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अधिगम असमर्थी बालकों की कक्षा का प्रबंधन

Classroom management of learning disabled children

विलियम और हाउन्सेल 1998 ने अपने लेख अधिगम असमर्थी बालकों की शिक्षा आव्यूह में कहा है कि अधिकांश अधिगम असमर्थी बालक में शैक्षिक शक्ति सामान्य बालकों के समान होती है परंतु उनकी शक्तियां छुपी हुई होती हैं, जिन्हें उजागर करने के लिए तथा उपलब्धियां प्राप्त करने के लिए उन्हें कुछ सहायता की आवश्यकता होती है।

शिक्षण आव्यूह (teaching strategy)

शारीरिक एवं मानसिक रूप से बाधित बालकों के अधिगम के लिए निम्नलिखित अभियोग है -
  1. अधिगम असमर्थी बालक के द्वारा सराहनीय कार्य अथवा सफलतापूर्वक किया गया कार्य के प्रति अध्यापक का एक महत्वपूर्ण कर्तव्य है कि वह बालकों की सहायता करें तथा उनकी ओर ध्यान दें। बालकों पर अधिगम असमर्थी का लेवल ना चिपकाए ।
  2. प्रविधियां को प्रयोग करना लाभदायक है, कंप्यूटर का यथासंभव प्रयोग करना भी एक अच्छी बुद्धिमानी का कार्य है। कंप्यूटर का प्रयोग अधिगम असमर्थी बालकों के केंद्रीय ज्ञान हेतु महत्वपूर्ण सलाह देने में प्रोत्साहित करता है।
  3. अधिगम असमर्थी बालक विशेषतः दूरदर्शन तथा अन्य दृष्टि से संबंधित वस्तुओं की ज्ञान को आसानी से ग्रहण करते हैं।
  4. संगीत की आवाज तथा चित्रों के माध्यम से अधिगम असमर्थी बालकों की शिक्षा में सजीवता लायी जा सकती है।
प्रोत्साहन और सराहना :-
शिक्षक का प्रमुख कर्तव्य है कि बालक के हर छोटे-बड़े सफल प्रयास की प्रशंसा करें। बच्चों को “असफल” या “कमज़ोर” का लेबल न दें, बल्कि उनकी उपलब्धियों को आगे बढ़ने का प्रेरक बनाएं।
 
प्रौद्योगिकी का प्रयोग :-
कंप्यूटर, स्मार्ट क्लास, ऑडियो-विजुअल सामग्री और शिक्षण सॉफ्टवेयर का उपयोग ऐसे बच्चों के लिए अत्यंत प्रभावी होता है। यह उनके ध्यान को आकर्षित करता है और सीखने की रुचि बढ़ाता है।
 
दृश्य और श्रव्य साधनों का प्रयोग :-
अधिगम असमर्थ बालक दृश्य (visual) और श्रव्य (auditory) माध्यमों से बेहतर सीखते हैं। इसलिए शिक्षण में चित्र, चार्ट, वीडियो, और फ्लैश कार्ड का प्रयोग किया जाना चाहिए।
 
संगीत और कला के माध्यम से अधिगम :-
संगीत, गीत और चित्रकला जैसी सृजनात्मक गतिविधियाँ शिक्षण को जीवंत बनाती हैं। इनसे बच्चों की कल्पनाशक्ति और भाषा विकास में सुधार होता है।

शिक्षा कक्षा का संगठन (organisation of classroom)

अधिगम असमर्थता बालकों के अध्यापक को कक्षा के समय का निर्धारण कार्य के अनुरूप करना चाहिए। समय का निर्धारण कुछ इस प्रकार करना चाहिए कि कड़ी मेहनत करने वाले कार्यों को अधिक समय देकर आराम से किया जा सके। बालक कार्य को आनंद के साथ चारों ओर घूम घूम कर कर सके।

अध्यापक को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए -
बालकों के बैठने की व्यवस्था
अधिगम असमर्थ बालकों की कक्षा में बैठने की व्यवस्था करते समय ध्यान रखना चाहिए
  1. डेस्क या स्थान पर गुच्छे के रूप में होने चाहिए अर्थात दूर-दूर नहीं फैले होने चाहिए। बालकों के साथ विचार विमर्श करने अथवा एक साथ मिलकर कार्य करने में सहायता होती है, जिससे अनुकरण कर सके।
  2. बालकों के लिए नए शब्दों का शिक्षण करते समय शब्दों को बार-बार दोहराना चाहिए जो उन्हें याद करने हैं।
  3. अध्यापक द्वारा बालकों को सौंपी जाने वाले कार्य की योजना बनानी चाहिए तथा उनके द्वारा किए जाने वाले मूल कार्यों पर बल देना चाहिए, जिससे बालकों के मस्तिष्क में कार्य के प्रति किसी प्रकार का संशय न हो।
  4. पहले बालक से सीधे तथा सरल कार्य कराने चाहिए। इसके पश्चात धीरे-धीरे कठिन कार्यों को एक के बाद एक जोड़ते हुए आगे बढ़ना चाहिए। जैसे-जैसे विद्यालय का समय व्यतीत होता है उसी के अनुरूप अधिगम असमर्थी बालकों को आसानी से सक्रिय कार्य की ओर ले जाना चाहिए
बैठने की व्यवस्था :-
  • डेस्क को गुच्छों (clusters) में रखा जाए ताकि बच्चे एक-दूसरे से संवाद कर सकें।
  • अधिगम असमर्थ बालक को कक्षा के मध्य भाग में बैठाया जाए जिससे शिक्षक की दृष्टि उन पर बनी रहे।
कार्य योजना :-
  • कार्यों को छोटे-छोटे चरणों में विभाजित कर सरल से कठिन की ओर क्रमबद्ध रूप से सिखाया जाए।
  • बालक के सामने केवल उतना ही कार्य रखा जाए जिसे वह समझ सके।
  • नए शब्दों और अवधारणाओं को बार-बार दोहराया जाए।
समय प्रबंधन :-
  • कठिन कार्यों के लिए अधिक समय दिया जाए और गतिविधियों को रुचिकर बनाया जाए ताकि बालक सीखने का आनंद ले सकें।

आंकलन आव्यूह (assessment strategies)

अधिगम असमर्थी बालको का आकलन करते समय अध्यापक को कार्य स्पष्ट रूप से करना चाहिए तथा बालकों के शिक्षा से संबंधित विशेषताओं के रूप गुणों के आधार पर उनको परीक्षा फल के रूप में अंक देने चाहिए। बालकों की परीक्षा के लिए प्रश्न बनाते समय यह विशेष ध्यान रखना चाहिए कि बहु विकल्प प्रश्न में उपयुक्त उत्तर सुनिश्चित हो।

अध्यापकों को शिक्षा कच्छ की मुख्यधारा को व्यक्तिगत स्तर पर बनाना होता है जहां वैयक्तिक अंतर स्वीकार किए जाते हैं तथा उनका मूल्य होता है। अध्यापक को चाहिए कि वह बालकों का मार्गदर्शन करें तथा बालकों के अधिगम को अपने व्यक्तिगत उत्तरदायित्व के रूप में स्वीकार करें। अध्यापकों को बालकों के मध्य सहयोग पूर्ण कार्य करना, बालकों की समस्याओं को हल करना तथा बालको को स्वेच्छानुसार कार्य करने को बढ़ावा देना चाहिए।

अध्यापकों को विशेष रुप से ध्यान रखना होता है -
  1. कक्षा के वातावरण के बारे में बालकों की अनुक्रिया को स्वीकार करना चाहिए।
  2. प्रत्येक बालक को प्रेरित करने के लिए बालकों को विभिन्न विकल्प देने चाहिए।
  3. प्रश्नों को सरल भाषा में प्रस्तुत करें।
  4. बहुविकल्पीय प्रश्नों के साथ मौखिक परीक्षण भी शामिल करें।
  5. मूल्यांकन का उद्देश्य “दंड देना” नहीं बल्कि “सुधार” कराना होना चाहिए।
  6. मूल्यांकन में बालक की प्रगति, प्रयास और व्यवहार को भी महत्व दिया जाना चाहिए।

अधिगम असमर्थी बालकों की शिक्षा में अध्यापक की भूमिका
Role of teacher for learning disabled children

अधिगम असमर्थी बालकों का प्रबंधन
Meaning of learning disabled children

अधिगम बाधित बालकों को उनकी बाधिता के अनुरूप एक या अधिक क्षेत्रों में अध्यापक के शिक्षण तथा मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। विशेषकर अध्यापक की उपस्थिति पर उपस्थिति इस तथ्य पर निर्भर करती है कि नियमित कक्षा अध्यापक अनुदेशनों को किस सीमा तक प्रयोग करते हैं। यह सत्य है कि नियमित कक्षा अध्यापक तथा विशेषज्ञ अध्यापक के बीच सहयोगात्मक कार्य संबंध होना चाहिए, सामान्य तथा विशेषज्ञ अध्यापक को उनके कार्य क्षेत्र के अनुसार कार्य करना चाहिए। किसको क्या कार्य करना होगा? इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया जा सकता है फिर भी सामान्य अध्यापक अधिगम बाधित बालक की समस्याओं को दूर करने में अपना योगदान दे सकते हैं।

कक्षा अध्यापक सामान्य तथा बाधित दोनों प्रकार के बालकों का शिक्षण कार्य करता है। उन्हें बालकों के व्यवहार संबंधी विशेषताओं को देखने का अवसर मिलता है। वह अधिगम बाधित बालकों को पहचान सकते हैं तथा पहचान के आधार पर वह अधिक बाधित बालकों को विशेष अध्यापक की सहायता प्रदान कर सकते हैं तथा उनकी कठिनाइयों तथा समस्याओं को दूर करने में सहायक हो सकते हैं।

यदि अध्यापक को यह ज्ञात हो कि उनकी कक्षा में अधिगम बाधित बालक है तो उन्हें विजेता के अध्यापक की सहायता एवं परामर्श से व्यवस्थित तथा अनुकूल अनुदेशन प्रयोग करने चाहिए। यदि अध्यापक उपलब्ध ना हो तो नियमित अध्यापकों स्वयं अनुदेशकों का प्रयोग करना चाहिए। उन्हें इस तथ्य का ध्यान रखना चाहिए कि अधिगम बाधित बालकों की आधारभूत आवश्यकता शिक्षण है जो शिक्षण अधिगम बाधित बालकों के लिए उपयोगी है वह सामान्य बालकों के लिए भी उपयोगी होगा। सामान्य तथा अधिगम बाधित बालकों के लिए शिक्षण हेतु बहुत से आयाम हैं।

अधिगम बाधित बालक विपरीत विशेषताओं वाले होते हैं उन्हें विकास के विभिन्न स्तरों पर अपने शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विभिन्न प्रविधियों की आवश्यकता होती है।

विद्यालय स्तर पर बालकों की क्षमताओं को बढ़ाने, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने तथा स्वयं कार्य करने की क्षमता का विकास कराने के लिए उन्हें उचित वातावरण प्रदान करना चाहिए। इस स्तर पर सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना चाहिए। हानिकारक तथा अत्यधिक शीघ्र टूटने वाली सामग्री को बालको से दूर रखना चाहिए। पूर्व प्रारंभिक स्तर पर बालकों की कक्षा शोर रहित, प्रकाश युक्त तथा साफ-सुथरी होनी चाहिए। अधिगम बाधित बालकों को हानि रहित वातावरण में सामान्य शिक्षण तथा विशिष्ट शिक्षण दिया जाना चाहिए। ऐसे बालकों को कक्षा के मध्य में बैठाया जा सकता है ताकि अध्यापक का ध्यान उन पर केंद्रित रह सके।

यद्यपि बालकों के छोटे-छोटे समूह व्यक्तिगत रूप में कार्य कर सकते हैं फिर भी साथी की सहायता वाले अनुदेशन कार्य तथा विशेष योजना को भी प्रयोग में लाना चाहिए। इसके लिए अध्यापक कों अधिगम बाधित बालकों के लिए अच्छे सामान्य साथी का चुनाव करना चाहिए।

अधिगम बाधित बालकों की शिक्षा के लिए योजना का प्रारूप तथा अनुदेशनीय प्रक्रिया आवश्यक होती है। पाठ्यक्रम को क्रम तथा कार्यक्रम के आधार पर तैयार करना चाहिए ताकि अधिगम बाधित बालक इसको पढ़ सकें। इस कार्य के लिए विश्लेषण प्रक्रिया उपयुक्त है। इसके आधार पर अध्यापक कार्यों को छोटे-छोटे खंडों में बांट सकते हैं तथा प्रत्येक स्तर पर विद्यार्थियों की सहायता कर सकते हैं।

व्यक्तिगत ध्यान :-
  • प्रत्येक बालक की अधिगम शैली भिन्न होती है। अध्यापक को बालक की शक्तियों और कमजोरियों को पहचानकर व्यक्तिगत सहायता देनी चाहिए।
सहयोगात्मक शिक्षण (Collaborative Teaching) :-
  • सामान्य और विशेष शिक्षक, दोनों मिलकर ऐसे बच्चों के लिए अनुकूल शिक्षण योजना बनाएं। इससे शिक्षण अधिक प्रभावी बनता है।
सकारात्मक दृष्टिकोण :-
  • शिक्षक का व्यवहार संवेदनशील और प्रोत्साहनपूर्ण होना चाहिए। उसे बच्चों की गलतियों को सुधार के अवसर के रूप में देखना चाहिए, न कि दोष के रूप में।
सुरक्षित एवं अनुकूल वातावरण :-
  • कक्षा का वातावरण शोर-रहित, प्रकाशयुक्त और स्वच्छ होना चाहिए।
  • बालकों को ऐसी सामग्री से दूर रखा जाए जिससे उन्हें चोट पहुँचने की संभावना हो।

आत्मविश्वास का विकास

अधिगम असमर्थी बालकों की सहायता करने के लिए सबसे उत्तम कार्य बालकों को उनके उत्तरदायित्व तथा कर्त्तव्यों का निर्धारण करना और सौपना है, विशेषतः कैसे बालको को जो समस्याओं में उलझे हुए हैं। विद्यार्थियों के लिए पालतू जानवर अथवा पौधे की देखभाल करने का कार्य महत्वपूर्ण है। इस प्रकार बालकों के मस्तिष्क पर विशेष रूप से प्रभाव पड़ता है और वह समझेंगे कि उनके लिए विद्यालय की कक्षाओं में उपस्थिति केवल शैक्षिक शक्ति के लिए ही नहीं है बल्कि किसी जीव के लिए भी है। अध्यापक का इस प्रकार का व्यवहार बालकों में आत्मविश्वास को एक नाटकीय विधि में ओत प्रोत होता है।

“अधिगम असमर्थता कमजोरी नहीं, बल्कि सीखने का अलग तरीका है। सही दिशा और संवेदनशील शिक्षक ही इन बच्चों को आत्मनिर्भर बना सकते हैं।”

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