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अपराधी बालकों का अर्थ एवं परिभाषा

अपराधी बालक का अर्थ एवं परिभाषा

अपराध शब्द का संबंध ऐसे आचरण या व्यवहार से है जो समाज द्वारा स्वीकृत नियमों, कानूनों या मानदंडों का उल्लंघन करता है। जब ऐसा कार्य 18 वर्ष से कम आयु के बालक द्वारा किया जाता है, तो उसे बाल अपराध (Juvenile Delinquency) कहा जाता है और उसे करने वाले को अपराधी बालक (Delinquent Child) कहा जाता है।

अपराधी बालक की परिभाषा को तीन दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है -
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से :-
अपराध एक प्रकार का मनोवैज्ञानिक असंतुलन (psychological imbalance) है जो भावनात्मक नियंत्रण की कमी और आक्रामक प्रवृत्तियों से उत्पन्न होता है।

सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टिकोण से :-
अपराध वह व्यवहार है जो समाज के मूल्यों, नैतिकता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। ऐसे कार्यों में तोड़फोड़, आक्रामकता, चोरी, या समाज-विरोधी गतिविधियाँ सम्मिलित हैं।

कानूनी दृष्टिकोण से :-
कानूनी रूप से अपराध वह कृत्य है जो विधि के अनुसार वर्जित हो और जिसके लिए दंड निर्धारित हो। यदि यह कार्य नाबालिग द्वारा किया गया है, तो उसे अपराधी बालक कहा जाता है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि अपराधी बालक वह होता है जो समाज और कानून दोनों के मानदंडों का उल्लंघन करने वाला व्यक्ति है, परंतु जिसकी आयु 18 वर्ष से कम होती है।

प्रमुख विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाएँ

हीली (Healy) :-
“वह बालक जो समाज द्वारा स्वीकृत आचरण के नियमों का उल्लंघन करता है, अपराधी बालक कहलाता है।”

वर्ट (Wert) :-
“वह बालक जिसकी समाज-विरोधी प्रवृत्तियाँ इतनी गंभीर हो जाती हैं कि उसके प्रति सरकारी या न्यायिक कार्यवाही आवश्यक हो जाती है।”

सेथना (Sethna) :-
“अपराधी बालक वह है जिसकी आयु विशेष कानून के अनुसार निर्धारित सीमा से कम हो और जिसने ऐसा कार्य किया हो जो समाज की दृष्टि में अनुचित है।”

न्यूमेयर (Neumeyer) :-
“वह बालक जो विधिक दृष्टि से नाबालिग है और जिसने मानव-विरोधी या सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध कार्य किया हो।”

कोहेन (Cohen) :-
“बाल अपराधी सामान्यतः अनुपयोगी और निरुद्देश्य कार्य करता है, जबकि वयस्क अपराधी योजनाबद्ध एवं स्वार्थपूर्ण अपराध करता है।”

बाल अपराधी और प्रौढ़ अपराधी में अंतर

आधार                           बाल                                                  अपराधी प्रौढ़ अपराधी
आयु                          18 वर्ष से कम                                          18 वर्ष से अधिक
उद्देश्य                        अक्सर हंसी-मजाक या आवेगवश                 लाभ या योजना के तहत
आपराधिक ज्ञान          सीमित और असंगठित                                अनुभवजन्य और सुनियोजित
सामाजिक प्रभाव         परिवेश और मित्र समूह का असर                  स्वार्थ और उद्देश्य प्रधान
व्यवहार उदाहरण         स्कूल से भागना, चोरी, झूठ बोलना                डकैती, धोखाधड़ी, गंभीर अपराध

अपराधी बालकों की विशेषताएँ

अपराधी बालक सामान्य बच्चों से कुछ विशिष्ट लक्षणों के कारण अलग पहचाने जा सकते हैं। कई शोधों (जैसे क्वेरेसस की Delinquency Proneness Checklist) में अपराधी प्रवृत्ति वाले बच्चों में कुछ सामान्य विशेषताएँ बताई गई हैं -
  • विद्यालय और अध्ययन के प्रति अरुचि।
  • अनुशासनहीनता और विद्यालय के नियमों के प्रति विरोध।
  • बार-बार विद्यालय बदलना या अनुपस्थित रहना।
  • सीमित या अस्पष्ट भविष्य की योजना।
  • विद्यालय की संपत्ति को नुकसान पहुँचाना।
  • क्रीड़ा या खेलों में आक्रामकता और निर्दयता।
  • कक्षा में चिड़चिड़ापन, असंतोष और विरोधी रवैया।
  • विद्यालय या शिक्षक के प्रति असंबद्धता की भावना।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से प्रमुख लक्षण

फ्रैश्मर और गुडविन के अनुसार अपराधी बालकों में ये विशेषताएँ पाई जाती हैं -
  • गठा हुआ एवं सक्रिय शरीर।
  • ज़िद्दी, स्वार्थी और बहिर्मुखी स्वभाव।
  • परिवार में प्रेम और नैतिक मार्गदर्शन की कमी।
  • सामाजिक मानदंडों का विरोध और अधिकारों की अवहेलना।
  • दूसरों पर शीघ्र क्रोध और संदेह करने की प्रवृत्ति।
  • समस्याओं का हिंसक या अनुचित तरीकों से समाधान करने की आदत।
एलिस के अनुसार, अपराधी बालक अध्ययन में रुचि नहीं लेते और लड़कों की संख्या बालिकाओं से अधिक होती है (लगभग 80:20 का अनुपात)।

कुम्पूस्वामी ने कहा है कि अपराधी बालक वर्तमान आनंद को ही वास्तविक सुख मानता है और भविष्य की चिंता नहीं करता।

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इन विशेषताओं का उपस्थित होना अनिवार्य रूप से अपराधिता का संकेत नहीं है, किंतु यह बालक के सामाजिक व भावनात्मक असंतुलन की ओर संकेत अवश्य करता है।

अपराधी बालकों का वर्गीकरण

अपराधी बालकों को सामान्यतः दो प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जा सकता है -
सक्रिय या आक्रामक अपराधी बालक (Active/Impulsive Type) :-
ये बच्चे ऊर्जावान, साहसी और उत्तेजित स्वभाव के होते हैं।
ये अपने साथियों के सामने प्रतिष्ठा पाने या रोमांच के लिए चोरी, झगड़ा या स्कूल से भागने जैसे कार्य करते हैं।

शांत या अंतर्मुखी अपराधी बालक (Passive/Secretive Type) :-
ये बाहरी रूप से शांत, विनम्र और आज्ञाकारी प्रतीत होते हैं, किंतु आंतरिक रूप से जिद्दी और चालाक होते हैं।
ये गुप्त रूप से अपराध करते हैं — जैसे पुस्तक चुराना, झूठ बोलना, धोखाधड़ी करना आदि।

आधुनिक वर्गीकरण (Modern Classification)

आधुनिक मनोवैज्ञानिकों ने अपराधी बालकों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है -
गंभीर स्तर के अपराधी बालक (Serious Delinquents) :-
जो हत्या, डकैती, लूट, आगज़नी जैसे गंभीर अपराध करते हैं।

साधारण स्तर के अपराधी बालक (Minor Delinquents) :-
जो चोरी, झूठ बोलना, अनुशासनहीनता, झगड़ा या स्कूल से भागना जैसे छोटे अपराध करते हैं।

यौन संबंधी अपराधी बालक (Sexual Offenders) :-
जो यौनिक व्यवहार या अनुचित संबंधों में संलग्न होते हैं।

अपराधी बालकों के कारण एवं सुधार के उपाय

(Causes and Remedies of Juvenile Delinquency)

किसी भी बालक का अपराधी बन जाना केवल उसकी व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि परिवार, समाज, और परिवेश की सामूहिक कमी का परिणाम है।
बचपन वह अवस्था है जिसमें बालक अनुकरण (Imitation) के माध्यम से सीखता है।
यदि उसे स्नेह, सुरक्षा और मार्गदर्शन के बजाय उपेक्षा, हिंसा या गलत आदर्श मिलते हैं, तो उसकी प्रवृत्तियाँ अपराध की दिशा में मुड़ जाती हैं।

अतः यह समझना आवश्यक है कि कोई भी बच्चा जन्म से अपराधी नहीं होता -
बल्कि परिस्थितियाँ, अनुभव और सामाजिक वातावरण उसे अपराध की ओर प्रेरित करते हैं।

अपराधी बालकों के प्रमुख कारण

  • अपराधिता के कारणों को सामान्यतः पाँच श्रेणियों में बाँटा जा सकता है -
  • पारिवारिक कारण (Family Factors)
  • सामाजिक कारण (Social Factors)
  • शैक्षणिक कारण (Educational Factors)
  • मनोवैज्ञानिक कारण (Psychological Factors)
  • आर्थिक एवं पर्यावरणीय कारण (Economic & Environmental Factors)
1. पारिवारिक कारण :-
परिवार बालक का पहला विद्यालय होता है। यदि वहीं असंतुलन है, तो बालक का व्यक्तित्व भी विकृत हो जाता है।
  • माता-पिता में कलह या तलाक :- पारिवारिक तनाव बालक को असुरक्षा और आक्रोश की ओर धकेलता है।
  • अत्यधिक दंड या उपेक्षा :- कठोर अनुशासन या स्नेह की कमी बालक में विद्रोही प्रवृत्ति उत्पन्न करती है।
  • अत्यधिक लाड़-प्यार :- अनुशासनहीनता और गैर-जिम्मेदारी का भाव बढ़ता है।
  • परिवार में अपराध या नशाखोरी का माहौल :- बालक गलत आचरण का अनुकरण करता है।
2. सामाजिक कारण :-
समाज का असंतुलित और भेदभावपूर्ण वातावरण भी बाल अपराध की जड़ है।
  • गरीबी और बेरोज़गारी से उपजी निराशा।
  • असमानता, जातीय या वर्गीय भेदभाव।
  • अनुचित मित्र समूह या गैंग से जुड़ना।
  • मीडिया, फिल्मों और इंटरनेट में अपराध का आकर्षक चित्रण।
3. शैक्षणिक कारण :-
विद्यालय बालक के व्यक्तित्व निर्माण का केंद्र है। यदि वही वातावरण नकारात्मक हो, तो बालक असंतुलित हो सकता है।
  • शिक्षक की उपेक्षा या अनुचित व्यवहार।
  • शिक्षा में असफलता या रुचि का अभाव।
  • अनुशासनहीन विद्यालयीय वातावरण।
  • पढ़ाई में पिछड़ने पर अपमानित महसूस करना।
4. मनोवैज्ञानिक कारण :-
कई बार अपराधी प्रवृत्तियाँ बालक के भीतर के असंतुलन या मानसिक तनाव से उत्पन्न होती हैं।
  • असफलता, हीनभावना या असुरक्षा की भावना।
  • आत्म-नियंत्रण की कमी और आवेगशीलता।
  • आक्रोश, प्रतिशोध या मान्यता पाने की इच्छा।
  • भावनात्मक अस्थिरता और सामाजिक अस्वीकृति।
5. आर्थिक एवं पर्यावरणीय कारण :-
  • गरीबी, भुखमरी और अशिक्षा से उत्पन्न असंतोष।
  • भीड़भाड़, अस्वच्छ बस्तियाँ और असुरक्षित आवास।
  • खेल, मनोरंजन या रचनात्मक अवसरों का अभाव।
  • बाल श्रम, घरेलू हिंसा और सामाजिक उपेक्षा।

अपराधी बालकों के सुधार के उपाय

बाल अपराध केवल दंड से नहीं मिट सकता; इसके लिए सुधार, पुनर्वास और स्नेहपूर्ण वातावरण की आवश्यकता होती है।
अपराधी बालकों को सही दिशा देने के लिए निम्न उपाय किए जा सकते हैं -
1. पारिवारिक सुधार :-
  • माता-पिता को स्नेह, अनुशासन और समझ का संतुलन बनाए रखना चाहिए।
  • बच्चों के साथ संवाद और विश्वास का रिश्ता बनाना आवश्यक है।
  • अभिभावकों को यह समझना होगा कि कठोर दंड या अत्यधिक स्वतंत्रता दोनों ही हानिकारक हैं।
2. शैक्षणिक एवं विद्यालयीय सुधार :-
  • विद्यालयों में परामर्श केंद्र (Counselling Cells) की स्थापना की जाए।
  • अपराधी प्रवृत्ति वाले बालकों को विशेष शिक्षा कार्यक्रम (Remedial Teaching) के अंतर्गत रखा जाए।
  • खेल, नाटक, चित्रकला, संगीत जैसे रचनात्मक माध्यमों से उनकी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा दी जाए।
  • शिक्षकों को संवेदनशीलता और बाल मनोविज्ञान पर प्रशिक्षण दिया जाए।
3. सामाजिक सुधार :-
  • समाज में समानता, सहयोग और स्वीकृति का वातावरण बनाना होगा।
  • युवाओं के लिए रोजगार, कौशल और व्यावसायिक शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराए जाएँ।
  • मीडिया में अपराध को रोमांच नहीं बल्कि समस्या के रूप में प्रस्तुत किया जाए।
  • समाजसेवी संस्थाएँ बाल पुनर्वास केंद्र चलाएँ, जहाँ शिक्षा, परामर्श और प्रशिक्षण दिया जा सके।
4. मनोवैज्ञानिक उपचार :-
  • अपराधी बालक को दंड नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक परामर्श (Psychological Counselling) की आवश्यकता होती है।
  • संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी (Cognitive Behavioural Therapy) के माध्यम से उनके विचारों और प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित किया जा सकता है।
  • समूह परामर्श और प्रेरक वार्तालाप से उनमें आत्म-नियंत्रण और आत्म-सम्मान की भावना विकसित होती है।
5. सरकारी एवं विधिक सुधार :-
  • किशोर न्याय (बाल संरक्षण एवं देखरेख) अधिनियम, 2015 के अंतर्गत अपराधी बालकों के पुनर्वास की व्यवस्था की गई है।
  • सुधार गृहों को केवल बंदीगृह न बनाकर शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और मनोवैज्ञानिक सहायता केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
  • न्यायिक प्रक्रिया में बालक के अधिकारों और गरिमा का संरक्षण अनिवार्य हो।
अपराधी बालक समाज का शत्रु नहीं, बल्कि उसकी उपेक्षा का परिणाम हैं।
उनके सुधार की कुंजी प्रेम, विश्वास और पुनर्वास में छिपी है, न कि भय और दंड में।

यदि परिवार, विद्यालय, समाज और सरकार मिलकर संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाएँ,
तो अपराधी बालक भी एक उपयोगी, जिम्मेदार और आत्मनिर्भर नागरिक बन सकता है।

याद रखें -
“बालक अपराधी नहीं जन्म लेता, बल्कि समाज की परिस्थितियाँ उसे अपराधी बनाती हैं।” 


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