सामान्य बालकों की शिक्षा संस्था में प्रवेश दिया जाए।
यदि इन बालकों को थोड़ा सा संवेगात्मक प्रभाव प्राप्त होगा तो यह बालक भी सामान्य बालकों की बात ही अपना जीवन यापन कर सकेंगे।
  1. समावेशी तथा सामान्य बालकों को एक ही कक्षा में प्रवेश देना।
  2. आवश्यकता के अनुसार विकृत बालकों का विशिष्ट कक्षा में प्रवेश।
  3. शिक्षा कार्यों के लिए संसाधन उपलब्ध कराना।
  4. विगत बालकों के लिए पुनर्वास सुविधा देना।
  5. समान पाठ्यक्रम लेना तथा आवश्यकता अनुसार विगत बालकों के पाठ्यक्रम में परिवर्तन करना।
  6. पाठ्यक्रम में प्रवेश निर्धारण के लिए शिक्षा विधियों एवं सामग्री का प्रयोग तथा समायोजन करना।
  7. शिक्षण में आवश्यकतानुसार सहायक उपकरण तथा सामग्री का उपयोग करना।
समावेशी बालकों के लिए आवश्यक अवसर (Opportunities for Inclusive Children)
समावेशी बालकों की शिक्षा को प्रभावी बनाने के लिए निम्न अवसर और व्यवस्थाएँ आवश्यक हैं -
  1. निशुल्क एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा :- सभी विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए निःशुल्क और उपयुक्त शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए।
  2. समान शिक्षा व्यवस्था :- बाधित और सामान्य बालकों को जहाँ तक संभव हो, एक समान शिक्षा कार्यक्रम में शामिल किया जाए।
  3. एकीकृत शिक्षण वातावरण :- दृष्टिबाधित, श्रवण बाधित, वाणी बाधित और अन्य दिव्यांग बच्चों को सामान्य विद्यालयों में शिक्षा देने की प्राथमिकता हो।
  4. संसाधन सहयोग :- विशेष शिक्षण उपकरण, सहायक सामग्री और प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
  5. पुनर्वास सुविधाएँ :- उन बच्चों के लिए पुनर्वास (rehabilitation) सेवाएँ उपलब्ध कराई जाएँ जिन्हें सामाजिक या शारीरिक सहयोग की आवश्यकता है।
  6. अनुकूलित पाठ्यक्रम :- सभी बच्चों के लिए समान पाठ्यक्रम तो हो, परंतु आवश्यकतानुसार उसमें संशोधन (adaptation) की सुविधा भी दी जाए।
  7. समायोजित शिक्षण विधियाँ :- अध्यापन की ऐसी विधियाँ अपनाई जाएँ जो सभी विद्यार्थियों की गति, समझ और क्षमता को ध्यान में रखें।
  8. सहायक उपकरणों का प्रयोग :- दृष्टिबाधित बच्चों के लिए ब्रेल लिपि, श्रवण बाधितों के लिए श्रवण यंत्र आदि उपकरणों का प्रयोग किया जाए।
  9. भावनात्मक प्रोत्साहन :- ऐसे बच्चों को आत्मविश्वास देने के लिए सहपाठियों और शिक्षकों द्वारा सकारात्मक वातावरण निर्मित किया जाए।
समावेशी शिक्षा का पाठ्यक्रम वास्तव में एक समानता और न्याय पर आधारित शिक्षा दर्शन का प्रतीक है। इसका उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण निर्मित करना है जहाँ हर बालक अपनी क्षमताओं के अनुसार सीख सके और समाज में योगदान दे सके।
ऐसा पाठ्यक्रम न केवल विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए, बल्कि सभी बच्चों के समग्र विकास के लिए लाभकारी होता है। यह बच्चों में आपसी सम्मान, सहयोग, और सह-अस्तित्व की भावना को गहराई से विकसित करता है।

अतः यह कहा जा सकता है कि -
“समावेशी पाठ्यक्रम वह सेतु है जो विविधता को स्वीकार करके सभी को समान अवसरों की शिक्षा से जोड़ता है।”

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