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मंद अधिगामी बालकों का अर्थ एवं परिभाषा

मंद अधिगामी बालकों का अर्थ 

मंद अधिगामी अपनी जनसंख्या का एक महत्वपूर्ण अंश होता है। सिरिल बर्ट ने मन्द अधिगामी को पिछड़े की संज्ञा दी है। क्योंकि इस प्रकार के बालक अपनी आयु के सामान्य बालकों के साथ शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाते हैं।

1. क्रिक ने 1962 में सीखने की गति के आधार पर पहचान की थी। इनके अनुसार प्रतिभाशाली और सामान्य बालकों की पहचान भी सीखने की गति के आधार पर की जाती है। इन्होंने शैक्षिक सफलता और शैक्षिक निष्पत्ति को भी आधार माना है और कहा है कि यदि सामान्य बालक की शैक्षिक उपलब्धि अपने आयु वर्ग से कम है तब उसे भी मंद अधिगामी माना जाता है। इसके अतिरिक्त यदि बालक का विकास समायोजन आत्मनिर्भरता अपनी आयु वर्ग के बालकों के समान नहीं अर्थात कम है तब उन्हें भी मन्द अधिगामी कहा जा सकता है। यदि बालक सामान्य कक्षा को अनुकूलित नहीं कर पाता है इसलिए इन्हें मंद अधिगामी इस कहते हैं।

2. मंद अधिगामी बालकों के वर्ग में यदि समूह के बालकों को सम्मिलित किया जाता है तो इन्हें मंदित या शैक्षिक रूप से सामान्य स्तर से निम्न स्तर या पिछड़ा भी कहा जाता है। इसे अधिक व्यापक रूप में प्रयुक्त किया जाने लगा है। उन बालकों को इस वर्ग में रखा जाता है जिनके सीखने की गति धीमी हो और योग्यता भी सीमित हो। इस प्रकार के सभी बालकों में शैक्षिक मंदिता होती है। इसके अनेक कारण होते हैं, जैसे सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक तथा माता-पिता में समायोजन ना होना आदि। मानसिक स्तर के अतिरिक्त वातावरण में भी इन्हें मंद अधिगामी बना देता है। मानसिक स्तर ऊंचा होने पर भी पारिवारिक घटक उसे प्रभावित करते हैं।

3. आरंभ में मनोवैज्ञानिक भी मंद अधिगामी होने का कारण मानसिक योग्यता ही मानते थे परंतु शोध अध्ययनों से पाया कि सामाजिक और पारिवारिक घटक भी इसके लिए उत्तरदाई होते हैं। इस प्रकार वंशानुक्रम तथा वातावरण दोनों ही प्रकार के घटक मन अधिगामी होने के लिए उत्तरदाई हैं। व्यवहारवादी कहते हैं कि वंशानुक्रम से वातावरण के घटक अधिक होते हैं। पिछड़े बालक ही मंद अधिगामी होते हैं। यह बालक अपनी आयु वर्ग की कक्षा के बालकों के साथ नहीं पढ़ सकते हैं तथा विद्यालय का कार्य भी बुद्धि लब्धि के आधार पर नहीं कर सकते हैं। यह मानसिक मंदता होती है। सामान्यत इन बालकों के सीखने की गति धीमी होती है तब उसे मंद अधिगामी कहा जाता है।

4. मंद अधिगामी बालकों का विकास विशिष्ट शिक्षा के संदर्भ में ही नहीं किया गया है। क्योंकि बालकों को विशिष्ट शिक्षा की आवश्यकता नहीं होती है बल्कि इन्हें अतिरिक्त सहायता सेवाओं की आवश्यकता होती है। यदि इन्हें अभिक्रमित अनुदेशन की पुस्तकें उपलब्ध कराई जाएं तब यह अपने आयु वर्ग के साथ चल सकते हैं। इन्हें शिक्षा की मुख्यधारा में रखा जाए विशिष्ट कक्षा की आवश्यकता नहीं है। इन बालकों की पहचान है तो किसी प्रमाणित परीक्षण का निर्माण नहीं हुआ है जिससे इनका निदान करके वर्गीकरण किया जाए। इनकी पहचान शैक्षिक कमजोरियों के आधार पर ही की जाती है।

गत कुछ वर्षों से शिक्षा के क्षेत्र में मंद अधीगामी बालकों के अध्ययन के प्रति रुचि बढ़ी है। इससे पूर्व इन्हें पिछड़े बालकों के वर्ग में रखा जाता रहा है। 30 वर्ग के बालको को विशिष्ट शिक्षा के क्षेत्र में सम्मिलित नहीं किया जाता है। पिछड़े बालकों हेतु विशिष्ट विद्यालय तथा कक्षा की आवश्यकता होती है जबकि मंद अधिगम में शब्द की व्याख्या गिलफोर्ड तथा टेंसिले 1971 ने अधिक व्यापक रूप से की है।

मंद अधिगामी बालकों की परिभाषाएं

क्रिक (Crick, 1962) :-
“वे बालक जो अपने आयु वर्ग के सामान्य बालकों की तुलना में सीखने में धीमे होते हैं और जिनकी शैक्षिक प्रगति अपेक्षाकृत कम होती है, मंद अधिगामी कहलाते हैं।”

गिलफोर्ड और टेंसली (Guilford & Tansley, 1971) :-
“मंद अधिगामी वे बालक हैं जो सामान्य शिक्षा प्रणाली में सफलता प्राप्त करने के लिए अतिरिक्त शिक्षण सहायता की आवश्यकता रखते हैं, परंतु उन्हें विशेष विद्यालयों की आवश्यकता नहीं होती।”

डॉ. प्रेम पसरीचा :-
“मंद अधिगामी बालक वे होते हैं जिनकी बुद्धि सामान्य सीमा के भीतर होती है, किंतु वे सीखने की प्रक्रिया में धीमे होते हैं और उन्हें अधिक अभ्यास व व्यक्तिगत ध्यान की आवश्यकता होती है।”

सिरिल बर्ट (Cyril Burt) :-
“ऐसे बालक जो अपनी शिक्षा में निरंतर पीछे रह जाते हैं और अपनी आयु के अनुरूप प्रगति नहीं कर पाते, मंद अधिगामी माने जाते हैं।”

मंद अधिगामिता के कारण (Causes of Slow Learning)

मंद अधिगामिता एक एकल कारण से नहीं होती, बल्कि यह आंतरिक (Internal) और बाह्य (External) दोनों प्रकार के कारणों का परिणाम होती है।
1. जैविक एवं शारीरिक कारण (Biological & Physical Causes) :-
  • जन्म के समय ऑक्सीजन की कमी या प्रसवकालीन कठिनाइयाँ
  • मस्तिष्क की हल्की क्षति या न्यूरोलॉजिकल असंतुलन
  • शारीरिक दुर्बलता या दीर्घकालिक बीमारी
  • दृष्टि या श्रवण दोष
  • अपर्याप्त पोषण या कुपोषण
2. मानसिक कारण (Psychological Causes) :-
  • आत्मविश्वास की कमी
  • चिंता, भय या तनाव की स्थिति
  • असफलताओं का बार-बार अनुभव
  • प्रेरणा की कमी और आत्म-संदेह
3. पारिवारिक एवं सामाजिक कारण (Family and Social Causes) :-
  • परिवार में अस्थिरता या कलहपूर्ण वातावरण
  • माता-पिता की शिक्षा का अभाव
  • आर्थिक कठिनाइयाँ
  • उपेक्षा या अति लाड़-प्यार दोनों स्थितियाँ
4. विद्यालयी कारण (School-Related Causes) :-
  • शिक्षण विधि में विविधता का अभाव
  • भीड़भाड़ वाली कक्षा
  • शिक्षक का कठोर या उदासीन व्यवहार
  • अनुपयुक्त शिक्षण सामग्री
  • मूल्यांकन प्रणाली का दबाव

मंद अधिगामी बालकों की विशेषताएं
Characteristics of slow learner

पिछड़े बालकों की स्मृति कम होती है। बर्ट 1945 का कहना है कि मानसिक मंदित अथवा मानसिक असमर्थता सभी प्रकार की शैक्षिक पद्धति का विरोध करती है। मानसिक मंदता में स्मृति योग्यता की कमजोरी होती है जो शैक्षिक उपलब्धियों को प्रभावित करती है। सीखने की गति भी मंद होती है। जल्दी भूल जाते हैं। धीमी गति में धारण करने की शक्ति भी कम होती है। इसलिए पुनरावृत्ति के अभ्यास से इसमें सुधार किया जा सकता है। अधिगम की आरंभिक अवस्था से अधिगम की गुणवत्ता की आवश्यकता होती है। मंद अधिगम बालकों की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार से हैं

1. मंद अधिगम बालकों की ज्ञानात्मक क्षमता सीमित होती है। यह अधिगम परिस्थितियों में समायोजन नहीं कर पाते है साधारणतः असफल रहते हैं। इसमें सामान्य चिंतन की क्षमता नहीं होती है। यह बालक पाठ्यवस्तु को रट लेते हैं। उन तथ्यों को सरलता से सीख लेते हैं जिनमें संबंध स्पष्ट होता है। धारण करने के लिए अधिक अभ्यास की आवश्यकता होती है।

2. मंद अधिगम बालकों की मुख्य विशेषता यह है कि स्मृति शक्ति कम होती है। इसका कारण यह है कि अधिगम प्रक्रिया एकाग्र नहीं कर पाते हैं। इन बालकों को सीखने के लिए आंतरिक तथा बाह्य अभिप्रेरणा की आवश्यकता होती है। यह अपने स्थानीय खिलाड़ियों के नाम याद कर लेते हैं तथा स्थानीय घटनाओं को भी याद रखते हैं।

3. सामान्य कक्षा शिक्षण परिस्थिति में मंद अधिगम एकाग्र नहीं कर पाते हैं। इनका विशिष्ट व्यवहार अभिप्रेरणा के अभाव के कारण होता है। यदि शिक्षण पाठ्यक्रम को सहयोग सामग्री की सहायता से मूर्त रूप में प्रस्तुतीकरण किया जाए तब या बालक अपने को एकाग्र कर लेते हैं और स्मरण भी कर लेते हैं तथा धारण भी करते हैं। शिक्षण की इस प्रक्रिया की परिस्थिति में सामान्य बालकों से समान व्यवहार करते हैं।

4. मंद अधिगम बालक अपने विचार की अभिव्यक्ति करने में भाषा की कठिनाई का अनुभव करते हैं। इनमें कल्पना शक्ति भी कम होती है। दूरदर्शिता भी नहीं होती है। यह बालक भविष्य के बारे में चिंता नहीं करते हैं। इन्हें भविष्य का बोध नहीं होता है।

5. मंद अधिगम बालकों की सामाजिक, सांस्कृतिक तथा शैक्षिक समस्याएं होती हैं। इन बालकों की शैक्षिक उपलब्धि संतोषजनक नहीं होती है। जो बालक अच्छे परिवारों से आते हैं उनका व्यवहार तथा उपलब्धि भी अच्छी होती है क्योंकि उन्हें घर में समुचित अभिप्रेरणा तथा प्रोत्साहन मिलता है। प्राथमिक शिक्षा स्तर को इनकी विशेष आवश्यकता होती है जिससे अध्ययन के प्रति उनकी रुचि उत्पन्न हो सके। इन्हें हाथों से सहन करने से समाज विरोधी अभिवृत्ति हो जाती है।

मंद अधिगामी बालकों की प्रमुख विशेषताएँ (Characteristics of Slow Learners)

मंद अधिगामी बालकों की कुछ सामान्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं -
1. बौद्धिक विशेषताएँ (Intellectual Characteristics) :-
  • बौद्धिक स्तर औसत से थोड़ा कम (IQ प्रायः 70 से 90 के बीच)।
  • अमूर्त विचारों को समझने में कठिनाई।
  • तार्किक विश्लेषण, गणना या अवधारणात्मक कार्यों में समस्या।
  • सीखने की प्रक्रिया में पुनरावृत्ति की आवश्यकता।
2. शैक्षणिक विशेषताएँ (Academic Characteristics) :-
  • सीखने की गति धीमी होती है।
  • होमवर्क या लेखन कार्य पूरा करने में अधिक समय लेते हैं।
  • याददाश्त कमजोर होती है और शीघ्र भूल जाते हैं।
  • ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई अनुभव करते हैं।
  • मौखिक एवं लिखित अभिव्यक्ति सीमित होती है।
3. सामाजिक विशेषताएँ (Social Characteristics) :-
  • समूह में पीछे रह जाने के कारण झिझक या संकोच।
  • आत्मविश्वास की कमी और सामाजिक अलगाव की प्रवृत्ति।
  • दूसरों के द्वारा उपेक्षित महसूस करना।
  • सामाजिक नियमों की समझ सीमित।
4. संवेगात्मक विशेषताएँ (Emotional Characteristics) :-
  • अत्यधिक संवेदनशील या जल्द निराश होने वाले।
  • असफलता से भय और आत्मग्लानि की भावना।
  • कभी-कभी आक्रामकता या विद्रोही व्यवहार।
5. शारीरिक विशेषताएँ (Physical Characteristics) :-
  • सामान्यतः स्वस्थ, परंतु थकान जल्दी होना।
  • ऊर्जा का स्तर कम या अनियमित।
  • मोटर समन्वय (Motor Coordination) में थोड़ी कमजोरी।

मंद अधिगामी बालकों के लिए शैक्षिक व्यवस्थाएँ (Educational Provisions for Slow Learners)

शिक्षा मनोवैज्ञानिकों का मत है कि मंद अधिगामी बालक सामान्य विद्यालयों में रहकर भी प्रगति कर सकते हैं, यदि उन्हें उपयुक्त शिक्षण सहायता और वातावरण मिले।
1. व्यक्तिगत अनुदेशन (Individualized Instruction) :-
  • प्रत्येक बालक की गति और क्षमता को ध्यान में रखकर पाठ्यक्रम की योजना बनाना।
  • एक-एक विद्यार्थी को व्यक्तिगत रूप से समझाना, मार्गदर्शन देना।
2. पुनरावृत्ति और अभ्यास (Repetition and Practice) :-
  • पाठों को बार-बार दोहराने से सीखने की स्थायित्व बढ़ता है।
  • अभ्यास आधारित क्रियाओं (Drill Method) से ज्ञान सुदृढ़ किया जा सकता है।
3. दृश्य और क्रियात्मक शिक्षण (Activity & Visual Method) :-
  • चित्र, चार्ट, मॉडल, प्रयोग, कहानियाँ आदि से शिक्षण को रोचक बनाना।
  • "सीखने के लिए करके दिखाओ" (Learning by Doing) सिद्धांत का प्रयोग।
4. प्रेरणा और प्रोत्साहन (Motivation & Encouragement) :-
  • छोटे-छोटे कार्यों में सफलता दिलाकर आत्मविश्वास बढ़ाना।
  • प्रशंसा, पुरस्कार और सकारात्मक प्रतिपुष्टि देना।
5. अभिभावक-शिक्षक सहयोग (Home–School Cooperation) :-
  • शिक्षक और अभिभावक मिलकर बालक की प्रगति पर निगरानी रखें।
  • घर का वातावरण अध्ययन के अनुकूल बनाया जाए।
6. उपयुक्त मूल्यांकन प्रणाली (Appropriate Evaluation System) :-
  • कठोर परीक्षा प्रणाली से बचना।
  • निरंतर एवं समग्र मूल्यांकन (CCE) अपनाना।

मंद अधिगामी बालकों के लिए शिक्षक की भूमिका (Role of Teacher)

  • धैर्यपूर्वक और सहानुभूति के साथ व्यवहार करना।
  • पाठ्य सामग्री को सरल और क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करना।
  • कठिन विषयों को छोटे भागों में बाँटना।
  • विद्यार्थियों के प्रश्नों को ध्यान से सुनना और सकारात्मक उत्तर देना।
  • समूह गतिविधियों में सम्मिलित करना, ताकि सामाजिक आत्मविश्वास बढ़े।
  • प्रत्येक छोटी सफलता पर प्रशंसा करना।
मंद अधिगामी बालक शिक्षा प्रणाली का एक संवेदनशील वर्ग हैं।
इनकी सीखने की गति धीमी अवश्य होती है, परंतु यदि इन्हें उचित अवसर, सहानुभूति और सहयोग मिले तो ये भी उच्च उपलब्धि प्राप्त कर सकते हैं।
ऐसे बालकों को "कम सक्षम नहीं, बल्कि भिन्न गति से सीखने वाले विद्यार्थी" के रूप में देखना चाहिए।
शिक्षक का कर्तव्य है कि वह इन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़े रखे, ताकि प्रत्येक बालक “शिक्षा का अधिकार” और “जीवन में आत्मसम्मान” दोनों प्राप्त कर सके।


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