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क्रियान्वयन के प्रारूप, 1992 की मुख्य आकृतियाँ

Programme of Action, 1992 – Salient Features

भारत में शिक्षा के क्षेत्र में समानता और सर्वसुलभता को सुनिश्चित करने के लिए कई नीतियाँ बनाई गईं।
इन्हीं में से एक प्रमुख नीति थी राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986, जिसने शिक्षा को हर वर्ग और हर बच्चे तक पहुँचाने की दिशा में ठोस प्रयास किए।
परंतु नीति को केवल कागज़ पर सीमित न रहने देने के लिए उसके क्रियान्वयन हेतु एक स्पष्ट योजना की आवश्यकता महसूस हुई।

इसी के परिणामस्वरूप वर्ष 1992 में क्रियान्वयन का प्रारूप (Programme of Action – POA 1992) तैयार किया गया।
इस कार्यक्रम ने विशेष रूप से उन बच्चों पर ध्यान केंद्रित किया जो शारीरिक, मानसिक या संवेदनात्मक रूप से किसी न किसी प्रकार की बाधा से ग्रस्त थे।
इस योजना का उद्देश्य था कि ऐसे बालक अलग-थलग न रहकर सामान्य बच्चों के साथ मिलकर शिक्षा प्राप्त करें और जीवन में आत्मनिर्भर बन सकें।
  • 1991-92 में शिक्षा मंत्रालय ने यह अध्ययन किया कि देशभर में दिव्यांग बालकों को शिक्षा से जोड़ने के प्रयास कितने सफल हो रहे हैं।
  • इस सर्वेक्षण में यह पाया गया कि लगभग तीस हजार (30,000) गंभीर रूप से बाधित बालक समन्वित शिक्षा योजना के अंतर्गत पढ़ रहे थे,
  • जबकि साठ हजार (60,000) बच्चे ऐसे थे जो हल्की शारीरिक या मानसिक कठिनाइयों के बावजूद संसाधन सहायता से लाभ उठा रहे थे।
  • इसके साथ ही लगभग 1035 विशेष विद्यालय सक्रिय रूप से दिव्यांग बालकों को शिक्षा प्रदान कर रहे थे।
  • रिपोर्ट में यह तथ्य भी सामने आया कि लगभग नब्बे प्रतिशत दिव्यांग बच्चे सामान्य विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं,
  • जो भारत में समावेशी शिक्षा के विस्तार की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि थी।

मुख्य विशेषताएँ

1. समन्वित शिक्षा का विस्तार :-
  • इस योजना के अंतर्गत केंद्र शासित प्रदेशों और दस राज्यों में दिव्यांग बच्चों के लिए समन्वित शिक्षा कार्यक्रम लागू किया गया।
  • इसका उद्देश्य यह था कि कोई भी बालक केवल अपनी शारीरिक या मानसिक स्थिति के कारण शिक्षा से वंचित न रहे।
  • सामान्य विद्यालयों में दिव्यांग छात्रों को पढ़ाने के लिए विशेष शिक्षकों की सहायता, शिक्षण उपकरण और परामर्श सेवाएँ उपलब्ध कराई गईं।
2. आर्थिक प्रावधान और संसाधन व्यवस्था :-
  • योजना के अंतर्गत एक दिव्यांग बालक पर औसतन ₹2000 प्रति वर्ष व्यय किया जाता था।
  • यह राशि शिक्षण सामग्री, सहायक उपकरण, ब्रेल पुस्तकों, परिवहन सुविधा और शिक्षक प्रशिक्षण पर खर्च होती थी।
  • यह भी देखा गया कि जैसे-जैसे लाभार्थी बालकों की संख्या बढ़ी, वैसे-वैसे प्रति छात्र खर्च में कमी आई और संसाधनों का उपयोग अधिक प्रभावी हुआ।
3. शिक्षक प्रशिक्षण और संसाधन केंद्रों की स्थापना :-
  • दिव्यांग बच्चों को सामान्य विद्यालयों में शिक्षित करने के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की आवश्यकता थी।
  • इसी को ध्यान में रखते हुए विभिन्न जिला शैक्षिक प्रशिक्षण परिषदों (DIETs) और क्षेत्रीय प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना की गई।
  • यह केंद्र शिक्षकों को समावेशी शिक्षण तकनीक, विशेष शिक्षण उपकरणों के उपयोग और विद्यार्थियों के साथ व्यवहारिक सामंजस्य सिखाने में मदद करते थे।
  • साथ ही, गैर-सरकारी संस्थानों को भी इस प्रशिक्षण कार्य में शामिल किया गया ताकि ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों के शिक्षकों तक भी प्रशिक्षण पहुँच सके।
4. एनसीईआरटी और समाज कल्याण मंत्रालय की भूमिका :-
  • राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने इस योजना के अंतर्गत शिक्षकों के लिए विशेष प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार किए।
  • देशभर के 102 जिलों के DIET शिक्षकों ने इस कार्यक्रम से प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त किया।
  • वहीं, समाज कल्याण मंत्रालय ने विशेष प्रशिक्षित अध्यापकों को विशिष्ट विद्यालयों में भेजकर शिक्षण स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयास किया।
  • इन पहलों से शिक्षा व्यवस्था में नई ऊर्जा का संचार हुआ और शिक्षकों में समर्पण तथा आत्मविश्वास बढ़ा।
5. पुनर्वास और व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम :-
  • दिव्यांग बालकों के पुनर्वास के लिए श्रम मंत्रालय ने 17 व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए।
  • इन केंद्रों में शारीरिक या मानसिक रूप से बाधित युवाओं को ऐसी शिक्षा दी जाती थी जिससे वे किसी कार्य या व्यवसाय में दक्ष हो सकें।
  • सितंबर 1991 तक लगभग 66,000 दिव्यांग व्यक्तियों का पुनर्वास किया जा चुका था।
  • इसके अतिरिक्त, शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में 3 प्रतिशत सीटें दिव्यांग प्रशिक्षुओं के लिए आरक्षित की गईं, ताकि वे भी शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दे सकें।
6. योजनाओं का मूल्यांकन और सामने आई चुनौतियाँ :-
हालाँकि इस योजना के माध्यम से कई महत्वपूर्ण सफलताएँ मिलीं, परंतु कुछ सीमाएँ भी सामने आईं -
  • कुछ राज्यों में योजना के प्रति उदासीनता देखी गई, जिसके कारण कार्यान्वयन में असमानता रही।
  • CBR (Community Based Rehabilitation), DRC (District Resource Centre) और ECCE (Early Childhood Care and Education) जैसी योजनाओं का प्रभावी समन्वय नहीं हो पाया।
  • ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में संसाधनों, प्रशिक्षित शिक्षकों और उपकरणों की कमी बनी रही।
  • कुछ विद्यालयों में भौतिक सुविधाएँ (जैसे रैम्प, शौचालय, यातायात सुविधा) अभी भी पर्याप्त नहीं थीं।
इसके बावजूद, कुछ गैर-सरकारी संस्थाएँ सीमित संसाधनों में भी अत्यंत समर्पण से कार्य कर रही थीं, जो इस योजना की सफलता का सकारात्मक पक्ष था।
 
7. सुधार की दिशा में सुझाव :-
POA 1992 की समीक्षा में यह सुझाव दिया गया कि समावेशी शिक्षा को अधिक प्रभावी बनाने के लिए निम्न उपाय आवश्यक हैं -
  • दिव्यांग बच्चों की प्रारंभिक पहचान (Early Identification) की व्यवस्था की जाए।
  • विद्यालयों में भौतिक और शैक्षणिक सुविधाएँ सुलभ बनाई जाएँ।
  • शिक्षकों के लिए नियमित समावेशी शिक्षा प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ।
  • राज्यों में निगरानी तंत्र (Monitoring Mechanism) मजबूत किया जाए।
  • समाज में जागरूकता बढ़ाई जाए ताकि दिव्यांग बच्चों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित हो सके।

समाज में दृष्टिकोण में परिवर्तन

इस योजना के बाद समाज में यह सोच विकसित हुई कि दिव्यांगता कोई दुर्बलता नहीं, बल्कि एक विशेष परिस्थिति है जिसे शिक्षा और सहयोग से सशक्त बनाया जा सकता है।
शिक्षकों और अभिभावकों दोनों के दृष्टिकोण में बदलाव आने लगा - अब दिव्यांग बालकों को “दया के पात्र” नहीं, बल्कि “समान अवसरों के अधिकारी” के रूप में देखा जाने लगा।
  • क्रियान्वयन का प्रारूप, 1992 भारत की शिक्षा नीति के इतिहास में एक मील का पत्थर है।
  • इसने यह सिद्ध कर दिया कि यदि उचित नीति, संसाधन और प्रशिक्षण उपलब्ध हों तो प्रत्येक बालक शिक्षा प्राप्त कर सकता है, चाहे उसकी शारीरिक या मानसिक स्थिति कुछ भी क्यों न हो।
  • इस कार्यक्रम ने “विशिष्ट शिक्षा” से आगे बढ़कर “समावेशी शिक्षा” की दिशा में ठोस कदम रखा।
  • यद्यपि अभी भी सुधार की आवश्यकता है, फिर भी यह कहा जा सकता है कि POA 1992 ने भारत में शिक्षा के लोकतंत्रीकरण की आधारशिला रखी और हर बच्चे को समान अवसर प्रदान करने की दिशा में वास्तविक पहल की।

बिंदु                                     विवरण
नीति से संबंधित                     राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986
वर्ष                                      1992
मुख्य उद्देश्य                           दिव्यांग बालकों को सामान्य शिक्षा प्रणाली में सम्मिलित करना
मुख्य लाभार्थी                        शारीरिक या मानसिक रूप से बाधित बालक
मुख्य संस्थाएँ                         NCERT, समाज कल्याण मंत्रालय, श्रम मंत्रालय, DIETs
मुख्य उपलब्धियाँ                    प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना, पुनर्वास कार्यक्रम, व्यावसायिक प्रशिक्षण
मुख्य चुनौतियाँ                       संसाधनों की कमी, राज्यों की उदासीनता, प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी
महत्व                                   समावेशी शिक्षा की दिशा में ठोस और व्यवहारिक कदम



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