Classification of Orthopaedically Handicapped Children
अस्थि बाधित बालक वे बच्चे हैं जिनके शरीर के किसी अंग की हड्डियाँ, मांसपेशियाँ या जोड़ों में असामान्यता होती है।
ऐसे बच्चे चलने, लिखने, खेलने या दैनिक कार्यों को करने में कठिनाई अनुभव करते हैं।
इनकी शारीरिक असमर्थता जन्मजात (congenital) भी हो सकती है या किसी दुर्घटना, बीमारी या संक्रमण के कारण बाद में भी उत्पन्न हो सकती है।
शिक्षा के क्षेत्र में इन बालकों के लिए समावेशी दृष्टिकोण (inclusive approach) अपनाना आवश्यक है ताकि वे सामान्य जीवन जी सकें और समाज के उत्पादक नागरिक बनें।
इनका वर्गीकरण सामान्य रूप से दो स्तरों पर किया जाता है -
अस्थि बाधित बालक वे बच्चे हैं जिनके शरीर के किसी अंग की हड्डियाँ, मांसपेशियाँ या जोड़ों में असामान्यता होती है।
ऐसे बच्चे चलने, लिखने, खेलने या दैनिक कार्यों को करने में कठिनाई अनुभव करते हैं।
इनकी शारीरिक असमर्थता जन्मजात (congenital) भी हो सकती है या किसी दुर्घटना, बीमारी या संक्रमण के कारण बाद में भी उत्पन्न हो सकती है।
शिक्षा के क्षेत्र में इन बालकों के लिए समावेशी दृष्टिकोण (inclusive approach) अपनाना आवश्यक है ताकि वे सामान्य जीवन जी सकें और समाज के उत्पादक नागरिक बनें।
अस्थि बाधित बालकों का वर्गीकरण (Classification of Orthopaedically Handicapped Children)
अस्थि बाधित बालकों को मुख्य रूप से अंगों की असमर्थता, क्षतिग्रस्तता या शारीरिक विकृति के आधार पर विभाजित किया जाता है।इनका वर्गीकरण सामान्य रूप से दो स्तरों पर किया जाता है -
1. सामान्य रूप से अपंग बालक (Mildly Handicapped Children) :-
ऐसे बच्चे सामान्य विद्यालयों में अध्ययन कर सकते हैं। उन्हें चलने-फिरने या लेखन कार्य में हल्की सहायता की आवश्यकता होती है।
शिक्षक के सहयोग और भौतिक सुविधाओं की मदद से ये बालक सामान्य शिक्षा प्रक्रिया में भाग ले सकते हैं।
ऐसे बच्चे सामान्य विद्यालयों में अध्ययन कर सकते हैं। उन्हें चलने-फिरने या लेखन कार्य में हल्की सहायता की आवश्यकता होती है।
शिक्षक के सहयोग और भौतिक सुविधाओं की मदद से ये बालक सामान्य शिक्षा प्रक्रिया में भाग ले सकते हैं।
2. गंभीर रूप से अपंग बालक (Severely Handicapped Children) :-
इन बालकों में अस्थि विकृति इतनी गंभीर होती है कि उन्हें निरंतर चिकित्सीय देखभाल या अस्पताल में भर्ती की आवश्यकता पड़ती है।
इनके लिए विशेष विद्यालय या पुनर्वास केंद्रों (rehabilitation centers) की व्यवस्था की जाती है।
इन बालकों में अस्थि विकृति इतनी गंभीर होती है कि उन्हें निरंतर चिकित्सीय देखभाल या अस्पताल में भर्ती की आवश्यकता पड़ती है।
इनके लिए विशेष विद्यालय या पुनर्वास केंद्रों (rehabilitation centers) की व्यवस्था की जाती है।
अंगों की असमर्थता के आधार पर वर्गीकरण (Classification Based on Limbs Impairment)
अस्थि बाधित बालकों को उनके अंगों की असमर्थता के आधार पर तीन मुख्य श्रेणियों में रखा गया है -1. नीचे के अंगों की असमर्थता (Lower Limb Disability) :-
यह विकृति पैरों में होती है, जिससे बालक को चलने-फिरने में कठिनाई होती है।
उदाहरण - पोलियो, टेढ़े पैर (club foot), पांव फिरा (flat foot), या पैर में लकवा (paralysis)।
समस्याएं और समाधान :
यह विकृति पैरों में होती है, जिससे बालक को चलने-फिरने में कठिनाई होती है।
उदाहरण - पोलियो, टेढ़े पैर (club foot), पांव फिरा (flat foot), या पैर में लकवा (paralysis)।
समस्याएं और समाधान :
- स्कूल में आने-जाने के लिए रैंप और रेलिंग की व्यवस्था हो।
- बैठने की विशेष व्यवस्था हो।
- शारीरिक शिक्षा के स्थान पर मानसिक और रचनात्मक गतिविधियाँ दी जाएँ।
2. ऊपरी अंगों की असमर्थता (Upper Limb Disability) :-
यह विकृति हाथों या भुजाओं में होती है।
ऐसे बालकों की मांसपेशियाँ कमजोर होती हैं, जिससे उन्हें लिखने, पकड़ने या रचनात्मक कार्य करने में कठिनाई होती है।
सहयोगात्मक उपाय :
यह विकृति हाथों या भुजाओं में होती है।
ऐसे बालकों की मांसपेशियाँ कमजोर होती हैं, जिससे उन्हें लिखने, पकड़ने या रचनात्मक कार्य करने में कठिनाई होती है।
सहयोगात्मक उपाय :
- इन्हें विशेष लेखन उपकरण या मोटे पेन दिए जाएँ।
- टाइपिंग या कंप्यूटर आधारित शिक्षण का प्रयोग किया जाए।
- आर्ट, मॉडल मेकिंग, पेंटिंग आदि में सहभागिता बढ़ाई जाए ताकि आत्मविश्वास विकसित हो।
3. जन्मजात या अधिग्रहित विकृति (Congenital or Acquired Deformities) :-
कुछ बालक जन्म से ही विकृत होते हैं जबकि कुछ को यह समस्या बीमारी या दुर्घटना से होती है।
इन विकृतियों में मेरुदंड (spine) का वक्र होना, नितंब का विकृत होना, या हाथ-पैर का अभाव शामिल है।
यह विकृति मस्तिष्क में चोट या विकास संबंधी समस्या के कारण होती है।
यह चोट गर्भावस्था, प्रसव के समय या जन्म के बाद संक्रमण के कारण भी हो सकती है।
मस्तिष्क के प्रभावित भाग और क्षति की मात्रा पर निर्भर करता है कि बालक में शारीरिक या मानसिक दोष कितने गंभीर होंगे।
उसे बालक की शारीरिक सीमाओं के साथ-साथ उसकी भावनात्मक और सामाजिक आवश्यकताओं को भी समझना चाहिए।
शिक्षक के लिए सुझाव :
कुछ बालक जन्म से ही विकृत होते हैं जबकि कुछ को यह समस्या बीमारी या दुर्घटना से होती है।
इन विकृतियों में मेरुदंड (spine) का वक्र होना, नितंब का विकृत होना, या हाथ-पैर का अभाव शामिल है।
अस्थि विकलांगता के प्रमुख प्रकार (Major Types of Orthopaedic Disabilities)
- लूले या लंगड़े बालक (Lame or Limping Children)
- हाथ या पैर कटा हुआ (Amputee Children)
- लकवा ग्रस्त बालक (Paralytic Children)
- पांव टेढ़ा या फिरा हुआ (Club Foot / Flat Foot)
- मेरुदंड का वक्र होना (Spinal Curvature)
- विकृत नितंब (Deformed Hip Joint)
- मेरुदंडीय द्विसाखी (Spina Bifida)
- मांसपेशीय असमर्थता (Muscular Dystrophy)
मस्तिष्कीय पक्षाघात (Cerebral Palsy)
अस्थि बाधित बालकों में सबसे प्रमुख और गंभीर विकलांगता मस्तिष्कीय पक्षाघात (Cerebral Palsy) है।यह विकृति मस्तिष्क में चोट या विकास संबंधी समस्या के कारण होती है।
यह चोट गर्भावस्था, प्रसव के समय या जन्म के बाद संक्रमण के कारण भी हो सकती है।
मस्तिष्क के प्रभावित भाग और क्षति की मात्रा पर निर्भर करता है कि बालक में शारीरिक या मानसिक दोष कितने गंभीर होंगे।
मस्तिष्कीय पक्षाघात के प्रमुख प्रकार (Types of Cerebral Palsy)
मस्तिष्क स्तंभ (Spastic Type) :-- शरीर के अंगों में अकड़न और झटकेदार गति होती है।
- बालक के हाथ-पैर अनियंत्रित रूप से हिलते हैं।
- धीरे-धीरे, बार-बार होने वाली मांसपेशीय गति होती है।
- बालक के चेहरे और मुंह की मांसपेशियों पर नियंत्रण नहीं रहता।
- मुंह से लार टपकना
- चेहरे की मांसपेशियों का ढीलापन
- बोलने में कठिनाई
- शरीर के अंगों में सामंजस्य और संतुलन का अभाव होता है।
- बालक चलने या वस्तु पकड़ने में डगमगाता है।
मस्तिष्कीय आघात के प्रभाव (Effects of Brain Injury)
मस्तिष्कीय पक्षाघात या तंत्रिकीय क्षति से बालक में निम्नलिखित समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं —- मानसिक मंदता या प्रतिभायुक्तता
- अधिगम अक्षमता (Learning Disability)
- दृष्टिबाधिता या श्रवण बाधिता
- वाणी दोष या भाषा दोष
- शारीरिक समन्वय में असंतुलन
शिक्षक की भूमिका (Role of Teacher for Orthopaedically Handicapped Children)
शिक्षक अस्थि बाधित बालकों के विकास में प्रमुख भूमिका निभाता है।उसे बालक की शारीरिक सीमाओं के साथ-साथ उसकी भावनात्मक और सामाजिक आवश्यकताओं को भी समझना चाहिए।
शिक्षक के लिए सुझाव :
- कक्षा का वातावरण भौतिक रूप से सुलभ (barrier-free) बनाएं।
- ऐसे बालकों के लिए बैठने और चलने की विशेष व्यवस्था करें।
- उन्हें कक्षा की गतिविधियों में बराबर अवसर दें।
- शिक्षण सामग्री को उनकी क्षमतानुसार अनुकूलित करें।
- नियमित रूप से परामर्शदाता (counselor) और डॉक्टर से संपर्क बनाए रखें।
- बालक की आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान को बढ़ावा दें।
निष्कर्ष (Conclusion)
अस्थि बाधित बालक भी हमारे समाज के समान रूप से महत्वपूर्ण सदस्य हैं।
उनकी अस्थि या शारीरिक कमजोरी उनकी मानसिक क्षमता या रचनात्मकता को सीमित नहीं करती।
यदि शिक्षक, अभिभावक और समाज मिलकर सहयोग करें, तो ऐसे बच्चे न केवल आत्मनिर्भर बन सकते हैं बल्कि प्रेरणा के स्रोत भी बनते हैं।
“सच्ची शिक्षा वही है जो शरीर की सीमाओं के परे जाकर मनुष्य की संभावनाओं को विकसित करे।”
अस्थि बाधित बालक भी हमारे समाज के समान रूप से महत्वपूर्ण सदस्य हैं।
उनकी अस्थि या शारीरिक कमजोरी उनकी मानसिक क्षमता या रचनात्मकता को सीमित नहीं करती।
यदि शिक्षक, अभिभावक और समाज मिलकर सहयोग करें, तो ऐसे बच्चे न केवल आत्मनिर्भर बन सकते हैं बल्कि प्रेरणा के स्रोत भी बनते हैं।
“सच्ची शिक्षा वही है जो शरीर की सीमाओं के परे जाकर मनुष्य की संभावनाओं को विकसित करे।”
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