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प्रतिभाशाली बालकों का अर्थ

Meaning of Gifted Children

वह बालक जिसकी मानसिक आयु अपनी आयु वर्ग के अनुपात में औसत से बहुत अधिक हो अथवा ऐसा बालक अपने आयु के बालक को से साधारण अथवा विशेष योग्यता में श्रेष्ठ हो, उसे प्रतिभावान या प्रतिभाशाली बालक कहा जाता है। संगीत, काला या किसी अन्य क्षेत्र में अत्यधिक योग्यता रखने वाला बालक भी प्रतिभाशाली बालकों की श्रेणी में आता है।

‘प्रतिभाशाली’ या ‘प्रतिभावान बालक’ वह बालक होता है, जिसकी मानसिक आयु, बुद्धि लब्धि (Intelligence Quotient - IQ), रचनात्मकता, या किसी विशेष क्षेत्र में योग्यता अपने समान आयु वर्ग के बालकों से काफी अधिक होती है।
ऐसे बालक सामान्य शिक्षा प्रणाली से तेज़ी से सीखते हैं और सामान्य विद्यार्थियों की तुलना में अधिक मौलिकता, जिज्ञासा और सृजनात्मकता प्रदर्शित करते हैं।

प्रतिभाशाली बालक केवल बौद्धिक क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि कला, संगीत, साहित्य, गणित, विज्ञान, खेलकूद, नेतृत्व आदि में भी असाधारण दक्षता दिखा सकते हैं।

प्रमुख शिक्षाविदों द्वारा परिभाषाएँ (Definitions of Gifted Children)

अब्दुल रऊफ के अनुसार :-
“प्रायः उच्च बुद्धि लब्धि को प्रतिभाशाली होने का संकेत माना जाता है। अतः प्रतिभाशाली बालक का अभिप्राय उसकी बुद्धि लब्धि से किया जाता है।”

टरमन (Terman) :-
“प्रतिभाशाली बालक शारीरिक, शैक्षिक, बौद्धिक और व्यक्तित्व की दृष्टि से श्रेष्ठ होते हैं।”
टरमन के अनुसार 140 या उससे अधिक IQ वाला बालक प्रतिभाशाली कहलाता है।

विट्टी एवं नेवी :-
टरमन के निष्कर्षों से सहमत हैं कि प्रतिभाशाली बालक हर क्षेत्र में अपने साथियों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं।

अमेरिकी शिक्षा विभाग (U.S. Office of Education) :-
“प्रतिभाशाली बालक केवल वे नहीं हैं जिनकी बुद्धि लब्धि उच्च है, बल्कि वे सभी बालक प्रतिभाशाली हैं जो किसी भी क्षेत्र-कला, साहित्य, संगीत, गणित, विज्ञान आदि-में अपने साथियों की तुलना में अधिक श्रेष्ठ हैं।”

टेलिंगवर्थ :-
एक 5 वर्षीय बालक का उल्लेख करते हैं जिसने उस आयु में ही कविता लिखी थी; यह इस बात का प्रमाण है कि प्रतिभा केवल उम्र पर निर्भर नहीं होती।

कालसनिक (Kalsnik) :-
“वह बालक जो अपने स्तर के बच्चों में किसी विशेष योग्यता में श्रेष्ठ हो और समाज के लिए कुछ नया या महत्वपूर्ण योगदान कर सके।”

हैविग्हर्स्ट (Havighurst) :-
“प्रतिभाशाली बालक वह है जो निरंतर किसी भी कार्य क्षेत्र में अपनी श्रेष्ठ कार्यकुशलता का प्रदर्शन करता है।”

प्रेम पसरीचा :-
“प्रतिभाशाली बालक वह है जो सामान्य बुद्धि की दृष्टि से श्रेष्ठ प्रतीत हो या उन क्षेत्रों में असाधारण योग्यता रखता हो, जिनका संबंध आवश्यक रूप से उच्च बुद्धि लब्धि से नहीं होता।”

इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि प्रतिभाशाली बालक वे होते हैं जो सामान्य बालकों की अपेक्षा बौद्धिक, रचनात्मक, सामाजिक या कलात्मक दृष्टि से अधिक योग्यता रखते हैं।

प्रतिभाशाली बालकों के लिए शैक्षिक व्यवस्थाएँ (Educational Provisions for Gifted Children)

विद्यालय में प्रतिभाशाली बालकों की उपस्थिति अध्यापकों के लिए चुनौतीपूर्ण होती है क्योंकि ये बच्चे सामान्य विद्यार्थियों से अलग गति और शैली में सीखते हैं। अतः इनके लिए कुछ विशेष शैक्षिक व्यवस्थाएँ आवश्यक हैं।

1. अवसरों की समानता (Equality of Opportunity) :-
अध्यापक को सभी विद्यार्थियों को समान अवसर देने चाहिए।
प्रतिभाशाली बालकों को अपनी योग्यता और कल्पनाशक्ति प्रदर्शित करने के पर्याप्त अवसर दिए जाएँ, ताकि उनका सर्वांगीण विकास हो सके।
 
2. तीव्र पदोन्नति (Acceleration) :-
कुछ विशेषज्ञ प्रतिभाशाली बालकों को उच्च कक्षा में भेजने का सुझाव देते हैं।
किन्तु यह तभी उचित है जब बालक मानसिक, शारीरिक और सामाजिक रूप से उस स्तर के लिए परिपक्व हो। अन्यथा यह उसके भावनात्मक विकास के लिए हानिकारक हो सकता है।
 
3. समृद्धि कार्यक्रम (Enrichment Programmes) :-
ऐसे बालकों को अतिरिक्त और गहराई वाले कार्य दिए जाने चाहिए, जिससे उनकी जिज्ञासा और सृजनशीलता को दिशा मिल सके।
जैसे - विज्ञान प्रयोग, प्रोजेक्ट कार्य, लेखन प्रतियोगिताएँ, चित्रकला या संगीत के विशेष वर्ग आदि।
 
4. व्यक्तिगत शिक्षा (Individualized Instruction) :-
हर प्रतिभाशाली बालक की रुचि और क्षमता भिन्न होती है। अतः शिक्षण पद्धति को बालक की गति और रुचि के अनुसार बनाया जाना चाहिए।
 
5. सर्वांगीण विकास (Holistic Development) :-
शिक्षा का उद्देश्य केवल बौद्धिक विकास नहीं है।
प्रतिभाशाली बालक को सामाजिक, नैतिक, भावनात्मक और रचनात्मक दृष्टि से भी परिपूर्ण बनाना आवश्यक है, ताकि उनमें घमंड या एकाकीपन न विकसित हो।
 
6. शिक्षक प्रशिक्षण (Teacher Training) :-
प्रतिभाशाली बालकों की पहचान, मार्गदर्शन और शिक्षण के लिए शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि वे उनकी आवश्यकताओं को समझ सकें।

प्रतिभाशाली बालकों की विशेषताएँ (Characteristics of Gifted Children)

प्रतिभाशाली बालक एक-दूसरे से भिन्न होते हैं, परंतु सामान्यतः उनमें कुछ समान विशेषताएँ पाई जाती हैं -
1. शारीरिक विशेषताएँ :-
  • स्वास्थ्य और ऊर्जा सामान्य बालकों से अधिक।
  • कार्य करने की क्षमता और सहनशक्ति अधिक होती है।
2. संवेगात्मक विशेषताएँ :-
  • गहरी भावनात्मक समझ और आत्मसंयम।
  • असफलता से जल्दी उभर जाते हैं।
  • कभी-कभी अकेलेपन या ऊब की भावना भी महसूस करते हैं।
3. सामाजिक विशेषताएँ :-
  • नेतृत्व की भावना प्रबल होती है।
  • समूह में लोकप्रिय होते हैं और दूसरों की सहायता करने में रुचि रखते हैं।
4. शैक्षिक उपलब्धियाँ :-
  • तेजी से सीखना, गहरी समझ और कठिन अवधारणाओं को सहजता से ग्रहण करना।
  • सृजनात्मक सोच और समस्या-समाधान में निपुणता।
5. सहगामी क्रियाएँ :-
  • खेल, संगीत, नाटक, कला या साहित्य में उत्कृष्ट प्रदर्शन।
  • प्रतियोगिताओं में रुचि और भागीदारी।
6. बौद्धिक विशेषताएँ :-
  • उच्च IQ, तार्किक और विश्लेषणात्मक सोच।
  • नई चीजें सीखने और खोजने की तीव्र जिज्ञासा।
7. व्यक्तिगत विशेषताएँ :-
  • आत्मविश्वासी और स्वावलंबी।
  • मौलिक विचारों वाले, परंतु कभी-कभी अधीर या आत्मकेंद्रित भी हो सकते हैं।
8. नकारात्मक विशेषताएँ :-
  • कभी-कभी घमंड, असहयोग या सामाजिक अलगाव की प्रवृत्ति विकसित हो जाती है।
  • यदि सही मार्गदर्शन न मिले तो उनकी प्रतिभा दब सकती है।

विशिष्ट बालकों के प्रकार (Types of Exceptional Children)

विद्यालय में अलग-अलग प्रकार के विद्यार्थी होते हैं। कुछ बच्चे विशेष क्षमताओं या कमियों के कारण सामान्य बच्चों से अलग होते हैं। इन्हें विशिष्ट बालक (Exceptional Children) कहा जाता है।
इनकी प्रमुख श्रेणियाँ निम्नलिखित हैं -
  1. प्रतिभाशाली बालक (Gifted Children) - असाधारण योग्यता वाले।
  2. पिछड़े बालक (Backward Children) - जिनकी सीखने की गति धीमी होती है।
  3. मंदबुद्धि बालक (Mentally Retarded Children) - जिनकी बुद्धि सामान्य से कम होती है।
  4. बाल अपराधी (Delinquent Children) - अनुशासनहीन या असामाजिक प्रवृत्ति वाले।
  5. विकलांग बालक (Disabled Children) - जो शारीरिक या मानसिक अक्षमता से ग्रसित हों।
प्रतिभाशाली बालक किसी भी समाज की सबसे मूल्यवान पूँजी होते हैं। यदि इन्हें उचित अवसर, संसाधन और दिशा दी जाए तो ये समाज और देश के विकास में अद्वितीय योगदान दे सकते हैं।
शिक्षा व्यवस्था का दायित्व है कि ऐसे बालकों की पहचान कर उन्हें ऐसा वातावरण प्रदान करे जिससे वे अपनी सम्पूर्ण क्षमता का विकास कर सकें और समाज के प्रति उपयोगी नागरिक बनें।

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