Meaning, Definition and Characteristics of Mentally Retarded Children
मंदित बालकों का अर्थ :-
“मंदिता” या “मानसिक मंदता” एक अवस्था (condition) है, न कि कोई रोग या बीमारी।यह एक ऐसी स्थिति होती है जिसमें बच्चे की बौद्धिक (Intellectual) एवं अनुकूलन (Adaptive) क्षमताएँ सामान्य बच्चों की तुलना में धीमी गति से विकसित होती हैं।
अर्थात् मंदित बालक वे होते हैं जिनकी सोचने, समझने, सीखने, और निर्णय लेने की क्षमता सीमित होती है।
वे साधारण कार्यों को समझने, भाषा सीखने, सामाजिक व्यवहार अपनाने, या शैक्षणिक कार्यों को पूरा करने में दूसरों की अपेक्षा अधिक समय लेते हैं।
अमेरिकन एसोसिएशन ऑन इंटेलेक्चुअल एंड डेवलपमेंटल डिसएबिलिटी (A.A.I.D.D.) के अनुसार परिभाषा :-
“मानसिक मंदता एक ऐसी स्थिति है जो व्यक्ति के विकास काल के दौरान प्रकट होती है,जिसमें बौद्धिक क्षमता सामान्य से कम होती है, और साथ ही व्यक्ति के अनुकूलन व्यवहार में भी कमी पाई जाती है।”
इस परिभाषा के अनुसार, मानसिक मंदता तीन प्रमुख क्षेत्रों से संबंधित होती है -
- बौद्धिक क्षमता में कमी (Low intellectual ability)
- सीखने और अनुभव प्राप्त करने की धीमी गति (Slow learning and understanding)
- सामाजिक समायोजन की कमी (Poor social adjustment)
“जिन बच्चों की बुद्धिलब्धि (I.Q.) 70 से कम होती है, उन्हें मानसिक मंद बालक कहा जाता है।”
स्किनर (Skinner) के अनुसार :-
“जो छात्र निर्धारित शैक्षणिक कार्य को एक निश्चित समयावधि में पूरा नहीं कर पाते, वे मंदित बालक कहलाते हैं।”
पोलाक और पोलाक (Pollack & Pollack) के मतानुसार :-
“मंदित बालक अब केवल ‘क्षीण बुद्धि’ वाले नहीं माने जाते। वे भी सामान्य बालकों की तरह विभिन्न क्षमताओं, भावनाओं और व्यक्तित्व गुणों से संपन्न होते हैं। आवश्यकता केवल उचित प्रशिक्षण और मार्गदर्शन की होती है।”
क्रम प्रकार बुद्धि लब्धि (I.Q.) विशेषताएँ
“मंदित बालक अब केवल ‘क्षीण बुद्धि’ वाले नहीं माने जाते। वे भी सामान्य बालकों की तरह विभिन्न क्षमताओं, भावनाओं और व्यक्तित्व गुणों से संपन्न होते हैं। आवश्यकता केवल उचित प्रशिक्षण और मार्गदर्शन की होती है।”
मंदित बालकों के प्रकार (Types of Mentally Retarded Children)
मानसिक मंदता की तीव्रता के आधार पर बालकों को चार श्रेणियों में बाँटा गया है -क्रम प्रकार बुद्धि लब्धि (I.Q.) विशेषताएँ
1- हल्की मंदता 50–70 सामान्य विद्यालय में थोड़े सहयोग से शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं।
2- मध्यम मंदता 35–50 विशेष विद्यालय में व्यावहारिक प्रशिक्षण से आत्मनिर्भर बन सकते हैं।
3- गम्भीर मंदता 20–35 बुनियादी आत्म-सेवा गतिविधियों के लिए प्रशिक्षण आवश्यक होता है।
4- अत्यंत गम्भीर मंदता 20 से कम पूर्ण देखभाल और चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता होती है।
बल्कि उन्हें जीवनोपयोगी कौशल (Life Skills) और आत्मनिर्भरता (Self-dependence) सिखाना है।
2- मध्यम मंदता 35–50 विशेष विद्यालय में व्यावहारिक प्रशिक्षण से आत्मनिर्भर बन सकते हैं।
3- गम्भीर मंदता 20–35 बुनियादी आत्म-सेवा गतिविधियों के लिए प्रशिक्षण आवश्यक होता है।
4- अत्यंत गम्भीर मंदता 20 से कम पूर्ण देखभाल और चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता होती है।
मंदित बालकों की प्रमुख विशेषताएँ (Characteristics of Mentally Retarded Children)
- सीखने की गति सामान्य से धीमी होती है।
- ध्यान और स्मरण शक्ति कम होती है।
- विचारों में एकरूपता और तार्किकता का अभाव होता है।
- भाषा विकास में विलंब होता है।
- स्वावलंबन की भावना कम होती है।
- सामाजिक व्यवहार में झिझक या असहजता होती है।
- परिपक्वता (Maturity) सामान्य बालकों की तुलना में देर से आती है।
- भावनात्मक असंतुलन अधिक देखा जाता है।
- कार्य में निरंतरता और स्थिरता की कमी होती है।
- दूसरों के सहयोग और मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।
मंदित बालकों के लिए शिक्षण व्यवस्था (Educational Provisions for Mentally Retarded Children)
मंदित बालकों की शिक्षा का उद्देश्य केवल शैक्षणिक ज्ञान देना नहीं,बल्कि उन्हें जीवनोपयोगी कौशल (Life Skills) और आत्मनिर्भरता (Self-dependence) सिखाना है।
1. विशेष विद्यालयों की व्यवस्था (Special Schools) :-
जहाँ प्रशिक्षित शिक्षक, मनोवैज्ञानिक और चिकित्सक बच्चों को उनकी क्षमतानुसार शिक्षण प्रदान करते हैं।
जहाँ प्रशिक्षित शिक्षक, मनोवैज्ञानिक और चिकित्सक बच्चों को उनकी क्षमतानुसार शिक्षण प्रदान करते हैं।
2. समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) :-
हल्की मंदता वाले बालकों को सामान्य विद्यालय में अन्य छात्रों के साथ शामिल किया जा सकता है।
हल्की मंदता वाले बालकों को सामान्य विद्यालय में अन्य छात्रों के साथ शामिल किया जा सकता है।
3. व्यावसायिक प्रशिक्षण (Vocational Training) :-
ऐसे बालकों को सिलाई, बढ़ईगीरी, बागवानी, हस्तशिल्प आदि में प्रशिक्षित किया जा सकता है,
जिससे वे आत्मनिर्भर बनें।
ऐसे बालकों को सिलाई, बढ़ईगीरी, बागवानी, हस्तशिल्प आदि में प्रशिक्षित किया जा सकता है,
जिससे वे आत्मनिर्भर बनें।
4. व्यक्तिगत शिक्षण पद्धति (Individualized Instruction) :-
प्रत्येक बालक की क्षमता और रुचि के अनुसार शिक्षण योजना बनाई जानी चाहिए।
प्रत्येक बालक की क्षमता और रुचि के अनुसार शिक्षण योजना बनाई जानी चाहिए।
5. सकारात्मक प्रोत्साहन (Positive Reinforcement) :-
शिक्षक को बालक की छोटी-छोटी उपलब्धियों पर भी प्रशंसा करनी चाहिए,
ताकि उनमें आत्मविश्वास बढ़े।
यदि उन्हें उचित अवसर, सहयोग, और विशेष प्रशिक्षण दिया जाए,
तो वे भी समाज के उपयोगी सदस्य बन सकते हैं।
उनकी सीमाएँ उनकी स्थायी दुर्बलता नहीं, बल्कि एक चुनौती हैं जिन्हें शिक्षा और प्रेम से बदला जा सकता है।
मंदित बालकों के कारण, लक्षण तथा शिक्षा के उपाय
शिक्षक को बालक की छोटी-छोटी उपलब्धियों पर भी प्रशंसा करनी चाहिए,
ताकि उनमें आत्मविश्वास बढ़े।
मंदित बालकों के प्रति समाज और शिक्षक की भूमिका (Role of Society and Teacher)
- समाज को इन बालकों के प्रति सहानुभूति और सहयोग का दृष्टिकोण रखना चाहिए।
- शिक्षक को धैर्यपूर्वक, सरल भाषा में और बार-बार दोहराकर पढ़ाना चाहिए।
- परिवार को बालक की प्रगति में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
- विद्यालयों में विशेष परामर्श केंद्र (Counselling Units) स्थापित होने चाहिए।
- शिक्षकों को विशेष शिक्षा (Special Education) में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
यदि उन्हें उचित अवसर, सहयोग, और विशेष प्रशिक्षण दिया जाए,
तो वे भी समाज के उपयोगी सदस्य बन सकते हैं।
उनकी सीमाएँ उनकी स्थायी दुर्बलता नहीं, बल्कि एक चुनौती हैं जिन्हें शिक्षा और प्रेम से बदला जा सकता है।
मंदित बालकों के कारण, लक्षण तथा शिक्षा के उपाय
(Causes, Symptoms and Educational Methods for Mentally Retarded Children)
मंदिता के कारण (Causes of Mental Retardation) :-
मंदिता एक जटिल मनोवैज्ञानिक व जैविक स्थिति है। इसके कारण विविध होते हैं जिन्हें मुख्यतः 3 वर्गों में बाँटा गया है -
(A) जन्म से पूर्व के कारण (Prenatal Causes) :-
ये वे कारण हैं जो गर्भावस्था के दौरान भ्रूण को प्रभावित करते हैं -
मंदिता एक जटिल मनोवैज्ञानिक व जैविक स्थिति है। इसके कारण विविध होते हैं जिन्हें मुख्यतः 3 वर्गों में बाँटा गया है -
(A) जन्म से पूर्व के कारण (Prenatal Causes) :-
ये वे कारण हैं जो गर्भावस्था के दौरान भ्रूण को प्रभावित करते हैं -
- माता का कुपोषण या रक्ताल्पता।
- गर्भावस्था में संक्रमण (जैसे – रुबेला, टॉक्सोप्लाज्मोसिस, सिफलिस)।
- माता द्वारा नशीली वस्तुओं, शराब या दवाइयों का सेवन।
- माता-पिता के रक्त समूह में असंगति (RH Factor)।
- अत्यधिक मानसिक तनाव या भय।
- आनुवंशिक दोष या गुणसूत्र असामान्यता (जैसे – डाउन सिंड्रोम)।
(B) जन्म के समय के कारण (Perinatal Causes) :-
मंदित बालकों के लक्षण बौद्धिक, सामाजिक, भावनात्मक और शारीरिक स्तर पर दिखाई देते हैं।
- जन्म के समय ऑक्सीजन की कमी (Asphyxia)।
- प्रसव के दौरान मस्तिष्क में चोट या रक्तस्राव।
- समय से पहले जन्म (Premature Birth)।
- अत्यधिक या बहुत कम वजन वाला नवजात।
- मस्तिष्क में संक्रमण या चोट (जैसे – मेनिनजाइटिस, इंसेफेलाइटिस)।
- सिर पर चोट लगना।
- पोषण की कमी से मस्तिष्क विकास में रुकावट।
- लंबे समय तक बुखार या मिर्गी का दौरा।
- सामाजिक उपेक्षा, भावनात्मक असंतुलन या अत्याचार।
मंदित बालकों के लक्षण बौद्धिक, सामाजिक, भावनात्मक और शारीरिक स्तर पर दिखाई देते हैं।
(A) बौद्धिक लक्षण (Intellectual Symptoms) :-
- समझने और सीखने की गति धीमी होती है।
- समस्याओं को हल करने की क्षमता सीमित होती है।
- ध्यान और स्मरण शक्ति कम होती है।
- तार्किक सोच और निर्णय लेने की क्षमता का अभाव होता है।
- बोलने और सुनने में कठिनाई।
- शब्दावली सीमित और वाक्य अधूरे होते हैं।
- विचारों को भाषा में व्यक्त करने में झिझक।
- दूसरों के साथ मिलजुलकर कार्य करने में कठिनाई।
- आत्मविश्वास की कमी और भय की भावना।
- दूसरों पर अधिक निर्भर रहना।
- त्वरित क्रोध, चिड़चिड़ापन या भावनात्मक अस्थिरता।
- शरीर का विकास सामान्य से धीमा।
- मांसपेशियों का नियंत्रण कमजोर।
- चाल, मुद्रा और हाव-भाव में असामान्यता।
मंदित बालकों की शिक्षा सामान्य बच्चों की तरह नहीं दी जा सकती।
उनके लिए विशेष शिक्षण तकनीकें और अनुकूल शिक्षण वातावरण आवश्यक है।
(A) विशेष शिक्षण पद्धति (Special Teaching Methods) :-
- व्यक्तिगत शिक्षण (Individualized Instruction) :- हर बालक की क्षमता, रुचि और गति के अनुसार पढ़ाया जाए।
- दोहराव विधि (Repetition Method) :- बार-बार अभ्यास कराने से सीखने की स्थायित्वता बढ़ती है।
- दृश्य सामग्री का प्रयोग (Use of Visual Aids) :- चित्र, मॉडल, चार्ट, फ्लैश कार्ड, और ऑडियो-विजुअल साधनों का प्रयोग किया जाए।
- सकारात्मक प्रोत्साहन (Positive Reinforcement) :- छोटी उपलब्धियों पर भी प्रशंसा की जाए ताकि आत्मविश्वास बढ़े।
- जीवन कौशल शिक्षा (Life Skill Training) :- स्वयं भोजन करना, कपड़े पहनना, सफाई रखना, और पैसे का उपयोग सिखाया जाए।
- शांत, सुरक्षित और तनाव-मुक्त कक्षा वातावरण।
- छोटे समूहों में शिक्षण की व्यवस्था।
- प्रशिक्षित विशेष शिक्षक (Special Educator) की उपस्थिति।
मध्यम एवं गंभीर मंदता वाले बालकों को व्यावहारिक कार्यों में प्रशिक्षित किया जा सकता है, जैसे –
सिलाई, बढ़ईगीरी, हस्तशिल्प, बागवानी, पेंटिंग, इत्यादि।
(D) समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) :-
हल्की मंदता वाले बालकों को सामान्य विद्यालय में अन्य साथियों के साथ पढ़ाया जा सकता है,
जिससे उनमें आत्म-सम्मान और सामाजिक समायोजन की भावना विकसित होती है।
हल्की मंदता वाले बालकों को सामान्य विद्यालय में अन्य साथियों के साथ पढ़ाया जा सकता है,
जिससे उनमें आत्म-सम्मान और सामाजिक समायोजन की भावना विकसित होती है।
शिक्षक एवं अभिभावकों की भूमिका (Role of Teacher and Parents) :-
मंदित बालकों की विशेषताएँ एवं शिक्षण में आने वाली कठिनाइयाँ
1. मंदित बालकों की विशेषताएँ (Characteristics of Mentally Retarded Children) :-
मंदित बालक सामान्य बालकों की तुलना में बौद्धिक, सामाजिक, भावनात्मक और शारीरिक दृष्टि से भिन्न होते हैं। उनकी विकास गति धीमी होती है, किंतु उनमें भी सीखने और आगे बढ़ने की क्षमता होती है यदि उचित वातावरण एवं मार्गदर्शन प्रदान किया जाए।
नीचे उनकी प्रमुख विशेषताएँ दी गई हैं -
- शिक्षक को धैर्यपूर्वक सरल भाषा में पढ़ाना चाहिए।
- प्रत्येक कार्य को छोटे-छोटे चरणों में सिखाया जाए।
- अभिभावक बालक को प्रेम और सहयोग का वातावरण प्रदान करें।
- शिक्षक, परामर्शदाता (Counsellor) और परिवार के बीच समन्वय आवश्यक है।
- बालक को खेलकूद और रचनात्मक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें।
मंदित बालकों की विशेषताएँ एवं शिक्षण में आने वाली कठिनाइयाँ
(Characteristics and Educational Difficulties of Mentally Retarded Children)
1. मंदित बालकों की विशेषताएँ (Characteristics of Mentally Retarded Children) :-मंदित बालक सामान्य बालकों की तुलना में बौद्धिक, सामाजिक, भावनात्मक और शारीरिक दृष्टि से भिन्न होते हैं। उनकी विकास गति धीमी होती है, किंतु उनमें भी सीखने और आगे बढ़ने की क्षमता होती है यदि उचित वातावरण एवं मार्गदर्शन प्रदान किया जाए।
नीचे उनकी प्रमुख विशेषताएँ दी गई हैं -
(A) बौद्धिक विशेषताएँ (Intellectual Characteristics) :-
- सोचने, तर्क करने और समझने की क्षमता सीमित होती है।
- सीखने की गति धीमी होती है, एक ही बात को बार-बार दोहराना पड़ता है।
- स्मरण शक्ति कमजोर होती है, सीखी हुई बातें जल्दी भूल जाते हैं।
- कल्पनाशक्ति और समस्या समाधान की क्षमता न्यून होती है।
- ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई होती है, एकाग्रता जल्दी भंग हो जाती है।
- शब्दों का सही उच्चारण नहीं कर पाते या बोलने में देर लगाते हैं।
- भाषा की समझ सीमित होती है, जटिल वाक्य नहीं समझ पाते।
- संवाद या वार्तालाप में झिझक महसूस करते हैं।
- विचारों को शब्दों में प्रकट करने में कठिनाई होती है।
- मौखिक निर्देशों को ठीक से समझ नहीं पाते।
(C) भावनात्मक एवं सामाजिक विशेषताएँ (Emotional and Social Characteristics) :-
- सामाजिक संबंध बनाने और बनाए रखने में कठिनाई।
- आत्मविश्वास की कमी तथा हीन भावना।
- चिड़चिड़ापन, गुस्सा या अत्यधिक संवेदनशीलता।
- भावनात्मक रूप से अस्थिर रहते हैं - जल्दी रोना, डरना या गुस्सा करना।
- समूह कार्यों में भाग लेने से बचते हैं या अकेले रहना पसंद करते हैं।
(D) शारीरिक विशेषताएँ (Physical Characteristics) :-
मंदित बालकों के शिक्षण में शिक्षकों को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ये कठिनाइयाँ न केवल बौद्धिक स्तर पर होती हैं, बल्कि भावनात्मक, सामाजिक और व्यवहारिक रूप में भी दिखाई देती हैं।
- शारीरिक वृद्धि सामान्य से धीमी होती है।
- कुछ बालकों में मस्तिष्क, सिर, या शरीर के अनुपात में असमानता होती है।
- चलने, बोलने, खाने जैसे मोटर कार्यों में विलंब होता है।
- हाथ-पैर की गतियों में असंतुलन या कमजोरी।
- जल्दी थक जाते हैं और लंबे समय तक कार्य नहीं कर पाते।
- जटिल अवधारणाओं को समझने में कठिनाई होती है।
- ध्यान भटकने के कारण अध्ययन में निरंतरता नहीं रहती।
- अभ्यास के बिना सीखी हुई बातें भूल जाते हैं।
- पढ़ने-लिखने व गणितीय अवधारणाओं को समझने में कठिनाई।
- उन्हें प्रत्यक्ष अनुभव एवं ठोस वस्तुओं की सहायता से सीखना अधिक लाभदायक होता है।
मंदित बालकों के शिक्षण में शिक्षकों को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ये कठिनाइयाँ न केवल बौद्धिक स्तर पर होती हैं, बल्कि भावनात्मक, सामाजिक और व्यवहारिक रूप में भी दिखाई देती हैं।
(A) बौद्धिक कठिनाइयाँ (Intellectual Difficulties) :-
मंदित बालकों का पुनर्वास, उपचार एवं सामाजिक समायोजन के उपाय
- अवधारणाओं को समझने में अत्यधिक समय लगता है।
- स्मृति कमजोर होने के कारण बार-बार पुनरावृत्ति आवश्यक होती है।
- जटिल व अमूर्त (Abstract) विषय वस्तु को ग्रहण नहीं कर पाते।
- समस्या समाधान की क्षमता सीमित होती है।
- निर्देशों को ठीक से नहीं समझते।
- उच्चारण दोष या वाणी की अस्पष्टता।
- मौखिक प्रश्नों का उत्तर देने में झिझकते हैं।
- लेखन कार्यों में अधिक समय लेते हैं।
- ध्यान एकाग्र नहीं कर पाते और कक्षा में अनुशासनहीनता दिखा सकते हैं।
- कुछ बच्चे अत्यधिक सक्रिय (Hyperactive) या बहुत निष्क्रिय (Passive) रहते हैं।
- भावनाओं पर नियंत्रण न रख पाने के कारण जल्दी उत्तेजित हो जाते हैं।
- असफलता से हतोत्साहित होकर अध्ययन से दूर भागते हैं।
- अपने सहपाठियों के साथ घुलने-मिलने में कठिनाई होती है।
- हीन भावना और उपेक्षा की भावना से ग्रस्त रहते हैं।
- समूह में कार्य करने से डरते हैं।
- समाज में “कमज़ोर” या “असामान्य” कहे जाने से आत्मसम्मान को चोट पहुँचती है।
- अध्ययन की निरंतरता बनाए रखना कठिन होता है।
- गृहकार्य को पूरा करने में अधिक समय लगता है।
- गणितीय कार्यों, वाक्य निर्माण, तथा पढ़ने की गति में कमी।
- अक्सर परिणाम कमजोर आते हैं जिससे आत्मविश्वास घटता है।
- प्रत्येक मंदित बालक को व्यक्तिगत ध्यान (Individual Attention) दिया जाए।
- शिक्षण सामग्री सरल, चित्रात्मक और ठोस उदाहरणों पर आधारित हो।
- सकारात्मक प्रोत्साहन (Positive Motivation) का प्रयोग करें।
- किसी भी कार्य में जल्दबाजी न करें, पर्याप्त समय दिया जाए।
- खेलों, गीतों, और गतिविधियों के माध्यम से सीखने का वातावरण बनाएं।
- सहयोगी शिक्षण (Peer Tutoring) और समूह गतिविधियों को प्रोत्साहित करें।
- शिक्षक, माता-पिता और परामर्शदाता के बीच समन्वय बनाए रखें।
मंदित बालकों का पुनर्वास, उपचार एवं सामाजिक समायोजन के उपाय
(Rehabilitation, Treatment and Social Adjustment of Mentally Retarded Children)
मंदित बालक वे बच्चे होते हैं जिनकी बौद्धिक क्षमता सामान्य बच्चों से कम होती है और जिनका मानसिक विकास धीमी गति से होता है। ऐसे बालक केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विशेष सहयोग और प्रशिक्षण के पात्र होते हैं।
इनके पुनर्वास (Rehabilitation) का अर्थ है - इन्हें इतना सक्षम बनाना कि वे अपने जीवन के मूलभूत कार्य स्वयं कर सकें और समाज में उपयोगी सदस्य बनें।
इनके पुनर्वास (Rehabilitation) का अर्थ है - इन्हें इतना सक्षम बनाना कि वे अपने जीवन के मूलभूत कार्य स्वयं कर सकें और समाज में उपयोगी सदस्य बनें।
पुनर्वास का अर्थ (Meaning of Rehabilitation) :-
‘पुनर्वास’ का अर्थ होता है - किसी व्यक्ति को उसकी सीमाओं के भीतर रहते हुए स्वावलंबी और सामाजिक रूप से सक्षम बनाना।
अर्थात, मंदित बालक को शिक्षा, प्रशिक्षण, रोजगार और सामाजिक सहयोग के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाना ही पुनर्वास कहलाता है।
‘पुनर्वास’ का अर्थ होता है - किसी व्यक्ति को उसकी सीमाओं के भीतर रहते हुए स्वावलंबी और सामाजिक रूप से सक्षम बनाना।
अर्थात, मंदित बालक को शिक्षा, प्रशिक्षण, रोजगार और सामाजिक सहयोग के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाना ही पुनर्वास कहलाता है।
पुनर्वास के प्रमुख प्रकार (Types of Rehabilitation) :-
मंदित बालकों के पुनर्वास को मुख्यतः चार भागों में बाँटा जा सकता है -
मंदित बालकों के पुनर्वास को मुख्यतः चार भागों में बाँटा जा सकता है -
(A) शैक्षणिक पुनर्वास (Educational Rehabilitation) :-
- विशेष विद्यालयों (Special Schools) की स्थापना की जानी चाहिए।
- शिक्षा को उनकी मानसिक क्षमता के अनुसार अनुकूलित किया जाए।
- व्यावहारिक (Functional) और व्यवसायिक (Vocational) शिक्षा पर जोर दिया जाए।
- सरल भाषा, चित्र, मॉडल, एवं खेलों के माध्यम से शिक्षण।
- व्यक्तिगत शिक्षण पद्धति (Individualized Education Plan – IEP) अपनाई जाए।
- मंदित बालकों को उनकी क्षमता के अनुसार रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण दिया जाए।
- जैसे - सिलाई, बढ़ईगिरी, हस्तशिल्प, बागवानी, मिट्टी के खिलौने बनाना, खाद्य प्रसंस्करण आदि।
- ऐसे कार्य जिनमें अधिक बौद्धिक परिश्रम की आवश्यकता न हो, परंतु जो उन्हें आत्मनिर्भर बना सकें।
- वयस्क होने पर उन्हें सुरक्षित रोजगार (Sheltered Employment) दिया जाए।
- मंदित बालकों में कुछ मानसिक या तंत्रिका संबंधी विकार हो सकते हैं जिनका चिकित्सा द्वारा उपचार आवश्यक है।
- न्यूरोलॉजिस्ट, मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक, और ऑक्यूपेशनल थैरेपिस्ट का सहयोग लिया जाना चाहिए।
- उचित दवा, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और चिकित्सा परीक्षण से स्थिति में सुधार लाया जा सकता है।
- बालक के मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने हेतु काउंसलिंग एवं व्यवहार चिकित्सा आवश्यक है।
- समाज में मंदित बालकों को स्वीकार्यता दिलाना सबसे आवश्यक कदम है।
- परिवार और समुदाय को यह समझाना कि ये बच्चे बोझ नहीं, बल्कि सहयोग से सक्षम बन सकते हैं।
- सामाजिक संस्थानों, स्वयंसेवी संगठनों और स्कूलों को मिलकर पुनर्वास कार्य करना चाहिए।
- सामाजिक जागरूकता अभियान, माता-पिता परामर्श कार्यक्रम और समूह गतिविधियाँ आयोजित की जानी चाहिए।
- सामान्य बच्चों के साथ एकीकृत शिक्षा (Inclusive Education) का वातावरण बनाना चाहिए।
(A) मनोवैज्ञानिक उपचार (Psychological Treatment) :-
- बालक को आत्मविश्वास देने के लिए निरंतर प्रोत्साहन देना।
- व्यवहार सुधार के लिए Behavior Therapy और Reward System का प्रयोग।
- नकारात्मक व्यवहारों को धीरे-धीरे सकारात्मक आदतों से बदलना।
- आत्मनिर्भरता और निर्णय लेने की क्षमता का विकास।
- माता-पिता को यह समझना चाहिए कि मंदिता कोई अपराध या दंड नहीं है।
- उन्हें बच्चे के प्रति प्रेम, धैर्य और स्नेह का व्यवहार रखना चाहिए।
- घर पर अभ्यास कराना, दैनिक कार्यों में शामिल करना, और समाज से जोड़ना।
- शिक्षक, चिकित्सक और परिवार के बीच समन्वय बनाना आवश्यक है।
- समाज में ऐसे बच्चों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण को बदलना होगा।
- सामान्य बालकों के साथ समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) देना।
- विद्यालयों में विशेष शिक्षक एवं सहायक उपलब्ध कराना।
- उन्हें सामाजिक गतिविधियों, खेल-कूद, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए प्रेरित करना।
- आत्मनिर्भर जीवन जीने हेतु जीवन कौशल (Life Skills) सिखाना।
- राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (NMHP) के अंतर्गत पुनर्वास योजनाओं का संचालन।
- नैशनल इंस्टीट्यूट फॉर मेंटली हैंडीकैप्ड (NIMH) जैसी संस्थाओं द्वारा प्रशिक्षण एवं अनुसंधान कार्य।
- राज्य एवं केंद्र सरकार द्वारा विशेष विद्यालयों और पुनर्वास केंद्रों को आर्थिक सहायता।
- NGOs द्वारा जागरूकता, प्रशिक्षण एवं रोजगार के अवसर प्रदान करना।
- समाज के सभी वर्गों का सहयोग - शिक्षक, अभिभावक, चिकित्सक, स्वयंसेवी संस्थाएँ और प्रशासन।
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