The Problems of Deprived Children in Education
शिक्षा को प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार माना गया है। शिक्षा न केवल व्यक्ति के बौद्धिक विकास का माध्यम है, बल्कि यह उसके सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक उत्थान का भी आधार है। किंतु समाज में आज भी ऐसे अनेक वर्ग हैं जो विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारणों से शिक्षा से वंचित रह जाते हैं।इन्हीं वंचितों में “अपवंचित वर्ग” (Deprived Class) के बच्चे आते हैं - जिनमें अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), पिछड़े वर्ग (OBC), घुमंतू जातियाँ, निर्माण मजदूरों के बच्चे, अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चे और शहरी झुग्गी बस्तियों में रहने वाले बच्चे सम्मिलित हैं।
इन बच्चों की शिक्षा से संबंधित समस्याएँ केवल विद्यालय या शिक्षक तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये समस्याएँ सामाजिक व्यवस्था, गरीबी, असमान अवसर, पारिवारिक अशिक्षा और प्रशासनिक लापरवाही से जुड़ी हुई हैं।
अपवंचित वर्ग की परिभाषा (Definition of Deprived Class)
“अपवंचित वर्ग” से अभिप्राय समाज के उस समूह से है जो सामाजिक, आर्थिक या सांस्कृतिक दृष्टि से मुख्यधारा से पिछड़ गया है और जिसके बच्चों को समान शैक्षिक अवसर प्राप्त नहीं हो पाते।इन वर्गों को “शैक्षिक रूप से पिछड़े” या “शिक्षा में उपेक्षित वर्ग” भी कहा जाता है।
अपवंचित वर्ग के बच्चों की प्रमुख शिक्षा संबंधी समस्याएँ (Major Educational Problems of Deprived Children)
नीचे कुछ प्रमुख कारण दिए गए हैं जो इन बच्चों के शिक्षा से वंचित रहने या शिक्षण में पिछड़ने के लिए जिम्मेदार हैं -1. माता-पिता का अशिक्षित होना (Illiterate Parents) :-
इन वर्गों के माता-पिता स्वयं शिक्षा के महत्व से अनजान होते हैं।
- वे बच्चों को विद्यालय भेजने की आवश्यकता नहीं समझते।
- कुछ तो यह मानते हैं कि शिक्षा से बच्चों का कोई आर्थिक लाभ नहीं होगा।
- ग्रामीण क्षेत्रों में यह धारणा प्रचलित है कि “पढ़े-लिखे लोग भी बेरोजगार हैं, तो पढ़ाई का क्या लाभ।”
2. माता-पिता की गरीबी (Poverty of Parents) :-
- गरीबी सबसे बड़ा अवरोधक है।
- अधिकांश अपवंचित परिवार दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर रहते हैं।
- बच्चे अक्सर परिवार की आय बढ़ाने के लिए श्रम में लग जाते हैं।
- विद्यालयी खर्च, पुस्तकें, वर्दी और परिवहन के अभाव में बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं।
3. विद्यालयों की कमी (Lack of Schools) :-
कई ग्रामीण या जनजातीय क्षेत्रों में विद्यालयों की पर्याप्त संख्या नहीं है।
- विद्यालय कई किलोमीटर दूर होते हैं।
- मार्ग असुरक्षित या दुर्गम होते हैं।
- विद्यालयों में भवन, शौचालय, पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं होतीं।
4. कुशल अध्यापकों की कमी (Lack of Trained and Sensitive Teachers) :-
सरकार द्वारा नियुक्त शिक्षक प्रायः उस समुदाय की भाषा, संस्कृति और जीवन-शैली से अपरिचित होते हैं।
सरकार द्वारा नियुक्त शिक्षक प्रायः उस समुदाय की भाषा, संस्कृति और जीवन-शैली से अपरिचित होते हैं।
- शिक्षक बच्चों के अनुभवों से नहीं जुड़ पाते।
- शिक्षण एकतरफा हो जाता है।
- बच्चे शिक्षक से दूरी महसूस करते हैं।
5. उचित पाठ्यक्रम का अभाव (Inappropriate Curriculum) :-
अपवंचित वर्ग के बच्चों के लिए पाठ्यक्रम प्रायः उनके जीवन से मेल नहीं खाता।
- पाठ्यक्रम में ग्रामीण, श्रमिक या आदिवासी जीवन का यथार्थ नहीं झलकता।
- शिक्षण सामग्री शहरी पृष्ठभूमि पर आधारित होती है।
- बच्चे पाठ्य सामग्री से अपना जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते।
6. सामाजिक भेदभाव और पूर्वाग्रह (Social Discrimination and Bias) :-
कुछ विद्यालयों में अब भी जातिगत या वर्गगत भेदभाव देखने को मिलता है।
- शिक्षकों या सहपाठियों का उपेक्षात्मक व्यवहार बच्चों के आत्मविश्वास को तोड़ देता है।
- “निम्न जाति के बच्चे” होने के कारण उन्हें पिछली पंक्ति में बैठाया जाता है या समूह कार्यों में शामिल नहीं किया जाता।
7. प्रेरणा और मार्गदर्शन की कमी (Lack of Motivation and Guidance) :-
- परिवार में कोई शिक्षित व्यक्ति न होने के कारण बच्चे को प्रेरणा नहीं मिलती।
- घर में अध्ययन का माहौल नहीं होता।
- शिक्षकों के पास भी व्यक्तिगत मार्गदर्शन देने का समय नहीं होता।
समस्याओं के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव (Socio-Economic Impacts)
- इन बच्चों में आत्मविश्वास और आत्मसम्मान की कमी हो जाती है।
- वे सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े रह जाते हैं।
- अशिक्षा के कारण अगली पीढ़ी भी शिक्षा से दूर रह जाती है — जिससे “गरीबी और पिछड़ेपन का दुष्चक्र” (Cycle of Poverty) चलता रहता है।
- राष्ट्र की उत्पादकता और मानव संसाधन क्षमता घटती है।
समाधान के उपाय (Solutions to the Problems)
अब हम देखते हैं कि इन समस्याओं के निवारण हेतु कौन-कौन से प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं -1. उचित पाठ्यक्रम का निर्माण (Construction of Appropriate Curriculum) :-
पाठ्यक्रम को बच्चों के सामाजिक जीवन, अनुभवों और भाषा के अनुरूप बनाया जाए।
- क्षेत्रीय लोककथाएँ, गीत, संस्कृति, इतिहास और जीवन-पद्धति को शिक्षण में शामिल किया जाए।
- पाठ्यपुस्तकें स्थानीय भाषा में हों।
- व्यवहारिक और व्यावसायिक शिक्षा पर बल दिया जाए।
2. सामाजिक एकीकरण को सुनिश्चित करना (Ensuring Social Integration) :-
जब वंचित वर्ग के बच्चे सामान्य बच्चों के साथ पढ़ते हैं, तो उनमें सामाजिक गुण विकसित होते हैं —
- सहानुभूति, सहयोग, समानता की भावना।
- सामाजिक प्रतिस्पर्धा और आत्म-सम्मान का विकास।
3. समावेशी शिक्षा की व्यवस्था (Inclusive Education System) :-
समावेशी शिक्षा सभी बच्चों को समान मंच पर लाती है।
- इसमें सामान्य और विशेष दोनों प्रकार के बच्चे साथ पढ़ते हैं।
- शिक्षक प्रत्येक विद्यार्थी की व्यक्तिगत आवश्यकता के अनुसार शिक्षण रणनीति अपनाते हैं।
- इससे सामाजिक और शैक्षिक एकीकरण (Integration) स्वाभाविक रूप से होता है।
विशिष्ट या अलग विद्यालयों की तुलना में समावेशी शिक्षा अपेक्षाकृत कम खर्चीली होती है।
- सामान्य विद्यालयों में वंचित बच्चों को शामिल करने से प्रशासनिक लागत घटती है।
- इससे समान अवसरों का विस्तार होता है।
शिक्षा को केवल परीक्षा-उन्मुख न बनाकर, सहयोगात्मक अधिगम (Cooperative Learning) पर आधारित किया जाए।
- समूह कार्य, परियोजनाएँ और क्रियात्मक अधिगम से बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ता है।
- शिक्षक और विद्यार्थियों में आपसी समझ विकसित होती है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 45 और 21A में “6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा” की व्यवस्था की गई है।
- विद्यालयों में भेदभाव रहित वातावरण होना चाहिए।
- शिक्षक और प्रशासन को समान अवसर के सिद्धांत का पालन करना चाहिए ताकि कोई भी बच्चा अपने को हीन न समझे।
शिक्षकों को समाज के विभिन्न वर्गों की सांस्कृतिक और भाषाई विविधता को समझने के लिए प्रशिक्षित किया जाए।
- शिक्षकों में सहानुभूति, संवेदनशीलता और सामाजिक दृष्टि विकसित होनी चाहिए।
- स्थानीय समुदायों के सहयोग से शिक्षा की योजनाएँ बनानी चाहिए।
सरकार द्वारा कई योजनाएँ चलाई जा रही हैं, जैसे -
- सर्व शिक्षा अभियान (SSA)
- समग्र शिक्षा अभियान
- मध्याह्न भोजन योजना (Mid-Day Meal Scheme)
- बालिका शिक्षा योजना
- आदिवासी एवं पिछड़ा वर्ग छात्रवृत्ति योजनाएँ
9. माता-पिता की जागरूकता (Parent Awareness Programs) :-
अभिभावकों को शिक्षा के महत्व के प्रति जागरूक करना आवश्यक है।
- गाँवों में शिक्षा मेले, जन-जागरूकता अभियान, और महिला साक्षरता कार्यक्रम चलाए जाएँ।
- शिक्षा को जीवन-सुधार का माध्यम बताया जाए।
अपवंचित वर्ग के बच्चों की शिक्षा संबंधी समस्याएँ केवल विद्यालय की नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी हैं।
यदि हम एक समान और न्यायपूर्ण समाज बनाना चाहते हैं तो इन बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा में लाना अत्यंत आवश्यक है।
शिक्षा ही वह साधन है जो गरीबी, अशिक्षा, अंधविश्वास और भेदभाव की जंजीरों को तोड़ सकती है।
“यदि समाज के सबसे वंचित बच्चे तक शिक्षा नहीं पहुँचती, तो कोई भी राष्ट्र प्रगति नहीं कर सकता।”
अतः आवश्यकता है -
समानता, संवेदनशीलता और सहभागिता पर आधारित समावेशी शिक्षा प्रणाली की,
जहाँ हर बच्चा, चाहे वह किसी भी वर्ग से आता हो, आत्मविश्वास और सम्मान के साथ शिक्षा प्राप्त कर सके।
साहित्यिक टिप्पणी (Literary Note)
अपवंचित बालकों की शिक्षा केवल अधिकार नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का साधन है।शिक्षा इन बच्चों के लिए वह प्रकाश है जो उन्हें अंधकार से बाहर निकालता है और आत्मनिर्भरता की ओर ले जाता है।
“शिक्षा केवल पुस्तक का ज्ञान नहीं, बल्कि आत्मा की स्वतंत्रता है -
जो हर वंचित बच्चे को गरिमा और समानता के साथ जीना सिखाती है।”
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