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पिछड़े बालकों का अर्थ

Meaning of backward children

पिछड़े बालकों को शिक्षा की दृष्टि से पिछड़ा लिखा जाता है क्योंकि मंद गति से सीखने वाले बालक की शिक्षा के क्षेत्र में या तो सामान्य बालकों से पीछे रह जाते हैं या पूर्णतया असफल रहते हैं। पिछड़े बालकों को परिभाषित करने के लिए बुद्धि लब्धि स्तर का प्रयोग नहीं किया जाता है बल्कि निष्पत्ति या शैक्षिक लब्धि को आधार माना जाता है।

प्रमुख विद्वानों की परिभाषाएँ (Definitions of Backward Children)

1. सिरिल बर्ट (Cyril Burt) :-
“पिछड़ा बालक वह है जो विद्यालय जीवन के मध्य में अपने स्तर की कक्षा के बजाय एक निचली कक्षा का कार्य करने में असमर्थ हो।”
उनके अनुसार, जिस बालक की शैक्षिक उपलब्धि 85% से कम हो, उसे पिछड़ा बालक कहा जा सकता है।

2. बार्टन हार्ट (Barton Hart) :-
“वे बालक जिनकी शैक्षिक उपलब्धि उस स्तर से कम होती है जिसके लिए वे योग्य होते हैं, पिछड़े बालक कहलाते हैं।”

3. शॉलन (Shaulan) :-
“पिछड़ा विद्यार्थी वह है जो अपनी आयु वर्ग के अन्य विद्यार्थियों की तुलना में शैक्षिक रूप से अत्यधिक दुर्बलता दर्शाता है।”

4. टी. के. मेनन (T.K. Menon) :-
भारतीय परिस्थितियों में, “पिछड़ा बालक वह होता है जो अपनी कक्षा की औसत आयु से कम से कम एक वर्ष बड़ा हो।”

पिछड़े बालकों के प्रकार
Types of backwardness

पिछले बालकों के वर्गीकरण के लिए विभिन्न प्रकार के मापदंडों का प्रयोग किया गया है। बिछड़ने की पहचान और वर्गीकरण के लिए कुछ विद्वानों ने तंत्रिका तंत्र में दोष के स्तर को आधार माना है। इस वर्गीकरण के अनुसार पिछड़े बालकों के निम्नलिखित प्रकार हैं -
मंदबुद्धि, हीन बुद्धि और जड़ बुद्धि। इनमें जड़ बुद्धि की बुद्धि लब्धि 0 से 19 तक होती है, हिना बुद्धि बालक को में बुद्धि लब्धि 14 से 20 तक होती है और मंदबुद्धि बालकों में 50 से 69 तक होती है।

1. बुद्धि लब्धि (IQ) के आधार पर वर्गीकरण  -
  • जड़ बुद्धि (Idiocy) - IQ स्तर 0 से 19 तक।
  • हीन बुद्धि (Imbecility) - IQ स्तर 20 से 49 तक।
  • मंदबुद्धि (Feeble-mindedness) - IQ स्तर 50 से 69 तक।
2. अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ मेंटल डिफिशिएंसी (AAMD) के अनुसार  -
  • सीमांत स्वतंत्र मंदता (Borderline Independence) - IQ 67 से 52 तक।
  • मध्यम मानसिक मंदता (Moderate Independence) - IQ 51 से 36 तक।
  • गंभीर मंदता (Severe Independence) - IQ 19 या इससे कम।
कक्षा में शैक्षणिक विकास के आधार पर पिछड़े बालकों का वर्गीकरण इस प्रकार से किया जाता है -
सामान्य पिछड़ापन :-
इस प्रकार पिछड़ापन बालक के सभी पक्षों में दिखाई देगा। कक्षा में लगभग सभी विषयों में वह सामान्य बालकों से पिछड़ा होता है। पाठ्यक्रम क्रियाओं में से उसे कोई सफलता नहीं मिलती या वह उस में भाग नहीं लेता है।

विशिष्ट पिछड़ापन :-
इस प्रकार के पिछड़ेपन से अभिप्राय है कि बालक का किसी एक विशेष पक्ष में दुर्बलता का प्रदर्शन करना। सभी विषयों में यह पिछड़ेपन की बजाय किसी विशेष विषय में किसी कारणवश वह सामान्य बालकों के साथ नहीं चल पाता और वह उस विषय में उनकी तुलना में पिछड़ जाता है।

पिछड़ेपन की पहचान की प्रविधियां
Technique of identification of backwardness

कक्षा में विभिन्न प्रकार के विशिष्ट बालकों की पहचान के लिए विभिन्न विधियों का प्रयोग करना पड़ता है। प्रत्येक प्रकार के विशिष्ट बालक की अपनी विशेषताएं होती हैं। पिछड़े बालकों की पहचान के लिए भी अध्यापक को विभिन्न मापदंडों का प्रयोग करना पड़ता है। इन बालकों की पहचान के लिए निम्नलिखित विधियों का प्रयोग कर सकते हैं

सामूहिक परीक्षण :-
कक्षा में पिछड़े बालकों के पहचान के लिए सभी बालकों की समूह में परीक्षा होनी चाहिए। इन सामूहिक परीक्षाओं में बुद्धि परीक्षण और अभिरुचि परीक्षण, रुचि परीक्षण व व्यक्तित्व परीक्षण सम्मिलित हो सकते हैं।

उपलब्धि परीक्षण :-
कक्षा में विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धियों के आधार पर पिछड़े बालकों का पता लगाने के लिए विशेष रूप से उपलब्ध परीक्षणों का प्रयोग भी किया जाता है। यह उपलब्धि परीक्षण वस्तुनिष्ठ प्रकार के भी हो सकते हैं। इन से प्राप्त अंकों के आधार पर पिछड़ेपन का अनुमान लगाया जा सकता है। लेकिन ऐसे परीक्षण बनाने में अध्यापक को अत्यधिक सावधानी से प्रयोग करना चाहिए। क्योंकि इन परीक्षणों को तैयार करते समय विद्यालय विषयों के सभी पक्षों का परीक्षण होना आवश्यक है।

व्यक्तिगत बुद्धि परीक्षण :-
पिछड़े बालकों की पहचान के लिए व्यक्तिगत बुद्धि परीक्षणों के आधार पर चुने हुए बालकों का व्यक्तिगत बुद्धि परीक्षण ओं द्वारा भी परीक्षण किया जाता है। इसमें व्यक्तिगत बुद्धि लब्धि का स्तर मालूम हो जाता है।

पिछड़े बालकों की समस्याएं
Problems of backward children

पिछड़े बालकों में कई प्रकार की मान्यताएं होने के कारण बालकों को शिक्षा एवं समायोजन संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं के परिणाम स्वरूप अध्यापक को इन बालकों की शिक्षा एवं समायोजन के लिए विशेष प्रयत्न करने पड़ते हैं।

विद्यालय संबंधी समस्याएं :-
पिछड़े बालक सीखने में मंद होते हैं। वह समस्त कक्षा के बच्चों के सीखने की गति के साथ नहीं चल सकते हैं। सामान्य बालकों को पिछड़े बालकों के साथ अधिगम में कठिनाई अनुभव होती है। शैक्षिक दृष्टि से जो पिछड़े बालक की उपलब्धि हो सकती है वह उसे उपलब्ध करने में असफल रहते हैं। अपनी आयु के बच्चों से वह पढ़ाई के मामले में अधिक पीछे रह जाते हैं। कई परिस्थितियों में तो पिछड़े बालक अपने से कम आयु वाले बालकों के साथ भी कार्य नहीं कर सकते परिणाम स्वरूप विभिन्न परीक्षाओं में अपव्यय में होता रहता है।

इसके अतिरिक्त ऐसे पिछड़े बालकों और अध्यापकों के संबंध में दूरी होने के कारण वह उस वातावरण में स्वयं को समायोजित करने में कठिनाई का अनुभव करते हैं। स्कूल और कक्षा में अनुशासन हीनता, विद्यार्थियों में अभिप्रेरणा की कमी, पाठांतर क्रियाओं का अभाव, अयोग्य अध्यापकों की नियुक्ति, शैक्षणिक निर्देशन का अभाव, अध्यापकों का पक्षपातपूर्ण व्यवहार, अध्यापकों की ऐसी बालकों के प्रति लापरवाही, अध्यापक द्वारा व्यक्तिगत ध्यान ना देना, कक्षा में अन्य सुविधाओं, जैसे फर्नीचर, पुस्तकालय, हवा तथा प्रकाश का प्रबंध, पीने के पानी का प्रबंध, शिक्षा सामग्री का ना होना, कक्षाओं का बड़ा आकार, आदि कारक पिछड़े हुए बालकों का स्कूल और कक्षाओं में समायोजन करने में बाधाएं उत्पन्न करते हैं। जिसके परिणाम स्वरूप बालक शैक्षिक उपलब्धियों के दृष्टिकोण से सामान्य बालकों से पिछड़ जाते हैं।
  • सीखने की गति बहुत धीमी होती है, जिससे वे कक्षा की गति के साथ नहीं चल पाते।
  • बार-बार असफल होने से उनमें आत्मविश्वास की कमी हो जाती है।
  • कुछ शिक्षक ऐसे बच्चों के प्रति उपेक्षा या उदासीनता का व्यवहार करते हैं।
  • अनुशासनहीनता, प्रेरणा की कमी, असहयोगी वातावरण, भीड़भरी कक्षाएँ, शैक्षिक साधनों की कमी, और व्यक्तिगत ध्यान का अभाव पिछड़ेपन को और बढ़ा देते हैं।
  • ऐसी परिस्थितियों में बालक विद्यालयी वातावरण में समायोजित नहीं हो पाते और धीरे-धीरे पढ़ाई में अरुचि विकसित कर लेते हैं।
संवेगात्मक समस्याएं :-
पिछड़े हुए बालकों में कई प्रकार की दुर्बलताओं के कारण हीन भावना का आरंभ हो जाता है। शिक्षा के क्षेत्र में और सामाजिक संबंधों में प्रभावहीन या असफल होने से उनके जीवन में निराशा का भाव होना आरंभ हो जाता है। उनमें संवेगात्मक अस्थिरता आरंभ हो जाती है। इस कारण उन्हें अपमान भी सहना पड़ता है। इस स्थिति के जारी रहने से उनका संवेगात्मक संतुलन बिगड़ जाता है। जिसके परिणाम स्वरूप और कई तरह की समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं उनका मन किसी भी कार्य में नहीं लगता है। ऐसे वातावरण में बालक अन्य बालकों की दृष्टि में गिर जाता है। उचित स्नेह प्यार और सुरक्षा भी नहीं मिल पाती है।
  • निरंतर असफलता के कारण उनमें हीन भावना (Inferiority Complex) विकसित हो जाती है।
  • दूसरों से तुलना होने पर आत्मसम्मान घटता है और निराशा घर कर लेती है।
  • अपमान, उपेक्षा या अस्वीकार्यता की भावना से वे भावनात्मक रूप से अस्थिर हो जाते हैं।
  • इस अस्थिरता के कारण उनका ध्यान अध्ययन से हट जाता है और वे आक्रामक या उदास हो सकते हैं।
सामाजिक समस्याएं :-
पिछड़े बालकों के सामाजिक समायोजन की समस्याएं अन्य समस्याओं के कारण बढ़ जाती हैं। वह स्वयं को समाज के अनुसार नहीं बदल सकते हैं। समाज से अलग हो जाते हैं। उनके सामाजिक संपर्कों की संख्या भी सीमित रह जाती है। असुरक्षा की भावना के कारण से कई बार तो असामाजिक तत्वों से मिलकर समाज विरोधी व्यवहार का प्रदर्शन करते हैं। अपराध प्रवृति के लोगों की पृष्ठभूमि में उनका पिछड़ापन भी एक महत्वपूर्ण तत्व होता है। पिछड़े बालकों की सामाजिक समस्याओं का सामना करना भी अध्यापक के लिए एक चुनौती हो जाता है। लेकिन सामाजिक विकास के लिए पिछड़े बालकों की स्थापना भी अति आवश्यक है।
  • ऐसे बच्चे अपने साथियों से अलग-थलग पड़ जाते हैं।
  • समाज में घुलने-मिलने में कठिनाई होती है क्योंकि वे स्वयं को दूसरों से कम समझते हैं।
  • असुरक्षा की भावना और अस्वीकृति का डर उन्हें सामाजिक रूप से पीछे धकेल देता है।
  • कई बार वे असामाजिक तत्वों के संपर्क में आकर अनुशासनहीन या अपराध प्रवृत्तियाँ विकसित कर लेते हैं।

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