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सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षिक रूप से सुविधा-वंचितों की समस्या के समाधान हेतु सरकारी प्रयास

Government Efforts to Solve the Problems of Socially, Economically and Educationally Disadvantaged Groups

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में समानता, न्याय और समावेशन केवल संविधान के आदर्श नहीं हैं, बल्कि सामाजिक विकास की आधारशिला हैं। फिर भी, समाज के कुछ वर्ग - विशेषकर सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षिक रूप से वंचित समूह - मुख्यधारा से पीछे रह जाते हैं। इन समूहों में अनुसूचित जातियाँ, अनुसूचित जनजातियाँ, पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक, महिलाएँ, तथा विशेष रूप से दिव्यांगजन (Persons with Disabilities) शामिल हैं।

इन वर्गों के सशक्तिकरण के लिए भारत सरकार एवं राज्य सरकारों ने अनेक योजनाएँ, नीतियाँ और अधिनियम बनाए हैं, ताकि हर नागरिक को समान अवसर, सम्मानजनक जीवन और शिक्षा प्राप्त हो सके।

राज्य का उत्तरदायित्व (State Responsibility towards Inclusive Development)

राज्य का यह दायित्व है कि वह समाज के सभी वर्गों की आवश्यकताओं की पहचान करे और उनके अनुरूप योजनाएँ तैयार करे। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पुनर्वास के क्षेत्र में राज्य को समन्वयक की भूमिका निभानी चाहिए।
राज्य के प्रमुख उत्तरदायित्वों में -
  • स्थानीय स्तर पर चल रहे विद्यालयों को आर्थिक सहायता प्रदान करना,
  • विशेष शिक्षा कार्यक्रमों का निरीक्षण एवं मूल्यांकन करना,
  • अध्यापकों को विशेष प्रशिक्षण उपलब्ध कराना,
  • बालकों की मनोवैज्ञानिक एवं स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं की देखरेख सुनिश्चित करना,
  • शिक्षा के साथ-साथ पुनर्वास एवं आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना - शामिल हैं।
राज्य की यह भूमिका केवल सहायता देने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि नीति निर्माण, संसाधन वितरण और सामाजिक चेतना निर्माण तक विस्तारित होती है।

विशेष शिक्षा के लिए राज्य स्तरीय व्यवस्थाएँ (State-Level Special Education Arrangements)

भारत के प्रत्येक राज्य ने विशेष शिक्षा (Special Education) के लिए अलग-अलग योजनाएँ एवं संस्थाएँ स्थापित की हैं। इनका उद्देश्य है कि दिव्यांग एवं वंचित बालक भी समान रूप से शिक्षा प्राप्त कर सकें।
राज्य स्तर पर विशेष शिक्षा के तहत -
  • विद्यालयों में विशेष कक्षाओं की स्थापना,
  • प्रशिक्षित विशेष शिक्षकों की नियुक्ति,
  • मनोवैज्ञानिक एवं चिकित्सीय सहायता की उपलब्धता,
  • और प्रत्येक बच्चे के लिए वैयक्तिक शिक्षण योजना (Individualized Educational Plan) - को प्राथमिकता दी जाती है।
इस दिशा में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, दिल्ली आदि राज्यों ने उल्लेखनीय प्रगति की है।

विकलांग कल्याण विभाग की प्रमुख योजनाएँ (Major Schemes by the Department of Disability Welfare)

भारत सरकार और राज्य सरकारों द्वारा विकलांग जनों के समग्र कल्याण हेतु कई योजनाएँ संचालित की जा रही हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य है कि प्रत्येक दिव्यांग व्यक्ति आत्मनिर्भर जीवन जी सके और समाज की मुख्यधारा में शामिल हो सके।
1. पेंशन योजना (Pension Scheme) :-
आर्थिक रूप से कमजोर एवं निराश्रित विकलांग व्यक्तियों को भरण-पोषण हेतु मासिक पेंशन दी जाती है।
वर्तमान में अनेक राज्यों में यह पेंशन ₹1000 से ₹1500 प्रतिमाह तक प्रदान की जा रही है। इस योजना से लाखों दिव्यांगजन लाभान्वित हो रहे हैं।

2. छात्रवृत्ति योजना (Scholarship Scheme) :-
शिक्षा के अधिकार को साकार करने हेतु दिव्यांग छात्रों के लिए विभिन्न स्तरों पर छात्रवृत्तियाँ दी जाती हैं -
  • प्राथमिक कक्षा में ₹100-₹200,
  • माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक में ₹300-₹500,
  • स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर पर ₹1000-₹2000 प्रतिमाह।
यह सहायता केवल आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि प्रेरणा के रूप में भी कार्य करती है।
 
3. कृत्रिम अंग एवं सहायक उपकरण योजना (Assistive Device Scheme) :-
विकलांग व्यक्तियों को उनकी शारीरिक आवश्यकता के अनुसार कृत्रिम अंग, श्रवण यंत्र, बैसाखी, ट्रायसिकल, व्हीलचेयर आदि नि:शुल्क या रियायती दर पर उपलब्ध कराए जाते हैं।
इस योजना से हजारों लोग पुनः गतिशीलता प्राप्त कर कार्यशील जीवन जी पा रहे हैं।
 
4. विकलांग विवाह प्रोत्साहन योजना (Marriage Incentive Scheme) :-
सामाजिक स्वीकृति और आत्मसम्मान को बढ़ावा देने हेतु सरकार ऐसे जोड़ों को आर्थिक प्रोत्साहन देती है, जिनमें एक या दोनों साथी विकलांग हों।
इस योजना के अंतर्गत ₹11,000 से ₹20,000 तक की अनुदान राशि दी जाती है।

5. दुकान निर्माण / स्वरोजगार योजना (Self-Employment Scheme) :-
विकलांग युवाओं को स्वावलंबी बनाने हेतु सरकार दुकान निर्माण या लघु उद्योग हेतु ₹20,000 से ₹50,000 तक की सहायता राशि देती है।
इसमें अनुदान एवं अल्प-ब्याज ऋण दोनों सम्मिलित होते हैं।
 
6. राज्य स्तरीय पुरस्कार योजना (State Award Scheme) :-

हर वर्ष “विश्व विकलांग दिवस” के अवसर पर प्रतिभाशाली एवं प्रेरणादायक दिव्यांग व्यक्तियों को राज्यपाल या मुख्यमंत्री के करकमलों से सम्मानित किया जाता है।
इसका उद्देश्य समाज में दिव्यांगजनों के योगदान को पहचानना एवं सम्मान देना है।

विकलांग जन अधिनियम, 1995 (The Persons with Disabilities Act, 1995)

विकलांग जनों के अधिकारों की रक्षा, समान अवसर और पुनर्वास सुनिश्चित करने हेतु यह अधिनियम एक ऐतिहासिक कदम था। यह अधिनियम 7 फरवरी 1996 से पूरे भारत में लागू हुआ।
अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों का सारांश निम्नवत है-
अध्याय 1. प्रारंभिक :-
इस अध्याय में अधिनियम के अंतर्गत प्रयुक्त शब्दावली की परिभाषाएं दी गई है। इसके अनुसार निम्न 7 प्रकार की विकलांगताओं को चिन्हित किया गया है-
1. दृष्टिबाधित
2. अल्प दृष्टि
3. कुष्ठ रोग से उपचारित
4. श्रवण दोष
5. चलन विकलांगता
6. मानसिक रुग्णता
7. मानसिक मंदिता।
अधिनियम के अंतर्गत ऐसे व्यक्तियों को विकलांग परिभाषित किया गया है जिनकी विकलांगता 40% से कम ना हो।

अध्याय 2. केंद्रीय समन्वय समिति :-
अधिनियम के प्रावधान अनुसार केंद्र सरकार के समाज कल्याण मंत्री की अध्यक्षता में एक केंद्रीय समन्वय समिति गठित किए जाने की व्यवस्था है। केंद्रीय समन्वय समिति के द्वारा लिए गए निर्णयों के कार्यान्वयन की समीक्षा हेतु एक केंद्रीय कार्यकारी समिति के गठित किए जाने की भी व्यवस्था है।

अध्याय 3. राज्य समन्वय समिति :-
केंद्रीय समन्वय समिति के अनुरूप प्रत्येक राज्य में एक राज्य समन्वय समिति गठित किए जाने का प्रावधान है। राज्य समन्वय समिति द्वारा लिए गए निर्णयों के कार्यान्वयन हेतु एक कार्यकारी समिति गठित किए जाने की व्यवस्था है। उपर्युक्त के परिपालन में प्रदेश सरकार द्वारा राज्य समन्वय समिति एवं राज्य कार्यकारी समिति का गठन करके इसकी नियमित बैठक में कराई जा रही हैं।

अध्याय 4. विकलांगता की रोकथाम तथा समय से पहचान :-
इस अध्याय के अंतर्गत सरकारी और स्थानीय प्राधिकरण को अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं में विकलांगता की रोकथाम एवं समय से पहचानकर निराकरण से संबंधित प्रचार प्रसार एवं शिक्षण प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था की गई है।

अध्याय 5. शिक्षा :-
अधिनियम की धारा 26 से 31 तक दिए गए प्रावधानों के अनुसार अब यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि प्रत्येक विकलांग बच्चे को 18 वर्ष की उम्र तक निशुल्क और समुचित शिक्षा मिले। स्थानीय प्राधिकरण भी विकलांग बच्चों के लिए जिन्होंने पांचवी कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी है, अनौपचारिक शिक्षा की सुविधा प्रदान करें। इस प्रकार 16 वर्ष और उससे ऊपर आयु के विकलांग बच्चों के लिए कार्यात्मक साक्षरण हेतु विशेष अंशकालिक कक्षाओं की भी व्यवस्था अधिनियम में दी गई है। विकलांग बच्चों को अवरोध रहित समुचित शिक्षा प्रदान करने की दृष्टि से उन्हें विशेष पुस्तकों एवं उपकरण आदि नि:शुल्क दिए जाने की भी व्यवस्था है। संबंधित सरकारों को यह स्पष्ट रूप से निर्देशित किया गया है कि वह विकलांग बच्चों को अवरोध रहित एवं निशुल्क तथा आवश्यक शिक्षा प्रदान करने के संबंध में एक व्यापक शैक्षिक कार्यक्रम बनाएगी।

अध्याय 6. रोजगार :-
इस अध्याय के अंतर्गत उपयुक्त प्रकार के पदों का चिन्हीकरण, पदों का आरक्षण, विकलांगों के लिए विशेष सेवायोजन, केंद्र विकलांग व्यक्तियों को रोजगार मुहैया कराने के लिए योजनाएं, शिक्षण संस्थाओं में विकलांग व्यक्तियों के लिए सीटों का आरक्षण तथा गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों के कम से कम 3% विकलांगों के आरक्षण की व्यवस्था प्रावधान है। साथ ही साथ यह भी व्यवस्था दी गई है कि विभिन्न सरकारें अपनी आर्थिक क्षमता के अनुरूप सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के ऐसे नियोक्ताओं को प्रोत्साहन देंगी, जिनकी कुल कार्य शक्ति में से 5% अथवा अधिक विकलांग व्यक्ति हो।

उपयुक्त परिकलन में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पदों का चिन्हीकरण किया जा चुका है एवं दृष्टिबाधित, श्रवण बाधित तथा चलन विकलांगता वाले व्यक्तियों के लिए आरक्षण विषयक शासनादेश निर्गत किया जा चुका है। साथ ही गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों में 3% का बजट आरक्षित करने का विधेयक शासनादेश भी ग्रामीण विकास विभाग द्वारा जारी किया जा चुका है।

अध्याय 7. सकारात्मक कार्यवाही :-
इसके अंतर्गत यह व्यवस्था की गई है कि सरकार विकलांग व्यक्तियों को सहायता उपकरण उपलब्ध कराएगी। साथ ही विकलांगों को भवन निर्माण, व्यवसाय एवं विशेष विद्यालयों आदि के लिए रियायती दरों पर प्राथमिकता के आधार पर भूमि का आवंटन कराया जाएगा।

अध्याय 8. भेदभाव :-
विकलांग व्यक्तियों को अवरोध रहित वातावरण प्रदान करने के दृष्टिकोण से अधिनियम के अंतर्गत विकलांग व्यक्तियों के लिए यातायात के साधनों, सड़कों, भवन एवं राजकीय रोजगार रहित वातावरण प्रदान किए जाने का प्रावधान है।

अध्याय 9. शोध एवं मानव शक्ति विकास :-
विकलांगता की रोकथाम के लिए, विकलांगों के पुनर्वास के लिए, विकलांग व्यक्तियों के लिए, सहायक उपकरण के संबंध में, अनुकूलन संरचनात्मक विशेषताओं के विकास के लिए, अनुसंधान कार्य को प्रोत्साहित एवं प्रायोजित करने के संबंध में, इस अध्याय में प्रावधान किया गया है।

अध्याय 10. विकलांग व्यक्तियों के लिए संस्थाओं की मान्यता :-
इस अध्याय के अंतर्गत अधिनियम में यह व्यवस्था है कि विकलांगों के लिए प्रतिष्ठान या संस्था चलाने वाले व्यक्तियों को संस्था के पंजीकरण की कार्यवाही करनी होगी। राज्य सरकार को निर्देश है कि वह इस हेतु एक सक्षम प्राधिकारी नियुक्त करें।
उपर्युक्त के परिपालन में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा निर्देशक विकलांग कल्याण को सक्षम प्राधिकारी घोषित किया जा चुका है।

अध्याय 11. गंभीर रूप से विकलांग व्यक्तियों के लिए संस्थान :-
अधिनियम में दी गई परिभाषा के अनुसार ऐसे लोग गंभीर रूप से विकलांग माने जाते हैं, जिनमें 80% या उससे अधिक विकलांगों के लिए संस्थानों को स्थापित और संपोषित करेंगी।

अध्याय 12. विकलांग व्यक्तियों के लिए मुख्य आयुक्त और आयुक्त :-
केंद्र सरकार द्वारा इस अध्याय को लागू करने के लिए एक मुख्य आयुक्त की नियुक्ति करनी होगी। इसी प्रकार राज्य स्तर पर भी एक विकलांग जन आयुक्त की नियुक्ति की भी व्यवस्था इस अध्याय के अंतर्गत की गई है। आयुक्त विकलांग जन मुख्य रूप से विकलांगों के अधिकारों के हनन से संबंधित तथा विकलांगों के कल्याण और अधिकारों की रक्षा के संबंध में शिकायत को सुनेंगे और राज्य सरकार के कार्य की समीक्षा करके यह सुनिश्चित करेंगे कि विकलांगों को उपलब्ध कराए जाने वाले अधिकार और सुविधाएं संरक्षित हैं।
उपर्युक्त अनुपालन में राज्य सरकार द्वारा आयुक्त विकलांग जन की नियुक्ति की जा चुकी है तथा आयुक्त विकलांग जन का कार्यालय इंदिरा भवन के दशम तल पर स्थापित है जहां पर उपयुक्त के अतिरिक्त उनके सहयोगी स्टाफ भी कार्यरत हैं।

अध्याय 13. सामाजिक सुरक्षा :-
इस अधिनियम में व्यवस्था है कि सरकार अपनी आर्थिक सीमाओं के आधार पर सभी विकलांगों के पुनर्वास का भार उठाएगी और जहां तक संभव हो, वहां सरकार ऐसे विकलांग बेरोजगारों को विशेष रोजगार भत्ता देगी जो विशेष रोजगार कार्यालय में 2 साल से अधिक समय से पंजीकृत हैं और जिन्हें कोई लाभकारी रोजगार प्राप्त नहीं हो सका है। इसी अध्याय में यह भी व्यवस्था की गई है कि रोजगार शुदा विकलांग व्यक्तियों को और जरूरत पड़ने पर बेरोजगारों के लिए भी बीमा योजनाएं बनाएंगी।

अध्याय 14. विविध :-
अधिनियम का यह अंतिम अध्याय है जिसके अंतर्गत इस अध्याय में प्रावधानित व्यवस्था के दुरुपयोग करने पर 2 वर्ष की सजा और 20,000 तक का जुर्माना अथवा दोनों दंड दिए जाने का प्रावधान है। इसी प्रकार संबंधित सरकारों को अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने के लिए आवश्यक नियम बनाने का अधिकार है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि विकलांग जन अधिनियम 1995 जो पूरे देश में दिनांक 7 1996 से प्रभावी हो चुका है, के अंतर्गत जो व्यवस्थाएं प्रावधाननिक हैं, यह निश्चय ही समस्त विकलांग बंधुओं को समुचित अवसर प्रदान कर पूरी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए वरदान स्वरुप है।

यह बड़े हर्ष का विषय है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने उपयुक्त अधिनियम के प्रावधानों को तत्परता से लागू करने के संबंध में सार्थक प्रयास किए हैं, तथापि यह हम सब का पुनीत कर्तव्य है कि प्रत्येक विकलांग के प्रति दया की भावना के स्थान पर, सहयोग की भावना का विकास करें और प्रत्येक स्तर पर विकलांग बंधुओं को यथा वांछित सहयोग प्रदान करें कि वह समाज और राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ सकें। 

अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ -

1. विकलांगता की परिभाषा :-
कानून के अनुसार दृष्टिबाधित, श्रवण दोष, कुष्ठ रोग से उपचारित, मानसिक मंदता, चलन विकलांगता, अल्प दृष्टि और मानसिक रुग्णता - ये सात श्रेणियाँ अधिनियम में सम्मिलित की गई हैं।

2. शिक्षा का अधिकार :-
प्रत्येक विकलांग बच्चे को 18 वर्ष की आयु तक निशुल्क एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना अनिवार्य किया गया है।
विशेष शिक्षण सामग्री, उपकरण एवं पुस्तकों की व्यवस्था भी नि:शुल्क करने का निर्देश दिया गया है।

3. रोजगार में आरक्षण :-
सरकारी सेवाओं में कम से कम 3% पद विकलांग व्यक्तियों के लिए आरक्षित रखे गए हैं।
इसके अतिरिक्त गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों में भी न्यूनतम 3% भागीदारी सुनिश्चित की गई है।

4. भेदभाव-निषेध एवं सकारात्मक कार्यवाही :-
अधिनियम में प्रावधान है कि कोई भी संस्था या नियोक्ता विकलांग व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं करेगा।
सरकार को ऐसे संस्थानों को प्रोत्साहन देने का अधिकार है जो 5% या अधिक दिव्यांग व्यक्तियों को रोजगार प्रदान करते हैं।

5. सामाजिक सुरक्षा एवं पुनर्वास :-
विकलांग बेरोजगारों के लिए विशेष रोजगार भत्ता, बीमा योजना, पेंशन एवं पुनर्वास केंद्रों की स्थापना का प्रावधान किया गया है।

6. अनुसंधान एवं प्रशिक्षण :-
सरकार को विकलांगता की रोकथाम, पुनर्वास तकनीक, सहायक उपकरणों के नवाचार, तथा मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में अनुसंधान को प्रोत्साहित करने का दायित्व सौंपा गया है।

शोध, प्रशिक्षण एवं संस्थागत सहयोग (Research, Training & Institutional Support)

राज्य सरकारों ने विकलांगता के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत संस्थानों की स्थापना की है, जैसे -
  • दृष्टिबाधित, मूक-बधिर एवं मानसिक मंदित बच्चों के विद्यालय,
  • विशेष शिक्षकों के प्रशिक्षण केंद्र,
  • उत्पादन एवं पुनर्वास केंद्र,
  • और गैर-सरकारी संस्थाओं को आर्थिक सहयोग देने की योजनाएँ।
इसके साथ ही, केंद्र सरकार “राष्ट्रीय विकलांग वित्त एवं विकास निगम (NHFDC)” के माध्यम से दिव्यांगजनों को ऋण, प्रशिक्षण और उद्यमिता सहायता प्रदान कर रही है।

सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन (Changing Social Perspective)

सरकार की नीतियाँ तभी प्रभावी हो सकती हैं जब समाज में दृष्टिकोण बदले।
विकलांग व्यक्ति दया या सहानुभूति के नहीं, बल्कि समान अवसर और सम्मान (Equality and Dignity) के अधिकारी हैं।
शिक्षा, रोजगार, परिवहन और सामाजिक सहभागिता में समान पहुँच (Accessibility) का अधिकार संविधान और मानवाधिकार दोनों की मूल भावना है।

भारत सरकार और राज्य सरकारों के निरंतर प्रयासों ने वंचित वर्गों की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार लाया है।
फिर भी, यह केवल योजनाओं और कानूनों से संभव नहीं - इसके लिए समाज के हर नागरिक की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
“वास्तविक विकास वही है, जहाँ सबसे कमजोर व्यक्ति भी यह महसूस करे कि वह समाज की मुख्यधारा का अभिन्न हिस्सा है।”

विकलांगजन, आर्थिक रूप से पिछड़े समूह और शैक्षिक रूप से वंचित वर्ग - सभी भारत की विकास यात्रा के समान भागीदार हैं।
सरकार का यह प्रयास सराहनीय है कि वह सहानुभूति नहीं, समान अनुभूति (Empathy, not Sympathy) के साथ एक समावेशी और न्यायसंगत समाज की ओर अग्रसर है।

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