Problems, identification and education of gifted children
मानव समाज में प्रत्येक बालक अपनी क्षमताओं, रुचियों और सोचने की शैली में विशिष्ट होता है। कुछ बालक जन्म से ही ऐसी मानसिक, रचनात्मक और बौद्धिक योग्यताओं से संपन्न होते हैं जो उन्हें सामान्य बच्चों से अलग बनाती हैं। इन्हें ही “प्रतिभाशाली बालक” कहा जाता है। यद्यपि ऐसे बालक समाज के लिए अमूल्य धरोहर होते हैं, फिर भी इन्हें अनेक प्रकार की मानसिक, सामाजिक और शैक्षणिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उनके विकास के लिए केवल सामान्य शिक्षण पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उन्हें विशेष मार्गदर्शन और उचित शैक्षिक वातावरण की आवश्यकता होती है।प्रतिभाशाली बालकों की समस्याएं
1. परिवार में समायोजन की समस्या :-प्रतिभाशाली बालक प्रायः अपने परिवार में स्वयं को उपेक्षित या असमझा हुआ महसूस करते हैं। कई बार माता-पिता उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं को समझ नहीं पाते या उन्हें सामान्य बच्चों जैसा ही व्यवहार देते हैं। ऐसे में बालक मानसिक असंतोष और विरोध की भावना से ग्रस्त हो जाते हैं। वे चाहते हैं कि घर में उनके विचारों और रचनात्मक सुझावों को महत्व दिया जाए। जब ऐसा नहीं होता, तो उनमें आत्मकेंद्रितता, विद्रोह और अकेलेपन की प्रवृत्ति विकसित हो सकती है।
2. विद्यालय में समायोजन :-
स्कूल का वातावरण भी प्रतिभाशाली बालकों के लिए चुनौतीपूर्ण बन जाता है। सामान्य शिक्षण पद्धतियाँ और पारंपरिक पाठ्यक्रम उन्हें पर्याप्त प्रेरणा नहीं दे पाते। ऐसे बालक गहन प्रश्न पूछते हैं, नवीन प्रयोग करना चाहते हैं और यदि उन्हें मानसिक चुनौती न मिले, तो वे ऊब जाते हैं। इससे अध्यापक के प्रति उनका व्यवहार असहयोगी हो सकता है तथा साथियों में ईर्ष्या की भावना उत्पन्न हो जाती है। धीरे-धीरे वे कक्षा से उदासीन हो जाते हैं और अपने विकास की गति खोने लगते हैं।
स्कूल का वातावरण भी प्रतिभाशाली बालकों के लिए चुनौतीपूर्ण बन जाता है। सामान्य शिक्षण पद्धतियाँ और पारंपरिक पाठ्यक्रम उन्हें पर्याप्त प्रेरणा नहीं दे पाते। ऐसे बालक गहन प्रश्न पूछते हैं, नवीन प्रयोग करना चाहते हैं और यदि उन्हें मानसिक चुनौती न मिले, तो वे ऊब जाते हैं। इससे अध्यापक के प्रति उनका व्यवहार असहयोगी हो सकता है तथा साथियों में ईर्ष्या की भावना उत्पन्न हो जाती है। धीरे-धीरे वे कक्षा से उदासीन हो जाते हैं और अपने विकास की गति खोने लगते हैं।
3. कार्य करने की गति और समायोजन :-
प्रतिभाशाली बालक सामान्य बच्चों की तुलना में बहुत शीघ्र सीखते हैं। उनकी तर्कशक्ति, कल्पनाशक्ति और स्मरण क्षमता अत्यधिक प्रखर होती है। वे कार्यों को तेज़ी से पूरा कर लेते हैं, परंतु जब कक्षा का बाकी भाग पीछे रह जाता है, तो उन्हें प्रतीक्षा करनी पड़ती है। यह स्थिति उन्हें निराश और असंतुलित बना सकती है, क्योंकि उनकी बौद्धिक गति और सामाजिक गति में सामंजस्य नहीं बन पाता।
प्रतिभाशाली बालक सामान्य बच्चों की तुलना में बहुत शीघ्र सीखते हैं। उनकी तर्कशक्ति, कल्पनाशक्ति और स्मरण क्षमता अत्यधिक प्रखर होती है। वे कार्यों को तेज़ी से पूरा कर लेते हैं, परंतु जब कक्षा का बाकी भाग पीछे रह जाता है, तो उन्हें प्रतीक्षा करनी पड़ती है। यह स्थिति उन्हें निराश और असंतुलित बना सकती है, क्योंकि उनकी बौद्धिक गति और सामाजिक गति में सामंजस्य नहीं बन पाता।
4. समाज में समायोजन :-
समाज में भी प्रतिभाशाली बालकों को समान आयु वर्ग के बच्चों के साथ घुलने-मिलने में कठिनाई होती है। उनकी रुचियाँ और सोचने का स्तर भिन्न होता है, जिसके कारण उन्हें अपने अनुकूल मित्र नहीं मिल पाते। कभी-कभी समाज में प्रचलित परंपराएँ और व्यवहार उन्हें सीमित महसूस कराते हैं, जिससे वे अंतर्मुखी बन जाते हैं।
समाज में भी प्रतिभाशाली बालकों को समान आयु वर्ग के बच्चों के साथ घुलने-मिलने में कठिनाई होती है। उनकी रुचियाँ और सोचने का स्तर भिन्न होता है, जिसके कारण उन्हें अपने अनुकूल मित्र नहीं मिल पाते। कभी-कभी समाज में प्रचलित परंपराएँ और व्यवहार उन्हें सीमित महसूस कराते हैं, जिससे वे अंतर्मुखी बन जाते हैं।
5. अभिमान और आत्मकेंद्रितता :-
जब अध्यापक या अभिभावक किसी बालक की प्रतिभा की अत्यधिक प्रशंसा करते हैं, तो कभी-कभी उसमें अहंकार का विकास हो जाता है। वह स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानने लगता है। ऐसी मानसिकता न केवल उसके सामाजिक संबंधों को प्रभावित करती है बल्कि सहयोगात्मक भावना को भी कम करती है।
जब अध्यापक या अभिभावक किसी बालक की प्रतिभा की अत्यधिक प्रशंसा करते हैं, तो कभी-कभी उसमें अहंकार का विकास हो जाता है। वह स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानने लगता है। ऐसी मानसिकता न केवल उसके सामाजिक संबंधों को प्रभावित करती है बल्कि सहयोगात्मक भावना को भी कम करती है।
6. लापरवाही और उदासीनता :-
प्रतिभाशाली बालक कई बार अपने कार्यों को अत्यधिक सरल मान लेते हैं। परिणामस्वरूप वे बिना पर्याप्त ध्यान दिए कार्य करते हैं और धीरे-धीरे उनमें लापरवाही, ध्यानाभाव और आलस्य की प्रवृत्ति विकसित हो जाती है। यह प्रवृत्ति उनकी सृजनात्मकता को हानि पहुँचाती है।
प्रतिभाशाली बालक कई बार अपने कार्यों को अत्यधिक सरल मान लेते हैं। परिणामस्वरूप वे बिना पर्याप्त ध्यान दिए कार्य करते हैं और धीरे-धीरे उनमें लापरवाही, ध्यानाभाव और आलस्य की प्रवृत्ति विकसित हो जाती है। यह प्रवृत्ति उनकी सृजनात्मकता को हानि पहुँचाती है।
7. बुद्धि का दुरुपयोग :-
जब प्रतिभाशाली बालकों को सही दिशा, मार्गदर्शन या उद्देश्य नहीं मिलता, तो वे अपनी बुद्धि का गलत उपयोग करने लगते हैं। यह अनुशासनहीनता, अवज्ञा या समाज-विरोधी गतिविधियों का रूप ले सकता है। उचित समय पर सकारात्मक दिशा न मिलने से वे नकारात्मक समूहों की ओर आकर्षित हो सकते हैं।
जब प्रतिभाशाली बालकों को सही दिशा, मार्गदर्शन या उद्देश्य नहीं मिलता, तो वे अपनी बुद्धि का गलत उपयोग करने लगते हैं। यह अनुशासनहीनता, अवज्ञा या समाज-विरोधी गतिविधियों का रूप ले सकता है। उचित समय पर सकारात्मक दिशा न मिलने से वे नकारात्मक समूहों की ओर आकर्षित हो सकते हैं।
8. अनुचित संगति और गिरोहबंदी :-
कई बार घर और स्कूल दोनों जगह पर्याप्त स्नेह, प्रशंसा या मान्यता न मिलने पर ये बालक उन लोगों से जुड़ जाते हैं जो उन्हें अस्थायी सहानुभूति देते हैं। परिणामस्वरूप वे गलत संगत में पड़ सकते हैं और अपनी असाधारण क्षमताओं को नकारात्मक कार्यों में व्यर्थ कर देते हैं।
कई बार घर और स्कूल दोनों जगह पर्याप्त स्नेह, प्रशंसा या मान्यता न मिलने पर ये बालक उन लोगों से जुड़ जाते हैं जो उन्हें अस्थायी सहानुभूति देते हैं। परिणामस्वरूप वे गलत संगत में पड़ सकते हैं और अपनी असाधारण क्षमताओं को नकारात्मक कार्यों में व्यर्थ कर देते हैं।
9. शिक्षण विधियों से असंतोष :-
प्रतिभाशाली बालक सामान्य शिक्षण पद्धतियों से जल्दी ऊब जाते हैं। जब अध्यापन में नवीनता और चुनौती की कमी होती है, तो वे पढ़ाई से उदासीन हो जाते हैं। इसलिए ऐसे छात्रों के लिए शिक्षकों को विशेष शिक्षण विधियाँ अपनानी चाहिए जो उनकी रचनात्मकता को प्रोत्साहित करें।
प्रतिभाशाली बालक सामान्य शिक्षण पद्धतियों से जल्दी ऊब जाते हैं। जब अध्यापन में नवीनता और चुनौती की कमी होती है, तो वे पढ़ाई से उदासीन हो जाते हैं। इसलिए ऐसे छात्रों के लिए शिक्षकों को विशेष शिक्षण विधियाँ अपनानी चाहिए जो उनकी रचनात्मकता को प्रोत्साहित करें।
10. विषय और व्यवसाय चयन की समस्या :-
प्रतिभाशाली बालकों की रुचियाँ अनेक प्रकार की होती हैं। वे हर क्षेत्र में रुचि दिखाते हैं, जिससे उन्हें आगे के विषय या करियर का चयन करना कठिन लगता है। कभी-कभी गलत चुनाव के कारण उन्हें जीवन में असंतोष और समायोजन की समस्या का सामना करना पड़ता है।
प्रतिभाशाली बालकों की रुचियाँ अनेक प्रकार की होती हैं। वे हर क्षेत्र में रुचि दिखाते हैं, जिससे उन्हें आगे के विषय या करियर का चयन करना कठिन लगता है। कभी-कभी गलत चुनाव के कारण उन्हें जीवन में असंतोष और समायोजन की समस्या का सामना करना पड़ता है।
प्रतिभाशाली बालकों की पहचान
प्रतिभाशाली बालकों की पहचान एक जटिल प्रक्रिया है, क्योंकि सभी बच्चों में विभिन्न क्षमताएँ अलग-अलग स्तर पर विकसित होती हैं। एक ही मानक से यह तय नहीं किया जा सकता कि कौन बालक प्रतिभाशाली है। इसके लिए कई परीक्षणों, अवलोकनों और सूचनाओं का संयोजन आवश्यक है।1. बुद्धि परीक्षण (Intelligence Tests) :-
अध्यापक या मनोवैज्ञानिक विभिन्न प्रकार के बुद्धि परीक्षणों का प्रयोग करते हैं - जैसे शाब्दिक और अशाब्दिक परीक्षण। इनसे बालक की तार्किक क्षमता, समस्या समाधान कौशल और रचनात्मक सोच का अनुमान लगाया जाता है। सामान्यतः जिन बालकों का बुद्धि लब्धि (IQ) 140 या उससे अधिक होती है, उन्हें प्रतिभाशाली वर्ग में रखा जाता है।
अध्यापक या मनोवैज्ञानिक विभिन्न प्रकार के बुद्धि परीक्षणों का प्रयोग करते हैं - जैसे शाब्दिक और अशाब्दिक परीक्षण। इनसे बालक की तार्किक क्षमता, समस्या समाधान कौशल और रचनात्मक सोच का अनुमान लगाया जाता है। सामान्यतः जिन बालकों का बुद्धि लब्धि (IQ) 140 या उससे अधिक होती है, उन्हें प्रतिभाशाली वर्ग में रखा जाता है।
2. प्रवणता परीक्षण (Aptitude Tests) :-
प्रवणता परीक्षण यह दर्शाते हैं कि बालक भविष्य में किस क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकता है। इन परीक्षणों से उसकी रुचि, दक्षता और संभावित सफलता का पता लगाया जा सकता है।
प्रवणता परीक्षण यह दर्शाते हैं कि बालक भविष्य में किस क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकता है। इन परीक्षणों से उसकी रुचि, दक्षता और संभावित सफलता का पता लगाया जा सकता है।
3. संबंधित व्यक्तियों से जानकारी :-
अध्यापक, अभिभावक, मित्र और पड़ोसी - ये सभी किसी बालक की क्षमताओं के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी दे सकते हैं। इन सूचनाओं का समेकित विश्लेषण प्रतिभाशाली बालकों की पहचान में सहायता करता है।
अध्यापक, अभिभावक, मित्र और पड़ोसी - ये सभी किसी बालक की क्षमताओं के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी दे सकते हैं। इन सूचनाओं का समेकित विश्लेषण प्रतिभाशाली बालकों की पहचान में सहायता करता है।
4. निष्पत्ति परीक्षण (Achievement Tests) :-
ये परीक्षण बालक की वास्तविक शैक्षणिक उपलब्धियों का मूल्यांकन करते हैं। ऐसे परीक्षणों से यह पता चलता है कि वह किसी विषय में औसत से अधिक दक्षता रखता है या नहीं।
ये परीक्षण बालक की वास्तविक शैक्षणिक उपलब्धियों का मूल्यांकन करते हैं। ऐसे परीक्षणों से यह पता चलता है कि वह किसी विषय में औसत से अधिक दक्षता रखता है या नहीं।
5. व्यवहारिक अवलोकन :-
डी. होन और काफ (De Haan & Kough) ने प्रतिभाशाली बालकों के कुछ प्रमुख गुण बताए हैं, जैसे -
डी. होन और काफ (De Haan & Kough) ने प्रतिभाशाली बालकों के कुछ प्रमुख गुण बताए हैं, जैसे -
- शीघ्र स्मरण शक्ति और गहन समझ।
- मौलिक चिंतन और तर्कशीलता।
- शब्द भंडार की समृद्धि।
- कठिन कार्यों को सरलता से पूरा करने की क्षमता।
- रटने की बजाय समझने पर बल देना।
- इन गुणों के आधार पर भी अध्यापक इन बालकों की पहचान कर सकते हैं।
प्रतिभाशाली बालकों की शिक्षा
प्रतिभाशाली बालकों की समस्याओं और विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए उनकी शिक्षा के लिए विशेष प्रबंध आवश्यक हैं। उनकी शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि उनकी रचनात्मकता, भावनात्मक परिपक्वता और सामाजिक संवेदनशीलता का विकास करना भी होना चाहिए।1. समान अवसर :-
सभी बालकों को, चाहे वे सामान्य हों या प्रतिभाशाली, समान सीखने के अवसर मिलने चाहिए। किसी को भी उपेक्षित नहीं किया जाना चाहिए।
सभी बालकों को, चाहे वे सामान्य हों या प्रतिभाशाली, समान सीखने के अवसर मिलने चाहिए। किसी को भी उपेक्षित नहीं किया जाना चाहिए।
2. तीव्र उन्नति से बचाव :-
अक्सर यह गलती की जाती है कि प्रतिभाशाली बालक को उसकी उम्र से पहले अगली कक्षा में भेज दिया जाता है। इससे उसका सामाजिक और भावनात्मक विकास प्रभावित हो सकता है। इसलिए उसकी प्रगति में संतुलन आवश्यक है।
अक्सर यह गलती की जाती है कि प्रतिभाशाली बालक को उसकी उम्र से पहले अगली कक्षा में भेज दिया जाता है। इससे उसका सामाजिक और भावनात्मक विकास प्रभावित हो सकता है। इसलिए उसकी प्रगति में संतुलन आवश्यक है।
3. समृद्ध पाठ्यक्रम :-
प्रतिभाशाली बालक शीघ्र सीखते हैं, इसलिए उनके लिए पाठ्यक्रम में गहराई और विविधता होना चाहिए। नागरिकता, जीवन गाथाएँ, आधुनिक भाषाएँ, विज्ञान प्रयोग और नेतृत्व प्रशिक्षण जैसे विषय उनके सर्वांगीण विकास में सहायक होते हैं।
प्रतिभाशाली बालक शीघ्र सीखते हैं, इसलिए उनके लिए पाठ्यक्रम में गहराई और विविधता होना चाहिए। नागरिकता, जीवन गाथाएँ, आधुनिक भाषाएँ, विज्ञान प्रयोग और नेतृत्व प्रशिक्षण जैसे विषय उनके सर्वांगीण विकास में सहायक होते हैं।
4. असामाजिक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण :-
इन बालकों की रचनात्मक ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देना अनिवार्य है। यदि उन्हें उचित अवसर न मिले, तो वे असामाजिक व्यवहार की ओर अग्रसर हो सकते हैं।
इन बालकों की रचनात्मक ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देना अनिवार्य है। यदि उन्हें उचित अवसर न मिले, तो वे असामाजिक व्यवहार की ओर अग्रसर हो सकते हैं।
5. सर्वांगीण विकास :-
केवल बौद्धिक विकास पर्याप्त नहीं। प्रतिभाशाली बालक का शारीरिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक विकास भी समान रूप से होना चाहिए।
केवल बौद्धिक विकास पर्याप्त नहीं। प्रतिभाशाली बालक का शारीरिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक विकास भी समान रूप से होना चाहिए।
6. बालक-केंद्रित शिक्षा :-
उनकी शिक्षा प्रणाली बालक की व्यक्तिगत रुचियों, क्षमताओं और गति पर आधारित होनी चाहिए। इससे उसकी आंतरिक प्रतिभा को सही दिशा मिलती है।
उनकी शिक्षा प्रणाली बालक की व्यक्तिगत रुचियों, क्षमताओं और गति पर आधारित होनी चाहिए। इससे उसकी आंतरिक प्रतिभा को सही दिशा मिलती है।
7. व्यक्तिगत ध्यान :-
अध्यापक को चाहिए कि वे प्रतिभाशाली बालकों को व्यक्तिगत मार्गदर्शन दें। व्यक्तिगत ध्यान से बालक को अपने लक्ष्यों की स्पष्टता और आत्मविश्वास प्राप्त होता है।
अध्यापक को चाहिए कि वे प्रतिभाशाली बालकों को व्यक्तिगत मार्गदर्शन दें। व्यक्तिगत ध्यान से बालक को अपने लक्ष्यों की स्पष्टता और आत्मविश्वास प्राप्त होता है।
8. अहंमन्यता को रोकना :-
प्रतिभा के साथ विनम्रता भी विकसित की जानी चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य ऐसा वातावरण तैयार करना होना चाहिए जिसमें प्रतिभाशाली बालक सहयोगी और संवेदनशील बने रहें।
प्रतिभाशाली बालक किसी भी राष्ट्र की बौद्धिक पूँजी होते हैं। यदि उनकी क्षमताओं को उचित दिशा, संसाधन और सहयोग न दिया जाए, तो वही प्रतिभा समाज के लिए चुनौती बन सकती है। इसलिए आवश्यक है कि परिवार, विद्यालय और समाज मिलकर ऐसे बालकों को समझें, प्रोत्साहित करें और उनके सर्वांगीण विकास के लिए उचित वातावरण प्रदान करें। यही उनके उज्ज्वल भविष्य और राष्ट्र के विकास की कुंजी है।
प्रतिभा के साथ विनम्रता भी विकसित की जानी चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य ऐसा वातावरण तैयार करना होना चाहिए जिसमें प्रतिभाशाली बालक सहयोगी और संवेदनशील बने रहें।
प्रतिभाशाली बालक किसी भी राष्ट्र की बौद्धिक पूँजी होते हैं। यदि उनकी क्षमताओं को उचित दिशा, संसाधन और सहयोग न दिया जाए, तो वही प्रतिभा समाज के लिए चुनौती बन सकती है। इसलिए आवश्यक है कि परिवार, विद्यालय और समाज मिलकर ऐसे बालकों को समझें, प्रोत्साहित करें और उनके सर्वांगीण विकास के लिए उचित वातावरण प्रदान करें। यही उनके उज्ज्वल भविष्य और राष्ट्र के विकास की कुंजी है।
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