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पिछड़े बालकों के पिछड़ेपन के कारण एवं उनकी समस्याएं

Causes of backwardness of backward children and their problems

समाज में प्रत्येक बालक अपनी क्षमताओं, रुचियों, बुद्धि और सीखने की गति में भिन्न होता है। कुछ बालक अत्यंत प्रतिभाशाली होते हैं, तो कुछ सामान्य स्तर के, और कुछ ऐसे भी होते हैं जो अध्ययन, व्यवहार या सामाजिक समायोजन में सामान्य स्तर से पीछे रह जाते हैं। ऐसे बालक जिन्हें मानसिक, शैक्षणिक या सामाजिक दृष्टि से औसत स्तर से नीचे पाया जाता है, “पिछड़े बालक” (Backward Children) कहलाते हैं।

पिछड़ापन केवल अध्ययन की कमजोरी नहीं है, बल्कि यह बालक के संपूर्ण व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करता है। इन बालकों में आत्मविश्वास की कमी, संकोच, सामाजिक दूरी, और शिक्षा के प्रति उदासीनता जैसी प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं।
इस पिछड़ेपन के कारणों की खोज करना, उन्हें समझना और उनके समाधान के उपाय करना शिक्षा मनोविज्ञान का अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है।

पिछड़े बालकों की परिभाषाएँ (Definitions of backward children)

विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने पिछड़ेपन की अलग-अलग परिभाषाएँ दी हैं :-
  • डॉल (Doll) के अनुसार - “पिछड़े बालक वे हैं जिनकी बौद्धिक, शैक्षणिक और सामाजिक उपलब्धियाँ उनकी आयु और क्षमता के सामान्य स्तर से कम होती हैं।”
  • ट्रैडगोल्ड (Tredgold) का मत है कि - “पिछड़ेपन का मूल कारण दोषपूर्ण वातावरण है, जो बालक के मानसिक विकास को अवरुद्ध कर देता है।”
  • स्किनर (Skinner) के अनुसार - “सांस्कृतिक, शारीरिक, शैक्षणिक और संवेगात्मक कारक बालक के पिछड़ेपन के प्रमुख कारण हैं।”
इन सभी परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि पिछड़ापन किसी एक कारक का परिणाम नहीं होता, बल्कि यह जैविक, पर्यावरणीय और मनोवैज्ञानिक तत्वों के सम्मिलित प्रभाव से उत्पन्न होता है।

पिछड़ेपन के प्रकार

पिछड़ेपन को उसके स्वरूप के आधार पर विभिन्न प्रकारों में बाँटा जा सकता है  -
शैक्षणिक पिछड़ापन (Educational Backwardness) :-
ऐसे बालक जो अपनी कक्षा या आयु के अनुसार निर्धारित पाठ्यक्रम को नहीं समझ पाते और पढ़ाई में सामान्य बालकों से पीछे रह जाते हैं।

मानसिक पिछड़ापन (Mental Backwardness) :-
यह कम बुद्धि लब्धि (IQ) या मानसिक दुर्बलता के कारण होता है। ऐसे बालक सामान्य अवधारणाओं को भी समझने में कठिनाई अनुभव करते हैं।

सामाजिक पिछड़ापन (Social Backwardness) :-
ऐसे बालक सामाजिक संपर्क, मित्रता या समूह गतिविधियों में सहजता से भाग नहीं लेते और समाज से अलग-थलग रहते हैं।

भावनात्मक या संवेगात्मक पिछड़ापन (Emotional Backwardness) :-
जिन बालकों में आत्मग्लानि, भय, असुरक्षा या हीन भावना अधिक होती है, वे भावनात्मक रूप से अस्थिर रहते हैं और सामान्य वातावरण में समायोजित नहीं हो पाते।

पिछड़ेपन के प्रमुख कारण  (The main causes of backwardness)

1. शारीरिक कारण :-
शारीरिक स्वास्थ्य बालक के मानसिक विकास का आधार होता है। यदि शरीर स्वस्थ नहीं है, तो मन भी अपनी पूर्ण क्षमता से कार्य नहीं कर पाता।

(क) ज्ञानेंद्रियों में दोष :-
दृष्टि, श्रवण या वाणी संबंधी दोषों के कारण बालक कक्षा की गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग नहीं ले पाता।
जैसे - कम सुनना, हकलाना, तुतलाना, या दृष्टि दोष होना।
ऐसे दोष जन्मजात भी हो सकते हैं या जीवन में बाद में किसी बीमारी के कारण भी उत्पन्न हो सकते हैं। यदि इनका समय पर उपचार न हो, तो बालक धीरे-धीरे अध्ययन से विमुख हो जाता है।

(ख) वाणी या भाषा दोष :-
बोलने में कठिनाई होने से बालक अपनी बात व्यक्त नहीं कर पाता और दूसरों के साथ घुल-मिल नहीं पाता।
इससे सामाजिकता और आत्मविश्वास दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

(ग) ग्रंथियों का असंतुलन :-
अंतःस्रावी ग्रंथियों की कार्यविधि यदि असंतुलित हो, तो बालक के व्यवहार, ऊर्जा और एकाग्रता पर सीधा असर पड़ता है।
जैसे - थायरॉइड ग्रंथि की गड़बड़ी या लैंगिक ग्रंथियों के अधिक सक्रिय या निष्क्रिय होने से बालक का ध्यान अध्ययन से भटक सकता है।

(घ) कमजोर स्वास्थ्य :-
कुपोषण, रोग या दुर्बलता से ग्रस्त बालक शीघ्र थक जाते हैं, उनमें एकाग्रता नहीं रहती और वे पढ़ाई में पीछे रह जाते हैं।

2. मानसिक या बौद्धिक कारण :-
  • बुद्धि बालक के सीखने की गति और समझ की गहराई निर्धारित करती है।
  • कम IQ वाले बालक तार्किक और विश्लेषणात्मक चिंतन में कठिनाई अनुभव करते हैं।
  • वे नई जानकारी को आत्मसात करने में अधिक समय लेते हैं।
  • बर्ट (Burt) के अनुसार — “कम बुद्धि ही पिछड़ेपन का मूल कारण है।”
  • ऐसे बालक जटिल विषयों से डरते हैं और साधारण कार्यों पर ही सीमित रहते हैं।
3. वातावरण संबंधी कारण :-
(क) पारिवारिक वातावरण :-
  • परिवार बालक का पहला विद्यालय है।
  • यदि घर का वातावरण शिक्षण के अनुकूल न हो - जैसे झगड़े, अभाव, असुरक्षा या माता-पिता की उपेक्षा - तो बालक में सीखने की प्रेरणा नहीं पनपती।
  • शिक्षित परिवारों में माता-पिता बच्चों को प्रोत्साहित करते हैं, जबकि अशिक्षित या निर्धन परिवारों में शिक्षा को महत्व नहीं दिया जाता।
  • इससे बालक में आत्मविश्वास की कमी और पढ़ाई के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है।
(ख) विद्यालय का वातावरण :-
विद्यालय का दोषपूर्ण वातावरण भी पिछड़ेपन का बड़ा कारण है।
इसमें शामिल हैं -
  • अध्यापकों का पक्षपातपूर्ण रवैया
  • अनुशासनहीनता
  • प्रेरणा का अभाव
  • असुविधाजनक कक्षाएँ (प्रकाश, वायु, जल आदि की कमी)
  • बड़ी कक्षाएँ और भीड़भाड़
  • व्यक्तिगत ध्यान की कमी
  • नीरस शिक्षण पद्धतियाँ
  • जब बालक को विद्यालय में अपनापन या सहयोग नहीं मिलता, तो वह अध्ययन से विमुख हो जाता है।
4. सामाजिक और सांस्कृतिक कारण :-
समाज बालक के व्यक्तित्व विकास में अहम भूमिका निभाता है।
यदि समाज में भेदभाव, असमानता या शिक्षा के प्रति उदासीनता हो, तो बालक का आत्मविश्वास कमजोर हो जाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक कठिनाई और परंपरागत सोच के कारण बालकों को जल्दी श्रम में लगा दिया जाता है।
कुछ परिवारों में शिक्षा को अनावश्यक समझा जाता है - विशेषकर कन्या शिक्षा के मामले में।
इस प्रकार की सांस्कृतिक मान्यताएँ भी पिछड़ेपन को बढ़ाती हैं।

सामाजिक वर्गभेद, जातिगत असमानता, आर्थिक विषमता और अभिभावकों की शिक्षा का निम्न स्तर - ये सभी कारक बालकों के मानसिक विकास को सीमित करते हैं।
 
5. मनोवैज्ञानिक कारण :-
पिछड़ापन केवल बाहरी कारणों का परिणाम नहीं होता; यह बालक के भीतर की मनोवैज्ञानिक स्थिति से भी जुड़ा होता है।
  • हीन भावना :- बार-बार असफलता मिलने से बालक स्वयं को अयोग्य मानने लगता है।
  • भय और असुरक्षा :- कठोर दंड, अपमान या आलोचना से बालक डरपोक बन जाता है।
  • संवेगात्मक असंतुलन :- भावनाओं पर नियंत्रण न होने से बालक ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता।
  • अवसाद और निराशा :- असफलता के अनुभव से उसका उत्साह कम हो जाता है और धीरे-धीरे वह उदासीन बन जाता है।
  • इन मनोवैज्ञानिक समस्याओं का सीधा प्रभाव उसकी शिक्षा, संबंधों और भविष्य पर पड़ता है।
6. अन्य बाहरी कारण :-
मीडिया, पड़ोस, मित्र समूह और सामाजिक संस्थाएँ भी बालक के व्यवहार पर प्रभाव डालती हैं।
यदि बालक अनुचित संगति में पड़ जाए या टीवी, मोबाइल, गेम्स जैसे माध्यमों का अति प्रयोग करे, तो उसकी अध्ययन में रुचि घट जाती है।
धार्मिक या सांस्कृतिक संस्थाओं में नकारात्मक विचारों का प्रभाव भी उसके व्यक्तित्व को प्रभावित कर सकता है।

पिछड़े बालकों की प्रमुख समस्याएँ  (Major problems faced by backward children )

1. विद्यालय संबंधी समस्याएँ :-
  • सीखने की गति अत्यंत धीमी होती है।
  • बार-बार असफल होने से उनमें भय और निराशा उत्पन्न होती है।
  • अध्यापक से दूरी और सहपाठियों के उपहास के कारण वे स्वयं को अलग-थलग महसूस करते हैं।
  • विद्यालय की सुविधाओं की कमी और शिक्षण पद्धति की कठोरता उन्हें अध्ययन से विमुख कर देती है।
  • परिणामस्वरूप वे अनुपस्थित रहने लगते हैं या पढ़ाई छोड़ भी देते हैं।
2. संवेगात्मक समस्याएँ :-
शैक्षणिक असफलता के कारण पिछड़े बालक भावनात्मक रूप से अस्थिर हो जाते हैं।
उनमें असुरक्षा, हीन भावना, आत्मग्लानि, ईर्ष्या और अविश्वास जैसी प्रवृत्तियाँ बढ़ जाती हैं।
ऐसे बालकों को प्रोत्साहन और स्नेह की अत्यधिक आवश्यकता होती है।
यदि उन्हें यह समर्थन न मिले तो वे समाज से कटकर अंतर्मुखी बन जाते हैं।
 
3. सामाजिक समस्याएँ :-
सामाजिक संपर्कों में पिछड़े बालक झिझक महसूस करते हैं।
वे समूह में घुलने-मिलने से बचते हैं, जिससे समाज में उनका आत्मविश्वास घटता है।
कुछ मामलों में असुरक्षा या अकेलेपन के कारण वे असामाजिक समूहों से जुड़ जाते हैं।
ऐसी परिस्थितियाँ उन्हें समाज-विरोधी गतिविधियों की ओर भी ले जा सकती हैं।

शिक्षण एवं सुधारात्मक उपाय (Remedial Measures)

पिछड़े बालकों को सामान्य बालकों की तरह ही सम्मान, अवसर और सहयोग की आवश्यकता होती है।
अध्यापक और परिवार मिलकर इन उपायों को अपनाकर उनके जीवन में सुधार ला सकते हैं -

व्यक्तिगत ध्यान और परामर्श :-
प्रत्येक बालक की गति और क्षमता के अनुसार शिक्षण करना।

प्रेरक वातावरण :-
कक्षा को आकर्षक, रोचक और प्रोत्साहनपूर्ण बनाना।

विशेष शिक्षण विधियाँ :-
धीमी गति से, पुनरावृत्ति और उदाहरणों के माध्यम से सिखाना।

सकारात्मक प्रेरणा :-
बालक की छोटी-छोटी उपलब्धियों पर प्रशंसा करना ताकि उसमें आत्मविश्वास बढ़े।

सामाजिक गतिविधियाँ :-
समूह खेल, नाटक, कला आदि में सम्मिलित करके उनमें सामाजिकता विकसित करना।

मनोवैज्ञानिक परामर्श :-
हीन भावना या भय से ग्रस्त बालकों को मनोवैज्ञानिक मार्गदर्शन देना।

परिवार की भूमिका :-
घर का वातावरण सहयोगी, स्नेहमय और प्रोत्साहनपूर्ण होना चाहिए।
माता-पिता को बच्चों की कमजोरियों पर आलोचना न करके उन्हें सुधारने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

सरकार और समाज की भूमिका :-
विशेष शिक्षण केंद्र, समावेशी शिक्षा (Inclusive Education), नि:शुल्क उपचार और छात्रवृत्ति जैसी योजनाएँ पिछड़े बालकों के उत्थान में सहायक हो सकती हैं।

पिछड़े बालक समाज की वह श्रेणी हैं जिन्हें सबसे अधिक सहानुभूति, सहयोग और समझ की आवश्यकता होती है।
उनका पिछड़ापन किसी व्यक्तिगत दोष का परिणाम नहीं, बल्कि समाज और वातावरण की असमानताओं का प्रतिबिंब है।
यदि उन्हें सही दिशा, उचित शिक्षण और प्रेरक वातावरण दिया जाए तो वे भी समाज के उपयोगी और सफल सदस्य बन सकते हैं।

इसलिए परिवार, विद्यालय, समाज और सरकार - सभी को मिलकर इनके सर्वांगीण विकास के लिए प्रयास करने चाहिए।
यही एक सच्चे शिक्षित और समतामूलक समाज की पहचान है।


पिछड़े बालकों के पिछड़ेपन के कारण एवं उनकी समस्याएं : संक्षिप्त सारांश

समाज में प्रत्येक बालक अपनी क्षमताओं, बुद्धि और रुचियों में भिन्न होता है। कुछ बालक तेज़ी से सीखते हैं तो कुछ सामान्य गति से, परंतु कुछ ऐसे भी होते हैं जो अध्ययन, व्यवहार और सामाजिक जीवन में सामान्य स्तर से पीछे रह जाते हैं। ऐसे बालक “पिछड़े बालक” (Backward Children) कहलाते हैं। इनका पिछड़ापन केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह उनके भावनात्मक, सामाजिक और मानसिक विकास को भी प्रभावित करता है।

पिछड़ेपन के प्रकार  (Types of backwardness)

शैक्षणिक पिछड़ापन: पढ़ाई में सामान्य बालकों से पीछे रहना।
मानसिक पिछड़ापन: बुद्धि लब्धि (IQ) सामान्य से कम होना।
सामाजिक पिछड़ापन: समाज और समूहों में समायोजन की कठिनाई।
संवेगात्मक पिछड़ापन: आत्मविश्वास की कमी, भय और अस्थिरता।

पिछड़ेपन के प्रमुख कारण (The main causes of backwardness)

1. शारीरिक कारण :-
  • दृष्टि, श्रवण या वाणी में दोष।
  • ग्रंथियों का असंतुलन (जैसे थायरॉइड)।
  • कमजोर स्वास्थ्य या रोगग्रस्तता।
  • इन कारणों से बालक का ध्यान अध्ययन पर नहीं रहता और वह धीरे-धीरे पिछड़ जाता है।
2. मानसिक कारण :-
कम बुद्धि लब्धि (IQ) वाले बालक जटिल विषयों को समझने में कठिनाई अनुभव करते हैं।
उनकी सोचने, तर्क करने और याद रखने की क्षमता सीमित होती है।
 
3. पारिवारिक वातावरण :-
अशिक्षित माता-पिता, गरीबी, झगड़े, असुरक्षा या बच्चों के प्रति उदासीनता - ये सभी कारण शिक्षा में बाधक बनते हैं।
स्नेह, प्रोत्साहन और अध्ययन के अनुकूल माहौल का अभाव पिछड़ेपन को बढ़ाता है।
 
4. विद्यालय का वातावरण :-
  • अध्यापकों का पक्षपातपूर्ण रवैया
  • अनुशासनहीनता और प्रेरणा का अभाव
  • व्यक्तिगत ध्यान की कमी
  • शिक्षण विधियों की कठोरता
  • सुविधाओं (फर्नीचर, प्रकाश, पुस्तकालय आदि) का अभाव
  • इन कारणों से बालक विद्यालय से विमुख हो जाते हैं।
5. सामाजिक व सांस्कृतिक कारण :-
गरीबी, जातिगत भेदभाव, परंपरागत सोच और शिक्षा के प्रति अरुचि भी पिछड़ेपन का कारण बनते हैं।
कई अभिभावक बच्चों को जल्दी श्रम में लगा देते हैं जिससे वे विद्यालय नहीं जा पाते।
 
6. मनोवैज्ञानिक कारण :-
  • हीन भावना
  • असुरक्षा और भय
  • निराशा और अवसाद
  • आत्मविश्वास की कमी
  • ये कारण बालक को मानसिक रूप से अस्थिर कर देते हैं, जिससे उसकी सीखने की क्षमता प्रभावित होती है।
7. अन्य कारण :-
गलत संगति, मोबाइल या टीवी की लत, अनुचित मीडिया प्रभाव आदि भी पिछड़ेपन को बढ़ावा देते हैं।

पिछड़े बालकों की प्रमुख समस्याएँ  (Major problems faced by backward children)

(क) विद्यालय संबंधी समस्याएँ :-
पढ़ाई में असफलता, कम अंक, अध्यापकों से दूरी, उपहास का भय और विद्यालय में असुविधाएँ।
वे धीरे-धीरे पढ़ाई से रुचि खो देते हैं।

(ख) संवेगात्मक समस्याएँ :-
हीन भावना, असुरक्षा, आत्मग्लानि और भावनात्मक अस्थिरता।
इनके कारण वे दूसरों से दूर रहते हैं और आत्मविश्वास खो देते हैं।

(ग) सामाजिक समस्याएँ :-
सहपाठियों के साथ घुलना-मिलना कठिन लगता है।
अकेलेपन और अस्वीकार के कारण कभी-कभी वे गलत संगति में पड़ जाते हैं और समाज विरोधी व्यवहार करने लगते हैं।

सुधारात्मक उपाय (Remedial Measures)

  • व्यक्तिगत ध्यान और विशेष शिक्षण।
  • प्रेरक और सहयोगी वातावरण।
  • छोटी उपलब्धियों पर प्रशंसा।
  • सामाजिक गतिविधियों में सहभागिता।
  • मनोवैज्ञानिक परामर्श और मार्गदर्शन।
  • परिवार और विद्यालय का समन्वय।
  • सरकारी सहायता - छात्रवृत्ति, समावेशी शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा।
पिछड़े बालक समाज का अभिन्न हिस्सा हैं। उनका पिछड़ापन कोई दोष नहीं, बल्कि परिस्थितियों का परिणाम है।
यदि परिवार, शिक्षक और समाज मिलकर उन्हें सहयोग, स्नेह और सही मार्गदर्शन दें, तो ये बालक भी आत्मविश्वासी, योग्य और उपयोगी नागरिक बन सकते हैं।
सच्ची शिक्षा वही है जो प्रत्येक बालक को आगे बढ़ने का अवसर दे - चाहे वह कितना भी पिछड़ा क्यों न हो।

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